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ByUpendra Prasad

अनारक्षितों को 10 फीसदी आरक्षण: बहुजन राजनीति का अंत?

 

उपेन्द्र प्रसाद

मोदी सरकार द्वारा अनारक्षित समुदायों की कम आय वाले लोगांे को आरक्षण देकर सामाजिक बदलाव को एक नई दिशा दे दी है। जाति आधारित भारतीय समाज पर इसका जबर्दस्त असर पड़ेगा और यह बदलाव सकारात्मक ही होगा। 1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों के लागू किए जाने के बाद भी समाज पर जबर्दस्त असर पड़ा था और उस असर को आजतक महसूस किया जा सकता है।

वीपी सिंह ने किन परिस्थितियों मंे मंडल आयोग की सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने वाली सिफारिश के अमल की घोषणा की थी, यह अब ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसने पूरे समाज को आलोड़ित कर दिया था। उसका सबसे बड़ा असर यह पड़ा कि पहले से आरक्षण पा रहे अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग और मंडल आयोग के तहत आने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग एक मंच पर आ गए थे।

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चूंकि आरक्षण का खूब विरोध हो रहा था और यह विरोध काफी हिंसक और कहीं कहीं आत्मघाती भी था, इसलिए आरक्षण पाने वाले समुदायों के बीच परस्पर अपनापन का बोध हुआ। और इसी बोध से एक नई राजनीति निकली, जिसे बहुजन राजनीति कहा जाता है। इस राजनीति में बहुत संभावनाएं थीं, लेकिन इसका नेतृत्व जातिवादी नेताओं के हाथ में था। उनके जातिवाद का पहला असर तो यह हुआ कि खुद विश्वनाथ प्रताप सिंह उस बहुजनवादी स्कीम से बाहर हो गए, क्योंकि वे आरक्षित तबके से नहीं थे। जातिवादी ओबीसी और दलित नेताओं ने न तो उनका नेतृत्व स्वीकार किया और न ही वह सम्मान दिया, जो उन्हें एक नई राजनीति शुरू करने के लिए मिलना चाहिए था।

पहली गद्दारी मुलायम सिंह यादव ने की। मुलायम की सरकार बिना भाजपा या कांग्रेस के समर्थन के उत्तर प्रदेश में बनी रह सकती थी, लेकिन वीपी सिंह के जनता दल से अलग होकर न केवल मुलायम ने वीपी सिंह को कमजोर किया, बल्कि खुद कांग्रेस के समर्थन पर वह आश्रित हो गए। वीपी सिंह से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले मुलायम की अपनी राजनीति समाप्त होती दिखाई दी, तो उन्होंने 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांशीराम और मायावती की बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन कर लिया।

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मुलायम यादव की इस नाजायज राजनीति से कांशीराम और मायावती जैसे नेता पैदा हुए। ये दोनों पहले से ही बहुजन समाज पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन इन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। उत्तर प्रदेश के 1989 और 1991 के विधानसभा चुनावों में बसपा को 11 -12 सीटें मिली थीं। एक बार मायावती सांसद भी बनी थीं, लेकिन 1991 में अपना चुनाव हार गई थीं।

कांशीराम ने 1980 के दशक में ही यह महसूस कर लिया था कि यदि दलित और ओबीसी का मोर्चा बन जाय, तो यह मोर्चा सत्ता में आ सकता है। लेकिन उस समय समस्या यह थी कि देश के स्तर पर दलितों को तो आरक्षण मिला हुआ था, लेकिन ओबीसी के आरक्षण के लिए बने मंडल आयोग की फाइल केन्द्र सरकार ने दबा रखी थी। उसके लिए कर्पूरी ठाकुर, चैधरी ब्रह्म प्रकाश, चन्द्रजीत यादव, महेन्द्र कुमार सैनी, रामअवधेश सिंह और मधु लिमये जैसे नेता लगातार आंदोलन कर रहे थे। अपनी सीमित शक्ति के साथ कांशीराम भी जब तब मंडल आयोग लागू करो कि नारेबाजी करवा देते थे।

कांशीराम की बहुजन राजनीति के लिए ओबीसी को आरक्षण मिलना जरूरी था। जनता दल का चुनावी घोषणा पत्र मधुलिमये जैसे विद्वान नेता लिखा करते थे और उन्होंने 1989 चुनाव के पहले जनता दल के घोषणा पत्र में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का वायदा डाल रखा था। उस वायदे का दबाव वीपी सिंह सरकार पर था। वीपी सरकार द्वारा बुलाए गए संसद के पहले ही संयुक्त सत्र में जिसे राष्ट्रपति संबोधित करते हैं, लोकदल केे राज्यसभा सांसद रामअवधेश सिंह और बसपा की लोकसभा सांसद मायावती में हंगामा खड़ा कर दिया। उन दोनों ने मंडल आयोग लागू करो के नारे लगाए और जनता दल के कर्पूरी ठाकुर और मुलायम के समर्थकों ने भी उनका साथ दिया।

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बहरहाल, मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की घोषणा हुई और इसके साथ ही दलित और ओबीसी का एक साझा मंच बहुजन नाम से तैयार हो गया। राजनीति पर इसका असर पड़ना लाजिमी था, लेकिन बिकाऊ नेतृत्व के कारण इससे कथित बहुजनों का नुकसान ही हो गया। बहुजन आंदोलन के नेता नैतिक रूप से कमजोर थे। वे लोभी थे और उनमें प्रतिबद्घता भी नहीं थी। बहुजन का नारा लगाकर सत्ता में आना और सत्ता की लूटपाट करना ही उनका उद्देश्य था। सत्ता की लूट में वे एक दूसरे से लड़ते और झगड़ते भी रहे और इस तरह कभी मिलते और कभी टूटते भी रहे।

मुलायम के वीपी द्वेष से पैदा हुए कांशीराम और मायावती ने सबसे पहले बहुजन आंदोलन से गद्दारी की। वे मुलायम के समर्थन से अपनी पार्टी के 67 विधायक जिताने में सफल हुए थे और उनके बूते उन्होंने भाजपा से समर्थन लेकर मुलायम का साथ ही छोड़ दिया। इस तरह उनकी बहुजन राजनीति उनके लालच का शिकार हो गई और उसके बाद समाज में जो कुछ होता रहा, वह तो बहुत ही शोचनीय है। विदेशी शक्तियां भारतीय जातिव्यवस्था में पैदा हो रहे विक्षोभ का लाभ उठाने लगी। बिकाऊ बहुजन बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तैयार हो गया और सत्ता के लिए हुई कथित बहुजन एकता को साम्प्रदायिकता की ओर मोड़ दिया गया। सांपद्रायिकता का वह स्वर हिन्दू धर्म और पहचान का विरोधी था। समाज में एक नई बीमारी पैदा हो गई और इस बीमारी की प्रतिक्रिया ने हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा को सत्ता में लाने का काम कर दिया।

अब सवर्णों को भी आरक्षण मिल गया है। इसके कारण देश की 100 फीसदी जातियां आरक्षण के दायरे में आ गई हैं। दलित और ओबीसी जातियों के आरक्षण के दायरे में आने से वे एक मच पर आ गई थीं और अनारक्षित तबका उनके विरोधी के रूप में उनके अस्तित्व को पहचान दे रहा था। अब जब सारी जातियां आरक्षण के दायरे में आ गई हैं, तो फिर आरक्षण पाने वाली ओबीसी और दलित जातियों के लिए एक काॅमन पहचान की जरूरत ही नहीं रही, क्योंकि यह पहचान आरक्षण विरोधी जातियों के कारण ही थीं। लिहाजा अब बहुजन विमर्श का अंत हो रहा है।

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ByUpendra Prasad

क्या सुप्रीम कोर्ट में टिक पाएगा आर्थिक आधार पर मिला आरक्षण

उपेन्द्र प्रसाद

मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर अनारक्षित तबकों को दिए जा रहे आरक्षण को लेकर एक सवाल यह खड़ा किया जा रहा है कि यह सुप्रीम कोर्ट में टिक ही नहीं पाएगा, क्योंकि पहले भी इस तरह के निर्णय कोर्ट द्वारा खारिज कर दिए गए हैं। अनेक राज्यों ने समय समय पर आंदोलनों के दबाव में आर्थिक आधार पर आरक्षण के फैसले किए और हमेशा सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालयों ने उन्हें खारिज कर दिया। अनेक बार अनारक्षित जातियों को ओबीसी श्रेणी का कहकर भी आरक्षण देने की कोशिश की गई, लेकिन वे सारी कोशिशें भी नाकाम रहीं।
राज्य सरकार की क्या बात, खुद केन्द्र सरकार ने भी 1991 में आर्थिक आधार पर तथाकथित सवर्णो को 10 फीसदी आरक्षण दिए थे। उस समय मंडल का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की पीठ ने की थी। पीठ ने सर्वसम्मति से आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण को खारिज कर दिया। इसका कारण बताते हुए यह कहा गया कि संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था ही नहीं है। उसमें स्पष्ट लिखा गया है कि नागरिकों के पिछड़े वर्ग को ही आरक्षण दिया जाएगा और पिछड़ेपन का आधार सामाजिक और शैक्षिक बताया गया है, आर्थिक नहीं। इसलिए आर्थिक आधार पर दिया गया आरक्षण असंवैधानिक माना गया।

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इसके अतिरिक्त खुद सप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दे रखी है कि आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके कारण ही ओबीसी को मात्र 27 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है, जबकि मंडल आयोग के अनुसार पिछड़ों की आबादी 52 फीसदी है और सिफारिश भी 52 फीसदी आरक्षण देने की की गई थी। हां, यह कहा गया था कि 50 फीसदी सीमा को ध्यान में रखते हुए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण फिलहाल दे दिया जाए और बाद में 50 फीसदी की सीमा को हटाकर उनका आरक्षण 52 फीसदी की दिया जाय।
लेकिन किसी सरकार ने 50 फीसदी की सीमा को हटाने के लिए संविधान में संशोधन नहीं किया और न ही आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए किसी प्रकार की संवैधानिक व्यवस्था की। इसका असर यह हुआ कि भिन्न निन्न आंदोलनों के दबाव मे सरकार ने जब जब आंदोलनकारी समूहों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की, कोर्ट में वह व्यवस्था खारिज हो गई।
क्या मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर दिए जा रहे 10 फीसदी आरक्षण का भी वही हश्र होगा? यह सवाल उठना लाजिमी है। तो इस सवाल का जवाब यही हो सकता है कि यदि संविधान में किसी तरह के बदलाव किए बिना यह फैसला किसी कानून के द्वारा अमल में लाने की कोशिश की जाती है, तो वह कोशिश विफल हो जाएगी। उस निर्णय को अदालत में चुनौती मिलने के बाद अदालत पहले वाले फैसले को दुहराते हुए उसे खारिज कर देगी। लेकिन यदि सरकार ने पहले से ही सावधानी बरती तो संभवतः सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाएगा।

केन्द्र सरकार की सावधानी यही हो सकती है कि वह संविधान की धारा 15 और 16 में बदलाव कर समाज के अनारक्षित तबकों के गरीब लोगों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था कर दे। यानी आर्थिक आधार पर आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था हो जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस आधार पर इसे खारिज नहीं कर पाएगा कि सरकार का वह निर्णय असंवैधानिक है।

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दूसरी अड़चन 50 फीसदी की सीमा है। यह सीमा संविधान ने तय नहीं की है। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई सीमा है और इसे संविधान की धारा 15 और 16 की व्याख्या करके ही तय किया गया है। कोर्ट का कहना है कि इन दोनों धाराओ मे जाति, धर्म, वर्ग, ल्रिग इत्यादि के आधार पर किसी तरह भेदभाव न किए जाने की व्यवस्था है और अपवाद के रूप में पिछड़े वर्गाें के लिए इस समतावादी व्यवस्था के उल्ल्ंाघन का प्रावधान है। मतलब नियम यह है कि भेदभाव नहीं होगा और अपभाद है कि नागरिकों के पिछड़े वर्गो के लिए भेदभाव किया जा सकता है। कोर्ट का कहना है कि यदि 50 फीसदी से अधिक का आरक्षण होता है, तो अपवाद ही नियम बन जाएगा और नियम है जो अपवाद हो जाएगा। इसलिए अपवाद को अपवाद बना रहने के लिए आरक्षण केा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं किया जा सकता।
फिलहाल संविधान की यह व्यवस्था भी संविधान का हिस्सा बन गई है और इसे खारिज करने के लिए संविधान में संशोधन कर स्पष्ट किया जा सकता है कि यह सीमा 60 फीसदी की जाती है या 50 फीसदी से ऊपर जो आरक्षण दिया जा रहा है वह संविधान के उस नियम का हिस्सा है, जो समान अवसर का अधिकार देता है और भेदभाव के खिलाफ है, क्योंकि इस तरह के आरक्षण में धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र, रेस इत्यादि के आधार पर भेदभाव नहीं किया गया है, बल्कि भेदभाव आर्थिक आधार पर किया गया है।
यह तो निश्चित है कि सुप्रीम कोर्ट मे इस निर्णय को चुनौती दी जाएगी और उसमे कहा जाएगा कि 50 फीसदी की सीमा का उल्लंधन संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट मे इसके पक्ष और खिलाफ मे तर्क दिए जाएंगे। फैसला तो अंततः सुप्रीम कोर्ट ही करेगी, लेकिन मंडल मुकदमे मे ओबीसी आरक्षण की पैरवी करने वाले वकील रामजेठमलानी ने अपने एक भाषण में एक बार कहा था कि आरक्षण की 50 फीसदी सीमा के टूटने से संविधान का मूल ढांचा टूटना साबित नहीं हो पाएगा, क्योंकि मूल ढांचा क्या है, इसका निर्घारण जज अपने मत के अनुसार नहीं कर पाएंगे और उन्हे संविधान में ही देखना होगा कि क्या 50 फीसदी की सीमा मूल ढांचे का हिस्सा है या नहीं। चूंकि ऐसा कहीं सविधान मे ंनहीं लिखा हुआ है, इसलिए कोर्ट कुछ भी नहीं कर पाएगा।(संवाद)

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ByUpendra Prasad

अम्बेडकर और इस्लाम 2ः बाबा साहब क्यों थे इस्लाम के आलोचक

पवन प्रजापति

पिछले पोस्ट मे मैने बताया था कि बाबासाहब अम्बेडकर हिन्दुइज्म के साथ-साथ इस्लाम की कट्टरता के भी निन्दक थे, पर उनके नाम पर बने बामसेफ जैसे संगठन इन बातों को छुपाते हैं!

बाबासाहब समय-समय पर इस्लाम की आलोचना करते थे, उसी को आगे बढ़ाते हुये अम्बेडकर ने भारत के मध्यकालीन इतिहास को अपनी किताब ‘पाकिस्तान अथवा भारत के विभाजन’ मे दर्शाया है!

डा० अम्बेडकर ने किताब के पृष्ठ-70 से महमूद गजनवी के आक्रमण के बारें मे लिखना शुरू किया है, यह बात आपको समझ लेना चाहिये कि अम्बेडकर बड़े उच्चकोटि के इतिहासकार भी थे!

बाबासाहब ने गजनवी के इतिहासकार ‘अल उतबी’ कि किताब से प्रमाण देते हुये लिखा है कि- “गजनवी का भारत पर आक्रमण ‘जिहाद’ छेड़ने की बराबरी थी, उसने मन्दिरों से मूर्तियों को तोड़कर इस्लाम की स्थापना की! उसने नापाक काफिरों और मूर्तिपूजकों को मार मुसलमानों को गौरवान्वित किया! और जब वह भारत मे पहली विजय करके घर (गजनी) लौटा तो उसने संकल्प लिया कि वह हर साल हिन्द (भारत) के खिलाफ इसी तरह जिहाद करेगा”

उक्त कथन इतिहासकार अल उतबी ने लिखा है, और सब जानते थी है गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया था!

एक दूसरे इतिहासकार ‘हसन निजामी’ ने गजनवी की तारीफ मे लिखा है कि- “उन्होने अपनी तलवार से हिन्द मे काफिरों की गन्दगी को साफ किया और पापमुक्त किया, और देश को बहुदेववाद के कलंक से स्वच्छ किया! मूर्तिपूजा की अपवित्रता को तवाह कर अपने शाही शौर्य से मन्दिरों को उखाड़ फेंका”

बाबासाहब आगे लिखते हैं कि भारत पर जितने भी इस्लामी आक्रमण हुये चाहे वो मंगोल हो, चाहे अफगान या तातार,, ये सभी आपस मे भी दुश्मन थे, पर सारे विवादों और संघर्षों के बावजूद इन सभी हमलावरों का एक सामूहिक उद्देश्य था, वह था “हिन्दू धर्म का विध्वंस”

बाबासाहब पृष्ठ-71 पर लिखते हैं कि ये सभी आक्रमणकारी मजहबी जोश मे थे, ये हिन्दुओं को पकड़कर जबरन खतना करते थे, और औरतों-बच्चों को गुलाम बनाते थे! ये हिन्दुओं के घर और मन्दिरों को लुटते थे और इस्लामी नियम के अनुसार पाँचवां भाग बादशाह को देकर बाकी धन सैनिक आपस मे बांट लेते थे!

बाबासाहब ने ‘तबकाते-नसीरी’ किताब के हवाले से लिखा है-

“विजेताओं ने भयंकर लूटपाट की, नालंदा ( बिहार) के अधिकांश निवासी ब्राह्मण थे, जिनके सिर मुड़े थे! बहुत भारी संख्या मे पुस्तकें प्राप्त हुई, पर अर्थ न मालूम होने की वजह से सबको नष्ट कर दिया गया”

डा० अम्बेडकर मे महमूद गजनवी के सोमनाथ पर हमले का भी जिक्र करते हुये पृष्ठ-72 पर लिखा है कि उसने (गजनवी) मन्दिर को विध्वंस कर प्रतिमा को ले जाने का साहसिक कृत्य किया, मिन्हाज-अस-सिराज के अनुसार गजनवी ने मूर्ति के चार टुकड़े कर दिये और उसका एक भाग गजनी के जामा मस्जिद मे जमा करा दिया! दूसरे को शाही महल के प्रवेश द्वार पर रखा, तीसरे भाग मक्का और चौथा भाग मदीना भेज दिया!

बाबासाहब ने इसी किताब मे सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बारें मे भी लिखा है!

डा० अम्बेडकर ने लिखा है कि- “चौदहवीं सदी के प्रारम्भ मे ही खिलजी को हिन्दूओं से काफी संघर्ष करना पड़ा, और चिढ़कर खिलजी ने हिन्दुओं पर अलग से कर लगा दिया था, तथा उन्हे सवारी के लिये घोड़ा रखने की इजाजत नही थी, यही नही खिलजी के शासन मे हिन्दू अच्छे कपड़े भी नही पहन सकते थे”

बाबासाहब के लेखों से यह स्पष्ट था कि इस्लामी आक्रमण मूलतः हिन्दुओं के मन्दिरों का विनाश, उनसे लूटपाट और धर्मपरिवर्तन पर अधिक केन्द्रित था! यह सब करने के लिये मुस्लिम शासक तलवार का सहारा लेते थे, और गले काटने से भी बिल्कुल नही हिचकते थे!

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ByUpendra Prasad

अम्बेडकर और साम्यवाद: कम्युनिस्ट विचारधारा के विरोधी क्यों थे बाबा साहब

पवन प्रजापति

अम्बेडकर का मानना था कि साम्यवादी विचारधारा एक अपूर्ण विचाराधारा है, जिसका आधार ही बल-प्रयोग है! अम्बेडकर को वामपंथियों पर सबसे अधिक रोष इस बात के लिये आता था कि वे जातिवाद के खिलाफ कुछ नही बोलते थे! अम्बेडकर कहते थे कि वामपंथी दो-मुँहें सांप होते हैं, ये पूँजीवाद के खिलाफ तो बोलते हैं पर जातिवाद पर मुँह भी नही खोलते। अम्बेडकर कहते थे कि अछूतपन का मूल अर्थ-व्यवस्था नही बल्कि जाति-व्यवस्था है! जातिवाद और अछूतपन दोनो साथ-साथ खड़े हैं और गिरेंगे तो साथ-साथ ही! दोनो को एक-दूसरे से अलग नही किया जा सकता।

अम्बेडकर कहते थे कि जातिवाद मानवता को निगलने के लिये हर चौराहे पर मुँह फैलाये खड़ा है, बिना इस जातिरूपी-दानव को मारे राजनैतिक सुधार सम्भव ही नही है! दूसरी बात अम्बेडकर का मानना था कि भारत मे जातिव्यवस्था ही अर्थव्यवस्था की जननी है! जितनी ऊँची जाति उतनी अधिक आर्थिक सक्षम और जितनी नीची जाति उतनी ही आर्थिक तंगी! अम्बेडकर कहते थे कि भारत की सबसे बड़ी समस्या जातिप्रथा ही है! वैसे भी साम्यवाद का उदय युरोप मे हुआ, और वहाँ की समस्या पूँजीवाद ही थी, क्योंकि वहाँ जातिवाद तो है नही!

अतः कार्ल मार्क्स ने उसी पर फोकस किया! यदि उन्हे भारत के जातिवाद के बारे मे पता होता तो वे भी मानते कि यही दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है! शायद यही कारण है कि उनका साम्यवाद भारत से तालमेल नही बैठा पा रहा है। अम्बेडकर को उस समय ही पता था कि चालाक वामपंथी दलितों को फुसलाने के लिये कोई न कोई षणयन्त्र जरूर करेंगे, इसलिये वे दलितों को हमेशा वामपंथियों से दूर रहने की सलाह देते थे!

अम्बेडकर ने लिखा है- “मै आप (दलितों) लोगों को आगाह करना चाहता हूँ कि आप कम्युनिस्टों से बचकर रहिये, क्योंकि पिछले कुछ सालों से वो कामगारों का नुकसान ही नही कर रहे बल्कि उनके दुश्मन भी हैं। भारतवर्ष मे कम्युनिस्टों की अपनी कोई नीति नही है, इन्हे सारी चेतना रूस से मिलती है। यदि कम्युनिस्टों को भारतीय कामगारों से सचमुच हमदर्दी होती… जैसा कि वे कहते हैं तो उन्होने कामगारों के लिये एक स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी का गठन क्यों नही किया। इसीलिये मै आप लोगों से कहना चाहता हूँ कि आप लोग उनसे बचकर रहिए, उन्हे अपने “शेड्यूल कास्ट फेडरेशन” का उपयोग उनके प्रचार के लिये मत करने दीजिये।”

अम्बेडकर अच्छी तरह से जानते थे कि जो समता-मूलक बातें कार्ल मार्क्स के शिष्य जबरन लोगों पर थोपना चाहते हैं, वो हमारे भक्ति-कालीन संत अपने दोहों के माध्यम से बताते थे! संत रविदास ने लिखा है- ऐसा चाहू राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।” इन दो लाइनों मे तो पूरा मार्क्सवाद समाया है, इसके अलावा संत कबीर कहते थे- “ना कुछ देखा भाव-भजन मे, ना कुछ देखा पोथी मे। कहें कबीर सुनो भाई सन्तों, जो देखा सो रोटी मे।।” मैने खुद भी अपने बचपन मे पूर्वजों को यह कहते सुना है कि- ‘भूखे भजन न होय गोपाला। ले लो अपनी कंठी माला।।’

जब हमारे देश मे पहले से ही समतावादी और सर्वाहारा की बातें होती थी, फिर भला एक तानाशाही विचारधारा उगाने की क्या जरूरत? शायद इसीलिये अम्बेडकर ने इस किताब के अन्त मे भी दलितों से आग्रह किया है कि- “मैने आपके सामने अपने विचार रखे, आप कम्युनिस्टों की सफलता के आकर्षण मे न पड़े! मुझे विश्वास है कि यदि हम लोगो मे बुद्ध का दसवां हिस्सा भी जागृत हो जाये तो वही परिवर्तन हम प्रेम, न्याय और भाईचारे के साथ ला सकते हैं” मै पढ़े-लिखे दलितों से यही कहूँगा कि अब जब वामपंथी अम्बेडकर का नाम लेकर आपको बरगलाने आये तो उन्हे अम्बेडकर के वामपंथ पर इन विचारों को जरूर बताये, मुझे विश्वास है कि अगली बार कोई वामपंथी दलित फेडरेशन का फायदा उठाने की कोशिश नही करेगा।

 

 

 

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राजस्थान की हिंसा: क्या भारत एक जातिवादी लोकतंत्र बन गया है?

उपेन्द्र प्रसाद

सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजस्थान में जो हिंसा हुई है, वह अभूतपूर्व है। हिंसा भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए कोई नई घटना नहीं है। अपनी मांगों के समर्थन में और सरकार के किसी फैसले के खिलाफ हिंसक आंदोलन खूब होते रहे हैं। आरक्षण के मसले पर अबतक शायद सबसे ज्यादा हिंसा हुई है। राजस्थान में भी इस तरह की हिंसा खूब हुई है। ओबीसी आरक्षण के लिए वहां जाट हिंसक आंदोलन किया करते थे। इसमें वे सफल भी हुए और वहां के दो जिलों को छोड़कर अन्य सभी जिलों के जाट अब ओबीसी हैं। फिर गुज्जरों की हिसा होने लगी। जाटों के ओबीसी में शामिल होने के कारण उनके लिए उस श्रेणी में जाटों से प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो गया। तो फिर गुज्जरों ने अपनी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करवाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। उनके आंदोलन कई बार हुए। उसमें कई लोग मारे गए। सार्वजनिक संपत्ति का भारी नुकसान हुआ। सड़कों को जाम किया गया और रेलगाड़ियों को रोका गया। गुज्जरों के आंदोलन के विरोध में मीणा समुदाय भी सड़क पर आ गया। वह वहां पहले से ही अनुसूचित जाति में शामिल हैं और उन्हें यह मंजूर नहीं कि गुज्जर भी उनकी श्रेणी में आ जाय। समय समय पर राजपूतों और ब्राह्मणों ने भी ओबीसी में शामिल होने के लिए आंदोलन किए।

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इसलिए राजस्थान जाति आंदोलन की हिंसा का पिछले कुछ दशकों से साक्षी रहा है। लेकिन कोई जाति विशेष अपनी जाति के नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए हिंसा करे और सार्वजनिक या निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाए, ऐसा न तो राजस्थान में और न ही किसी अन्य प्रदेश में देखा गया था। राजनैतिक कार्यकत्र्ता अपनी बात मनवाने के लिए नेतृत्व पर दबाव डालते रहे हैं। इसके लिए वे नेताओं के घरों और पार्टी कार्यालयों में भी प्रदर्शन करते रहे हैं। कभी कभी उनका प्रदर्शन हिंसक भी हो जाता है, लेकिन उनकी हिंसा उनकी अपनी पार्टी तक ही सीमित रहती है। टिकट न मिलने पर अपनी पार्टी कार्यालयों में उनके द्वारा तोड़फोड़ की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। नेताओं का घेराव भी देखा जाता है और कभी कभी नेताओं की पिटाई भी हो जाती है, लेकिन ऐसा कभी नहीं देखा गया कि वे लोग सड़क पर आ गए और उन लोगों पर भी हमला करना शुरू कर दिया, जिनका न तो उनकी पार्टी से कोई संबंध है और न ही उनके नेता से।
लेकिन राजस्थान में यह सब हुआ। सचिन पायलट गुज्जर समुदाय से हैं और राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमिटी के नेता भी। पार्टी को मजबूती प्रदान करने में उनकी भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता और इसके कारण मुख्यमंत्री पद पर किया गया उनका दावा गलत भी नहीं। लेकिन कांग्रेस के अंदर मुख्यमंत्री के चयन का अपना अलग अंदाज रहता है। सैद्धांतिक रूप से विधायक दल के नेता का चुनाव पार्टी के विधायक ही करते हैं और पार्टी के बहुमत में रहने या सरकार बनाने की स्थिति में वह नेता ही मुख्यमंत्री बनता है। लेकिन व्यवहार में कांग्रेस में नेता आलाकमान द्वारा तय होता है। आलाकमान विधायकों की इच्छा और अपनी पसंद- नापसंद का ख्याल करते हुए नेता तय कर देता है और विधायक दल में उसका औपचारिक चुनाव हो जाता है।

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राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलौत के बीच मुख्यमंत्री बनने के लिए होड़ लगी हुई थी। दोनों राहुल गांधी के बेहद करीबी रहे हैं। गहलौत 10 साल तक राजस्थन के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और सचिन पायलट तो मुख्यमंत्री पद पर दावा करने के समय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी थे। इसलिए दोनों के दावे मजबूत थे और यह कहा नहीं जा सकता कि किनका दावा ज्यादा मजबूत था। चूंकि विधायकों के बीच नेता के चुनाव के लिए मतदान भी नहीं हुए, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन दोनों में से किसके साथ ज्यादा विधायक थे। जब विधायक दल ने सर्वसम्मति से नेता चयन का अधिकार राहुल गांधी को दे दिया, तो उनकी पImage result for violence rajasthan pilotसंद का सम्मान किया जाना चाहिए था।

 

पर गुज्जरों ने उसी प्रकार की हिंसा शुरू कर दी, जैसा वे अनुसूचित जाति की श्रेणी में अपने को शामिल कराने के लिए कर रहे थे। आपकों आरक्षण मांगना है मांगिए। उसके लिए आंदोलन करना है कीजिए। यदि हिंसक हो जाते हैं, तो उसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहिए। लेकिन अपनी जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने के लिए आंदोलन कर जनजीवन को अस्त-व्यस्त करना किसी भी मायने में उचित नहीं। हिंसा किसी भी हालत में निंदनीय है और जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने के लिए किया गया यह उपद्रव तो लोकतंत्र को लहुलूहान करने वाला है।
भारतीय लोकतंत्र में जाति एक बड़ा फैक्टर है। जाति के आधार पर अधिकांश उम्मीदवार तय किए जाते हैं। चुनाव में उम्मीदवार संसाधन और कार्यकत्र्ता भी जाति के आधार पर प्राप्त करते हैं और वोट भी जाति के आधार पर मांगे जाते हैं। कुछ जातियों ने तो अपने अपने नाम की पार्टियां तक बना रखी हैं और अनेक पार्टियां तो सिर्फ जाति आधारित ही हैं। जाति आधारित फूहड़पन को हमारा देश देख रहा है। हम देख चुके हैं कि जिस जाति के व्यक्ति को किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो उसका जश्न उसकी जाति के लोग किस तरह मनाते हैं।
और अब राजस्थान में यह देख चुके हैं कि अपनी जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने के लिए किस तरह उत्पात मचाया जाता है। इसके कारण यह सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि क्या हमारा लोकतंत्र अब पूरी तरह जातिवादी लोकतंत्र बन गया है? और यह भी सवाल उठता है कि इस तरह का लोकतंत्र कबतक चलेगा और इस जातिवादी लोकतंत्र का क्या भविष्य है? यह सच है कि समतवादी लोकतंत्र और जाति आधारित विषमतावादी समाज के बीच आजादी के बाद से ही संघर्ष चल रहा है। और लोकतंत्र और जाति के बीच चल रहे इस संघर्ष में जाति लगातार लोकतंत्र पर हावी होती जा रही है। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और जिसे भी लोकतंत्र से प्रेम है, उसे इस तरह की जातिवादी प्रवृतियों के खिलाफ मुखर होना ही होगा। अन्यथा हमारा लोकतंत्र सुरक्षित नहीं है।

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ByUpendra Prasad

एससी/एसटी एक्ट ने डुबोई भाजपा की नैया

उपेन्द्र प्रसाद

तीन हिन्दी प्रदेशों में भाजपा को मिली हार अप्रत्याशित नहीं है। पिछले कुछ समय से देश का राजनैतिक माहौल कुछ ऐसा बन रहा था, जिसके कारण भारतीय जनता पार्टी का सितारा गर्दिश में जाता प्रतीत हो रहा था। यह सच है कि नोटबंदी और जीएसटी की यादों से लोग मुक्त हो चुके थे, लेकिन एससी/एसटी एक्ट के कारण देश की अधिसंख्य आबादी के लोग भाजपा सरकार से बहुत नाराज हो गए थे।

भाजपा के लिए सबसे अधिक चिंता की बात यह थी कि नाराज होने वाले लोगों में वे ही लोग ज्यादातर थे, जो उन्हें सत्ता में लाया करते थे। सवर्ण और ओबीसी के कारण ही भाजपा की सरकारें बनती रही हैं। मुस्लिम और दलित उन्हें वोट नहीं देते हैं। मुस्लिम वोटों की तो भाजपा को परवाह नहीं है, लेकिन दलित मतों के लिए वह 2014 से ही बहुत ज्यादा सक्रिय है और प्रधानमंत्री सत्ता संभालने के बाद ही भीम भीम की माला जप रहे हैं। उन्हीं कोशिशों के तहत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए एससी/एसटी एक्ट को अपने मूल रूप में स्थापित कर दिया। इसके कारण उन्हें दलितों का वोट तो नहीं मिला, लेकिन उनके सवर्ण और ओबीसी मतदाता उनसे जरूर भड़क गए और इसका खामियाजा उनकी पार्टी को पिछले चुनावों में भुगतना पड़ा है।

एससी/एसटी एक्ट पर मोदी सरकार द्वारा दिखाई गई सक्रियता एक और कारण से प्रधानमंत्री के गले की फांस बनी हुई है। भाजपा के मूल समर्थक अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित स्थल पर रामलला का भव्य मंदिर चाहते हैं। उस स्थल का विवाद सुप्रीम कोर्ट में है। अब उनका कहना है कि यदि एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए कानून बनाया जा सकता है, तो फिर राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट को धता बताने में क्या दिक्कत है। उनके समर्थक इस विवाद से संबंधित कानूनी पेचदगियों को समझने के लिए तैयार नहीं हैं और मंदिर निर्माण के लिए नरेन्द्र मोदी पर दबाव डाल रहे हैं। उनमें से कुछ तो भाजपा के विरोध तक जाने की हद तक नाराज हो चुके हैं। भाजपा की इन तीनों राज्यों मंे हार का एक कारण यह भी है। हालांकि सच यह भी है कि संघ और संघ परिवार भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए वह सब कुछ रहा था, जो उनसे संभव था। इसके कारण ही तीनों राज्यों में रिकाॅर्ड मतदान हुए। मध्यप्रदेश और राजस्थान में पराजित होने के बावजूद भाजपा ने कांग्रेस को कड़ी टक्क्र दी। मध्यप्रदेश में तो उसे बहुमत पाने से भी रोक दिया। राजस्थान में भी कांग्रेस अपने टिकट पर बहुमत नहीं पा सकी, हालांकि अपने चुनाव पूर्व सहयोगियों की सहायता से वह बहुमत के आंकड़े को छू चुकी है।

भाजपा चुनाव हार चुकी है, लेकिन कांग्रेस के लिए भी मध्यप्रदेश और राजस्थान में जश्न मनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह सिर्फ भाजपा पर बढ़त का दावा कर सकती है, जीत का नहीं। छत्तीसगढ़ में उसकी निर्णायक जीत जरूर हुई है, लेकिन उसके लिए वह खुद नहीं, बल्कि वहां की परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से ग्रस्त राज्य है और प्रदेश तथा केन्द्र में भाजपा की सरकार होने के कारण वहां नक्सलियों पर पुलिस और सुरक्षाबलों पर काफी दबाव बढ़ा हुआ था। दोनों सरकारें छत्तीसगढ़ की जमीन जंगल और जल को काॅर्पोरेट के हाथों बेचने को सक्रिय थे। नक्सलियों का कांग्रेस से कोई प्रेम नहीं है, लेकिन उन्होंने इस बार उनकी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, क्योंकि उन्हें लगा कि केन्द्र और राज्य सरकारों में अलग अलग पार्टियों की सरकारें होना उनके हित में है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में भी भारी मतदान हुए और वह मतदान कांग्रेस के पक्ष में गया। रमन सिह सरकार ने एक पत्रकार को एक कथित सीडी कांड में गिरफ्तार कर लिया था। वह पत्रकार छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल का रिश्तेदार भी था। श्री बघेल को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। इसके कारण बघेल के प्रति छत्तीसगढ़ में सहानुभूति का भाव था। जेल जाने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें उनके अध्यक्ष पद से नहीं हटाया था। इसका लाभ कांग्रेस को हुआ। राहुल गांधी द्वारा किसानों की कर्जमाफी की घोषणा का भी किसानों द्वारा भारी स्वागत हुआ। इन सब कारणों के सम्मिलित प्रभाव ने वहां कांग्रेस को भारी बहुमत से सत्ता थमा दी है।

तीन राज्यों को भाजपा गंवा चुकी है। ये तीन राज्य वे हैं, जो भाजपा का अपने जन्मकाल से ही सबसे मजबूत गढ़ रहे हैं। राजस्थान और अविभाजित मध्यप्रदेश, जिसका एक हिस्सा अभी झारखंड है, मंे भारतीय जनता पार्टी और उसके पहले भारतीय जनसंघ कांग्रेस को चुनौती देने वाली एक मात्र पार्टी हुआ करती थी। अन्य राज्यों में तो भाजपा बाद मेें मजबूत पार्टी बनी। अब उन राज्यों मंे ह ीवह सत्ता से बाहर हो चुकी है। और उसके बाद सवाल उठता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का क्या होगा? नरेन्द्र मोदी भाजपा के लिए वोट जुगाड़ करने वाले सबसे बड़े नेता हैं। भाजपा में उनका अभी कोई विकल्प नहीं है। क्या वे 2019 के लोकसभा चुनाव मंे अपनी पार्टी को एक बार फिर सत्ता दिला सकेंगे- यह आज का सबसे बड़ा राजनैतिक सवाल है।
यदि मोदी मैजिक की बात की जाय, तो छत्तीसगढ़ में वह मैजिक नहीं चला, लेकिन राजस्थान में वह मैजिक अवश्य चला है, क्योंकि वहां भाजपा की एक बड़ी हार की संभावना व्यक्त की जा रही थी। इसका कारण यह है कि पिछले कुछ उपचुनावों में वहां भाजपा की करारी हार हुई थी। वहां का पूरा माहौल भाजपा और खासकर वसुधरा के खिलाफ था, लेकिन मोदी की कुछ रैलियों के बाद वहां की फिजा बदली और भारतीय जनता पार्टी फिर मुकाबले में आ गई और उसने कांग्रेस को बड़ी जीत से वंचित कर दिया। लेकिन दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में शायद मोदी का जादू नहीं चला। वहां एससी/एसटी एक्ट को लेकर समाज के कुछ तबके में बहुत रोष था और वह रोष मोदी मैजिक पर भारी पड़ा, हालांकि किसानों की समस्या जैसे अन्य मसले भी उसके खिलाफ काम कर रहे थे। तीन राज्यों की हार ने मोदी सरकार की 2019 के बाद वापसी पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं।

 

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ByUpendra Prasad

हम बिहारवासियों के लिए एक आखिरी उम्मीद उपेन्द्र कुशवाहा हीं हैं !

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मौर्यवंशी शशिकांत मेहता

कुछ हमारे कुर्मी मित्र बंधु हैं जो बिहार में आये दिन रालोसपा कार्यकर्ता व ज्यादातर कुशवाहा समाज के लोगो की हत्या, अपहरण जैसे घटना पर बड़े भोले बन कर कहते हैं कि इन घटनाओं के पीछे कौन लोग है उसको कुशवाहा समाज को जाँच करनी चाहिए । इन घटनाओं पर उपेन्द्र कुशवाहा जी को केन्द्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा दे कर राजनीति करनी चाहिए, वगैरह वगैरह ।

अब जब मैं इन कुर्मी मित्रों के टाइम लाइन जब देखता तब कहीं पर बिहार के कुशासन के खिलाफ एक शब्द तक नहीं मिलते, रालोसपा कार्यकर्ता या कुशवाहा समाज के साथ आये दिन हो रहे हत्या-अपहरण पर एक सिम्पैथी पोस्ट तक नहीं मिलता ! फिर यह अचानक कुशवाहा प्रेम उमड़ना ??

उपेंद्र कुशवाहा ने NDA से अलग होने के दिए संकेत, कहा- 'याचना नहीं अब रण होगा, संघर्ष बड़ा भीषण होगा'

दरअसल यह कुशवाहा समाज से प्रेम नहीं है बल्कि एक सोंची-समझी शातिर राजनीति है । राजनीति यह है कि बिहार के कुशासन के खिलाफ उपेन्द्र कुशवाहा ने पिछले कुछ सालों से हमला बोल रखा है खासकर शिक्षा के खिलाफ । बिहार के इस वास्तविक मुद्दे पर नीतिश कुमार घिरता देख व उपेन्द्र कुशवाहा जिसके पास उनके अपने समाज का भी बड़ा वोट बैंक है जिसकी फसल अबतक नीतिश कुमार काटा करते थे वह खिसकता जा रहा था । यहीं महत्वपूर्ण मजबूरी नीतिश कुमार को पतलचाट कर भाजपा के तरफ आ कर अपनी राजनीति बचाने को मजबूर होना पड़ा । आप जरा गौर करेंगे जब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी तब सबसे पहले उन्होंने शिक्षा मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा के स्वजातीय कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा को बनाया जबकि उससे पहले महागठबंधन सरकार में वे पीएचडी व कानून मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे थे । आप अगर मेरे पुराने पोस्ट को देखिए तभी मैंने कहा था कि कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा को शिक्षा मंत्री सिर्फ उपेन्द्र कुशवाहा के दवाब के कारण बनाया गया है ताकि उपेन्द्र कुशवाहा शिक्षा का मुद्दा न उठा सकें और उठायेंगे तो कुछ पतलचटवन कोईरी के मदद से इन दोनों के जातिए लड़ाई बना कर कुशवाहा समाज को तोड़ देंगे जिससे उपेन्द्र कुशवाहा खुद कमजोर हो जायेगा ।

खैर ऐसा हुआ नहीं और उपेन्द्र कुशवाहा लगातार जनहित से जुड़े मुद्दा शिक्षा को लेकर राज्य सरकार पर हमलावर रहे । चुकी उपेन्द्र कुशवाहा एक केन्द्रीय शिक्षा मंत्री हैं साथ हीं NDA के एक पार्टनर भी इसलिए जाहिर सी बात है इस मुद्दे को मीडिया में भी खुब जगह पाई और जनता के बीच भी इस अहम मुद्दे पर खुब चर्चा भी हो रही है और बिहार सरकार की किरकिरी भी ।

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अब इस मुद्दे को भटकाने के लिए नीतिश कुमार के नेतृत्व में जदयु ने दुसरे रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया…..

1. रालोसपा को कैसे साम-दंड से तोड़ कर उपेन्द्र कुशवाहा को कमजोर किया जाए

2. मुजफ्फरपुर बाल गृह योन उतपिड़न में मुख्य आरोपियों को छोड़ मंजू वर्मा को फंसाया गया ताकि इस पर उपेन्द्र कुशवाहा समर्थन करने पर आम जनता के बीच या विरोध करने पर कुशवाहा समाज के बीच दोनों हीं स्थितियों में इसे बदनाम किया जाए पर कामयाब नहीं हुए ।

3. जितने भी पतलचटवन कोईरी हैं उनको अपने घर बुला कर उपेन्द्र कुशवाहा के खिलाफ समाज को भड़काने का टास्क पकड़ा दिया गया और लालच भी खुब दिया गया ।

4. जदयु के सिलिपर सेल में जो हैं उन्हें कुशवाहा समाज के वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक रूप से सक्षम व एक्टीव हैं उन्हें टार्गेट कर रास्ते से हटाने के लिए लगा दिया गया जिसका कारण है बिहार में आये दिन कुशवाहा समाज के ऊपर हमले ।

अब नीतिश कुमार अपने लोगों के माध्यम से बिहार की जनता व कुशवाहा समाज में असफल प्रयास यह अफवाह फैला कर रहें हैं कि उपेन्द्र कुशवाहा NDA में रहते हुए जनता की आवाज बन सड़क पर उतर कर सिर्फ दिखावा कर रहें हैं और उन्हें सत्ता का लोभ है इसलिए इस्तीफा नहीं दे रहें हैं !

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दरअसल मामला यह नहीं है बल्कि बहुत हीं पेंचिदा राजनीतिक खेल है जिसे समझना होगा । जैसा मैंने पहले हीं कह चुका हूँ कि उपेन्द्र कुशवाहा एक केन्द्रीय मंत्री हैं और NDA का पार्टनर भी इसलिए जैसे हीं अपनी हीं सरकार जो जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बल्कि लूटतंत्र में मस्त है उसके खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उससे न सिर्फ इस लूटेरी सरकार की किरकिरी होती बल्कि यह स्टेट मीडिया से लेकर सेंट्रल मीडिया तक के खबरों में आती है जिससे इस निकम्मी सरकार की चर्चा में सच्चाई देश व राज्य की जनता के बीच ज्यादा तेजी से पहुँचती है ! यहीं कारण है कि इनके पतलचटवन लोग, भांड मीडिया इन पर इस्तीफे व NDA से अलग होने का दवाब बनाते हैं ताकि इसमें मंदबुद्धि के राजनीति लोग झांसे में आ कर इनका विरोध कर इस्तीफे के लिए तैयार कर दे जिससे जनता के असल मुद्दों पर मीडिया के माध्यम से चर्चा होना बंद हो जाए और सरकार अपनी किरकिरी से । पर उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली है ! वह नीतिश कुमार के हर चाल से वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि अपने राजनीतिक हीत साधने के लिए नीतिश कुमार किसी भी हद् तक गिर सकते हैं बस उन्हें और गिराना है तथा जनता के बीच उनके तथाकथित आदर्शवाद को नंगा करते रहना है ।

आदर्शवाद के चोला ओढ़े एक शातिर धुर्त राजनीतिक नीतिश कुमार को उपेन्द्र कुशवाहा के रूप में एक साक्षात काल है जो उनकी घटिया राजनीति को समाप्त कर देगा वर्ना इसके सिवाय कोई और नहीं है जो ऐसे धुर्त शातिर राजनीतिज्ञ की राजनीति को कोई समाप्त कर सकता है । हम बिहारवासियों के लिए एक आखिरी उम्मीद उपेन्द्र कुशवाहा हीं हैं ! अब वे कब तक NDA में रहेंगे और आगे का क्या रणनीति अपनाएँगे वह उनके ऊपर है । बस हमें सिर्फ इस नैतिक, लूटेरी सरकार का खात्मा हो बस ।

(From the Facebook Wall of मौर्यवंशी शशिकांत मेहता. This was written just before exit of Upendra Kushwaha from NDA)

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संभालिए हुजुर सरकार का इकब़ाल मर गया है…

हरिशंकर शाही

सरकार कहने को तो मात्र एक शब्द है, लेकिन इसकी विवेचना बहुत ही भारी है. क्योंकि इस शब्द के साथ हमें पीढ़ियों से यही पता है कि यह शासन, ताकत, एक सत्ता और अजेय व्यवस्था का नाम है. यानी एक ऐसी व्यवस्था जो देश की भौगोलिक सीमा में मौजूद हर आदमी से बड़ी है उसकी भाग्य विधाता है, उसकी रक्षक है और उसकी पालक है. यानी सरकार एक ऐसी व्यवस्था का नाम है जहाँ वह सारे औजारों के साथ नागरिक के साथ खड़ी होती है. यानी नागरिक समाज को एक व्यवस्था देती है.

वैसे आदर्श लोकतंत्र को जाने देते हैं लेकिन राजशाही के लिए भी यही कहा और माना जाता है कि उसकी सत्ता-सरकार भी ऐसी ही होगी. यानी प्रजापालक राजा की ही कहानी राजशाही के लिए भी अच्छी मानी जाती है. जंगलराज यानी अपनी ही प्रजा के लिए अगर अपनी ही व्यवस्था खतरा बन जाए, तो उस व्यवस्था यानी सरकार को ना तो राजतंत्र ना ही प्रजातंत्र और ना ही लोकतंत्र में अच्छा माना जाएगा.

तो फिर अगर हम देश में चल रही वर्तमान सरकारों को देखें तो क्या दिखता है. मसलन केंद्र सरकार को देखिए तो कहीं नीरव मोदी भाग रहे हैं, तो कहीं विजय माल्या को विदेश में शरण मिल रही है. कहीं रातों रात 100 करोड़ से अधिक जनता के पास पड़े पैसे अवैध ठहरा दिए जा रहे हैं. मतलब जिस देश में चिट्ठी टाइम से नहीं पहुँचती है जहाँ आज भी नेटवर्क नहीं आता है वहाँ के लोगों को रातो-रात इंटरनेट बैंकिंग के फायदे सीखने पर मजबूर कर दिया जाता है. मतलब कैसा और क्या तमाशा चल रहा है, जिसकी ऐसी मिसालें तो शायद ही किसी समाजशास्त्र या राजनीति शास्त्र की किताबों में मिले.

खैर यह तो जो है सो है ही, लेकिन कोढ़ में खाज यह है कि अब तक जो संस्थाएँ सरकार की शक्तियाँ या औज़ार मानी जाती थीं, वे ही संदेह के दायरे में आ रही हैं, और संदेह क्या सरकार खुद ही उनको नेस्तनाबूद करने में लगी हैं. मसलन सेना-अर्द्धसैनिक बल-पुलिस सरकार की ताकत और इकब़ाल की पहचान माने जाते हैं. लेकिन आज हाल क्या है, सीबीआई का क्या तमाशा बना हुआ है यह तो आज किसी भी गली मुहल्ले में नहीं छिपा है.

सर्जिकल स्ट्राइक जैसी अंतर्राष्ट्रीय गंभीरता वाली फौज़ी कार्यवाही गली-मुहल्ले के लड़कों की जीत-हार जैसी छिछालेदर के साथ परोसी गई. प्रतिष्ठित ऐजेंसी मानी जाने वाली सीबीआई के वरिष्ठतम अफसर एक दूसरे पर घूस मांगने का आरोप लगाते मिले. न्यायपालिका के जज प्रेस कांफ्रेंस करने लगे. मतलब कुल मिलाकर केंद्रीय सत्ता ने अपनी साख पर बट्टा लगाकर रख दिया.

बाकी ऐसा नहीं है कि सिर्फ केंद्र सरकार इसमें आगे हैं, उत्तर प्रदेश में बच्चे ऑक्सीजन की कमी से मर जाते हैं, और वहीं इसी उत्तर प्रदेश की जेल में ऑन डिमांड दारू मिलती है. गौ-रक्षा तो ऐसा राक्षस हो गया है कि इसने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है. गाँवों में फसलें तबाह हो रही हैं और शहरों में एक्सीडेंट से लोग मर रहे हैं. और तो और अब तो गौ-रक्षा का पागलपन इस कदर हो गया है कि सरकार की ताकत का प्रतीक पुलिस थाना भी नहीं बचा है. बुलंदशहर के एक थाने पर हमला होता है और थानेदार को मार डाला जाता है.

कहीं महाराष्ट्र में कोई संभाजी भिड़े सरकार से ताकतवर निकलते हैं, तो कहीं अरूणाचल में चलती सरकार भरभराकर गिर जाती है. अजीबो गरीब हाल इस देश में हो रहे हैं. और यह सारा कुछ भगवा रंग की विचारधारा वाली सरकारों के साए में ही हो रहा है.

इस देश में 2014 से ही भगवा लहर के बाद से सरकार की उन सारी व्याख्याओं और परिभाषों को कुचल डाला गया है जैसा शायद ही आज तक के इतिहास में एक साथ कभी हुआ रहा हो. मतलब देश तमाम सारे झंझावातों किस्सों कहानियों से उबरकर यहाँ तक पहुँचा है. लेकिन जो यह दौर चल रहा है ऐसी उथल-पुथल और तबाही एक साथ इकट्ठा तो शायद ही कभी देखने को मिली होगी.

संघ और बीजेपी की जो भी रणनीति हो या जैसे भी यत्र-तत्र जनसमर्थन से वह सत्ता पर पहुँच तो जा ही रहे हैं, इसी नकारा नहीं जा सकता है. लेकिन इनके द्वारा सत्ता सरकार की पूरी व्याख्या नष्ट भ्रष्ट भी हुई जा रही है. ध्यान रखिए सरकार का इकब़ाल अगर मर जाता है, तो फिर पूरा सिस्टम पूरी राजनीति और पूरा जनतंत्र ही बर्बाद हो जाएगा. हो सके तो संभालिए सरकारें आती जाती रहेंगी, लेकिन सरकार का इकब़ाल कायम रहना चाहिए.

From the Facebook Wall of Harishankar Shahi

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ByUpendra Prasad

देवताओं को जाति प्रमाणपत्र क्यों बांटेंगे योगीजी?

 

उपेन्द्र प्रसाद

राजस्थान में एक चुनावी भाषण में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने हनुमानजी को दलित बताकर अपने आपको प्रहसन का पात्र बना लिया है। योगी देश की सबसे बड़ी आबादी वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री ही नहीं हैं, बल्कि खुद एक संन्यासी हैं और धार्मिक प्रवचन देने में वे सिद्धहस्त माने जाते हैं। वे राजनीति में हैं और राजनैतिक भाषण करने का भी उनका लंबा अनुभव है और कहने की जरूरत नहीं कि वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। यही कारण है कि देश में जहां कहीं भी चुनाव होता है, तो भारतीय जनता पार्टी की तरफ से उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में वहां भेजा जाता है। सच तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद वे भारतीय जनता पार्टी के दूसरे सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं।

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लेकिन जब आप धर्म और राजनीति में घालमेल करेंगे, तो वही होगा, जो आज हो रहा है। हनुमानजी को दलित बताकर योगी न केवल प्रहसन का पात्र बन रहे हैं, बल्कि उनको कानूनी नोटिस भी भेजे जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक भी योगी के उस भाषण के लिए अपनी नाखुशी जता चुके हैं। श्री नाईक ने प्रयागराज में संवाददाताओं का जवाब देते हुए कहा कि योगीजी को भाषण देते समय लोगों की आस्थाओं का भी ध्यान रखना चाहिए।
आखिर हनुमान को दलित कहे जाने पर एतराज किसको है? दलित संगठनों ने इस पर एतराज नहीं किया है, हालांकि यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि हनुमानजी दलित देवता हैं, तो फिर उनके कंधे पर जनेऊ क्यों रहता है? गौरतलब हो कि आजकल दलित वे कहलाते हैं, जो लंबे समय तक छुआछूत के शिकार होते रहे और आज भी कहीं कहीं हो रहे हैं। उन्हें या तो वर्णव्यवस्था से बाहर रखा गया है या शूद्र वर्ण का माना गया है। उनका जनेऊ संस्कार नहीं होता। जनेऊ संस्कार जिसका होता है, वे शूद्र नहीं रह जाते, बल्कि द्विज हो जाते हैं। मनुस्मृति में लिखा गया है,‘‘ जन्मना जायते शूद्राः सस्कारात् द्विज उच्चयते’’। अब ंसंस्कार से मतलब जनेऊ संस्कार का रह गया है। इसलिए यदि हनुमानजी जनेऊ पहनते हैं, तो वे द्विज हो गए। फिर वे न तो शूद्र रहे और न ही अवर्ण। फिर उन्हें दलित क्यो कहा जाए? जाहिर है, हिन्दुत्व की राजनीति करते करते योगीजी हिन्दुत्व का ही गलत स्वरूप लोगों के सामने पेश कर रहे हैं।

Image result for shivaऔर यह सब किया जा रहा है दलित वोट पाने के लिए। योगीजी को लगा कि हनुमान को दलित बताकर दलितों को खुश किया जा सकता है और उन्होंने वैसा कर भी दिया। लेकिन जो शिक्षित दलित हैं, उन्हें भी पता है कि जनेऊ धारी हनुमान उनके समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते। सच तो यह है कि केन्द्र मे सत्ता में आने के बाद ही भारतीय जनता पार्टी दलितो को अपने साथ जोड़ने के लिए जबर्दस्त मेहनत कर रही है। वह प्रतीकवाद का सहारा लेकर उन्हें अपने पक्ष में करना चाहती है। अम्बेडकर को गौरवान्वित करना उसी रणनीति का हिस्सा है, लेकिन सत्ता के केन्द्र में जब भागीदारी की बात आती है, तो भाजपा की सरकारे पीछे हटती दिखाई पड़ती हैं। इसलिए बीजेपी का भीमराग काम नहीं कर रहा है। और अब योगीजी ने हनुमान राग अलापकर दलितों पर डोरा डालने का काम शुरू कर दिया है।
हनुमान को दलित कहने से सबसे ज्यादा नाराज ब्राह्मण समुदाय ही है। उसी के एक संगठन ने योगीजी को कानूनी नोटिस भेजा है। वे योगीजी के भाषण से आहत महसूस कर रहे हैं। हनुमानजी को पहले गिरीजन और आदिवासी भी कहा जाता था। अब भी कहा जाता है। लेकिन इस पर किसी को आपत्ति नहीं होती, क्योंकि गिरीजन, आदिवासी या वनवासी किसी भी वर्ण का हो सकता है। हनुमान तो जंगल में रहते भी थे, इसलिए उन्हें वनवासी, गिरीजन और आदिवासी कहे जाने पर किसी को एतराज नहीं हो सकता, लेकिन दलित का अपना एक अलग मतलब होता है, जिसका संबंध समाज की जातिवादी और वर्णवादी संरचना से है।

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हनुमानजी बानर या उसी की एक प्रजाति से थे। ऐसा बताया गया है। भारतीय जनता पार्टी के एक दलित नेता, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन्होंने वानर शब्द की एक अलग व्याख्या पेश की थी। वे नेता थे सूरजभान, जो उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी हुआ करते थे। उन्होंने कहा कि वानर शब्द दो शब्दों के साथ मिलकर बना हुआ एक अपभ्रंश शब्द है। वे दो शब्द हैं वन और नर। हनुमानजी वन नर थे और ये दोनों एक साथ मिलकर वानर हो गए, लेकिन वे मानव प्रजाति के ही थे, न कि बंदर प्रजाति के।
अब हनुमानजी क्या थे और क्या नहीं थे या थे भी या नहीं, लेकिन योगीजी के भाषण ने सोशल मीडिया पर एक बहस छेड़ दी है और देवताओं की जातियां पूछी और बताई जा रही हैं। शिव जी जाति क्या थी और शनि महाराज की जाति क्या है। यमराज की जाति तक पूछी और बताई जा रही है। कोई शिवजी को भंगी बता रहा है, क्योंकि उनका एक नाम भंगी भी है, जो शायद उनकी भंग( विघ्वंस) करने की भूमिका के कारण है, लेकिन गहराई में जाये बिना उन्हें भंगी बताकर योगीजी को सलाह दी जा रही है कि अगले भाषण में वे शिवजी को भी भंगी घोषित कर ही दें, क्योंकि इससे वोटों की बेहतर फसल काटी जा सकती है।
यमराज की सवारी भैंसा होता है। भैंस चराने वाले भी शान से भैंस की सवारी करते हैं। इसलिए सोशल मीडिया में यमराज को अहीर बताया जा रहा है। शनि महाराज को तेल का चढ़ावा पसंद है, इसलिए उनकी जाति तेली बताई जा रही है और योगीजी को सलाह दी जा रही है कि वे बिना हिचक यमराज और शनि महाराज के लिए भी क्रमशः अहीर और तेली जाति का प्रमाणपत्र जारी कर ही दें।
आज राजनीति का विचित्र दौर चल रहा है। जातिवाद और सांप्रदायिकता के सहारे पहले भी चुनाव लड़े और जीते जाते रहे हैं, लेकिन वह सब एक हद के अंदर ही हुआ करता था, लेकिन अब वह हद टूट चुका है। शब्दों की मर्यादा अब टूट चुकी है। जो सड़क छाप नेता पहले आपसी बातचीत या नुक्कड़ की बातचीत में कहा करते थे, अब वही बातें विशाल जनसभाओं में भी की जाती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन सच है।

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तेज की तलाक की अर्जी पर ठिठकी बिहार की राजनीति


उपेन्द्र प्रसाद

अपनी पत्नी से तलाक की अर्जी किसी का व्यक्तिगत या पारिवारिक मामला हो सकता है। लेकिन जब बात बिहार के सबसे शक्तिशाली राजनेता लालू यादव के परिवार की हो, तो यह राजनीति को भी प्रभावित होने वाला हो सकता है और इसके कारण मीडिया की दिलचस्पी उसके घटनाक्रम में स्वाभाविक रूप से हो सकती है, क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से मीडिया वही दिखाना या बताना चाहता है, जिसे देश और प्रदेश के लोग सुनना, देखना और जानना चाहते हैं।
इसलिए राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी द्वारा मीडिया के लोगों को बार बार यह कहना कि तलाक का मामला उनके परिवार का आन्तरिक मामला है, और उसके बारे में ज्यादा पूछताछ और छानबीन न की जाय, गलत है। यह लालू परिवार का आंतरिक मामला निश्चित रूप से है, लेकिन इसके कारण सिर्फ उनका परिवार ही प्रभावित नहीं हो रहा है, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनैतिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। उस घटना के बाद बिहार की राजनीति ठिठक सी गई है और तलाक की अर्जी से निकली राजनीति का अंजाम देखने और समझने की कोशिश वहां के राजनीतिज्ञ कर रहे हैं।

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लोकसभा चुनाव के कुछ महीने ही रह गए हैं और बिहार का चुनावी मुकाबला दो गठबंधनों के बीच होना है। तेज प्रताप की तलाक की अर्जी दाखिल किए जाने के पहले गठबंधन पर बातचीत तेज थी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे का एक फाॅर्मूला सार्वजनिक किया जा चुका था और उस वह फाॅर्मूला राजग के दो सबसे बड़े घटक दलों द्वारा तैयार किया गया था और यह देखा जा रहा था कि अन्य दो छोटे घटक उस फाॅर्मूले पर क्या रवैया अपनाते हैं। उस फाॅर्मूले के तहत सीटों की संख्या पर भी फैसला होना था और कौन घटक किन सीटो पर चुनाव लड़ेगे, इस पर भी बातचीत हो रही थी।
लेकिन इस समय फिलहाल राजग में गठबंधन के मोर्चे पर आंतरिक बातचीत बंद है। नीतीश कुमार ने दबाव बनाकर सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप देने के लिए भाजपा को जल्द से जल्द बाध्य करने की जो रणनीति बनाई थी, वह तलाक की अर्जी के शोर शराबे में दब गई है और भारतीय जनता पार्टी सीटों के बंटवारे से ज्यादा दिलचस्पी यह देखने में ले रही है कि तलाक की अर्जी का क्या अंजाम होगा। राम विलास पासवान की पार्टी चार लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए मन बना चुकी थी। उसे एक राज्यसभा सीट देने का भी भाजपा ने वायदा किया था, लेकिन अ बवह भी जल्दबाजी में नहीं है, क्योंकि उसके नेता यह आकलन करने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या मामला लालू यादव के बड़े बेटे की अपनी पत्नी से तलाक लेने तक ही सीमित है या इसके पीछे लालू परिवार के अंदर चल रहा कोई आंतरिक राजनैतिक राजनैतिक टकराव है। इस घटना के बाद अब पासवान की पार्टी ने भी अपनी मांग बढ़ा Image result for tej pratap yadavदी है।

 

सबसे ज्यादा ठहराव तो राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन के सीट बंटवारे की बातचीत में आ गया है। राजद मुख्य पार्टी है और इसे कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई(माले), जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाले हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा और शरद यादव द्वारा गठित लोकतांत्रिक जनता दल के साथ सीटों के बंटवारे पर बातचीत करनी है। लालू यादव खुद जेल की सजा पाकर अस्पताल में अपना इलाज करा रहे हैं। राजनैतिक गतिविधियों में शामिल होने की अपनी सीमा है, क्योंकि जेल मैन्युअल उनको राजनीति करने की इजाजत नहीं देता और खराब स्वास्थ्य भी उन्हें ज्यादा मानसित तनाव से गुजरने की गुंजायश को सीमित कर देता है। ले देकर तेजस्वी यादव को ही गठबंधन और सीटों की बातचीत पर अपने सहयोगी दलों से उलझना है।
लेकिन तेज प्रताप की तलाक की अर्जी के कारण तेजस्वी भी परेशान हैं। घर मामला है, उनको परेशान होना ही चाहिए, लेकिन मीडिया से भी वे कम परेशान नहीं हैं। अब मीडिया उनसे सीटों के बंटवारे को लेकर सवाल नहीं पूछता। कितनी सीटें किन पार्टियों के लिए वे छोड़ेंगे, इस पर भी उनसे सवाल नहीं किए जाते। उनसे तलाक संबंधी प्रश्न किए जाते हैं। तेज प्रताप पटना से बाहर हैं। उनसे उनकी क्या बात होती है, इस पर पत्रकार उनसे सवाल पूछते हैं। इसके कारण उनकी परेशानी और बढ़ जाती है, क्योंकि वे मीडिया से बात करके तो अपने परिवार की समस्या हल नहीं कर सकते और किससे क्या बातचीत होती है, वे बाहर के लोगों को क्यों बताएं।
लिहाजा, महागठबंधन का सबसे बड़ा दल, जिसकी जिम्मेदारी इस गठबंधन के निर्माण में सबसे ज्यादा है, एक अभूतपूर्व स्थिति में फंस गया है। सवाल घर के बेटे और घर की बहू के भविष्य का है, पर बेटा समय की नजाकत को समझने के लिए तैयार नहीं है और परिवार के लोगों को यह समझ नहीं आ रहा है कि नाराज बेटे को कैसे मनाए। तेजस्वी के लिए समस्या इसलिए भी कठिन हो गई है कि परिवार के अन्य सदस्य भी इस मामले में चुप हैं। तेज प्रताप के अलावा कहीं से इस संबंध में कोई खबर नहीं निकलती, सो ले देकर मीडिया तेजस्वी से ही सवाल पूछता है।
तो महागठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबधन में सीटों के बंटवारे की बातचती जो जोर पकड़ना ही चाहती थी, शुरू होने के पहले ही स्थगित हो गई है और बिहार की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया कि तेज प्रताप की तलाक अर्जी का क्या होगा। अभी तो सिर्फ तेज प्रताप का ही पक्ष सामने आ रहा है, क्योंकि सिर्फ वही बोल रहे हैं। कभी वे अपनी पत्नी ऐश्वर्या के बारे में नकारात्मक बातें करते हैं, तो कभी अपनी ससुर चन्द्रिका राय के बारे में भी कुछ कह देते हैं। एक बार तो उन्होंने अपनी सास पर भी दोष मढ़ दिया। अपने माता-पिता को भी वे दोषी ठहरा चुके हैं। लेकिन ऐश्वर्या, उनके पिता और उनकी मां अभी तक चुप हैं। जब वे बोलना शुरू करेंगे, तो क्या होगा, इसे देखना अभी बाकी है। और जब वे तीनों बोलेंगे, तो उसका प्रदेश की राजनीति पर क्या असर होगा, यह भी देखना बाकी है। फिलहाल यह सब देखने के लिए बिहार की राजनीति ठिठकी हुई है।

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