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ByUpendra Prasad

अनारक्षितों को 10 फीसदी आरक्षण: बहुजन राजनीति का अंत?

 

उपेन्द्र प्रसाद

मोदी सरकार द्वारा अनारक्षित समुदायों की कम आय वाले लोगांे को आरक्षण देकर सामाजिक बदलाव को एक नई दिशा दे दी है। जाति आधारित भारतीय समाज पर इसका जबर्दस्त असर पड़ेगा और यह बदलाव सकारात्मक ही होगा। 1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों के लागू किए जाने के बाद भी समाज पर जबर्दस्त असर पड़ा था और उस असर को आजतक महसूस किया जा सकता है।

वीपी सिंह ने किन परिस्थितियों मंे मंडल आयोग की सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने वाली सिफारिश के अमल की घोषणा की थी, यह अब ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसने पूरे समाज को आलोड़ित कर दिया था। उसका सबसे बड़ा असर यह पड़ा कि पहले से आरक्षण पा रहे अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग और मंडल आयोग के तहत आने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग एक मंच पर आ गए थे।

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चूंकि आरक्षण का खूब विरोध हो रहा था और यह विरोध काफी हिंसक और कहीं कहीं आत्मघाती भी था, इसलिए आरक्षण पाने वाले समुदायों के बीच परस्पर अपनापन का बोध हुआ। और इसी बोध से एक नई राजनीति निकली, जिसे बहुजन राजनीति कहा जाता है। इस राजनीति में बहुत संभावनाएं थीं, लेकिन इसका नेतृत्व जातिवादी नेताओं के हाथ में था। उनके जातिवाद का पहला असर तो यह हुआ कि खुद विश्वनाथ प्रताप सिंह उस बहुजनवादी स्कीम से बाहर हो गए, क्योंकि वे आरक्षित तबके से नहीं थे। जातिवादी ओबीसी और दलित नेताओं ने न तो उनका नेतृत्व स्वीकार किया और न ही वह सम्मान दिया, जो उन्हें एक नई राजनीति शुरू करने के लिए मिलना चाहिए था।

पहली गद्दारी मुलायम सिंह यादव ने की। मुलायम की सरकार बिना भाजपा या कांग्रेस के समर्थन के उत्तर प्रदेश में बनी रह सकती थी, लेकिन वीपी सिंह के जनता दल से अलग होकर न केवल मुलायम ने वीपी सिंह को कमजोर किया, बल्कि खुद कांग्रेस के समर्थन पर वह आश्रित हो गए। वीपी सिंह से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले मुलायम की अपनी राजनीति समाप्त होती दिखाई दी, तो उन्होंने 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांशीराम और मायावती की बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन कर लिया।

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मुलायम यादव की इस नाजायज राजनीति से कांशीराम और मायावती जैसे नेता पैदा हुए। ये दोनों पहले से ही बहुजन समाज पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन इन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। उत्तर प्रदेश के 1989 और 1991 के विधानसभा चुनावों में बसपा को 11 -12 सीटें मिली थीं। एक बार मायावती सांसद भी बनी थीं, लेकिन 1991 में अपना चुनाव हार गई थीं।

कांशीराम ने 1980 के दशक में ही यह महसूस कर लिया था कि यदि दलित और ओबीसी का मोर्चा बन जाय, तो यह मोर्चा सत्ता में आ सकता है। लेकिन उस समय समस्या यह थी कि देश के स्तर पर दलितों को तो आरक्षण मिला हुआ था, लेकिन ओबीसी के आरक्षण के लिए बने मंडल आयोग की फाइल केन्द्र सरकार ने दबा रखी थी। उसके लिए कर्पूरी ठाकुर, चैधरी ब्रह्म प्रकाश, चन्द्रजीत यादव, महेन्द्र कुमार सैनी, रामअवधेश सिंह और मधु लिमये जैसे नेता लगातार आंदोलन कर रहे थे। अपनी सीमित शक्ति के साथ कांशीराम भी जब तब मंडल आयोग लागू करो कि नारेबाजी करवा देते थे।

कांशीराम की बहुजन राजनीति के लिए ओबीसी को आरक्षण मिलना जरूरी था। जनता दल का चुनावी घोषणा पत्र मधुलिमये जैसे विद्वान नेता लिखा करते थे और उन्होंने 1989 चुनाव के पहले जनता दल के घोषणा पत्र में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का वायदा डाल रखा था। उस वायदे का दबाव वीपी सिंह सरकार पर था। वीपी सरकार द्वारा बुलाए गए संसद के पहले ही संयुक्त सत्र में जिसे राष्ट्रपति संबोधित करते हैं, लोकदल केे राज्यसभा सांसद रामअवधेश सिंह और बसपा की लोकसभा सांसद मायावती में हंगामा खड़ा कर दिया। उन दोनों ने मंडल आयोग लागू करो के नारे लगाए और जनता दल के कर्पूरी ठाकुर और मुलायम के समर्थकों ने भी उनका साथ दिया।

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बहरहाल, मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की घोषणा हुई और इसके साथ ही दलित और ओबीसी का एक साझा मंच बहुजन नाम से तैयार हो गया। राजनीति पर इसका असर पड़ना लाजिमी था, लेकिन बिकाऊ नेतृत्व के कारण इससे कथित बहुजनों का नुकसान ही हो गया। बहुजन आंदोलन के नेता नैतिक रूप से कमजोर थे। वे लोभी थे और उनमें प्रतिबद्घता भी नहीं थी। बहुजन का नारा लगाकर सत्ता में आना और सत्ता की लूटपाट करना ही उनका उद्देश्य था। सत्ता की लूट में वे एक दूसरे से लड़ते और झगड़ते भी रहे और इस तरह कभी मिलते और कभी टूटते भी रहे।

मुलायम के वीपी द्वेष से पैदा हुए कांशीराम और मायावती ने सबसे पहले बहुजन आंदोलन से गद्दारी की। वे मुलायम के समर्थन से अपनी पार्टी के 67 विधायक जिताने में सफल हुए थे और उनके बूते उन्होंने भाजपा से समर्थन लेकर मुलायम का साथ ही छोड़ दिया। इस तरह उनकी बहुजन राजनीति उनके लालच का शिकार हो गई और उसके बाद समाज में जो कुछ होता रहा, वह तो बहुत ही शोचनीय है। विदेशी शक्तियां भारतीय जातिव्यवस्था में पैदा हो रहे विक्षोभ का लाभ उठाने लगी। बिकाऊ बहुजन बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तैयार हो गया और सत्ता के लिए हुई कथित बहुजन एकता को साम्प्रदायिकता की ओर मोड़ दिया गया। सांपद्रायिकता का वह स्वर हिन्दू धर्म और पहचान का विरोधी था। समाज में एक नई बीमारी पैदा हो गई और इस बीमारी की प्रतिक्रिया ने हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा को सत्ता में लाने का काम कर दिया।

अब सवर्णों को भी आरक्षण मिल गया है। इसके कारण देश की 100 फीसदी जातियां आरक्षण के दायरे में आ गई हैं। दलित और ओबीसी जातियों के आरक्षण के दायरे में आने से वे एक मच पर आ गई थीं और अनारक्षित तबका उनके विरोधी के रूप में उनके अस्तित्व को पहचान दे रहा था। अब जब सारी जातियां आरक्षण के दायरे में आ गई हैं, तो फिर आरक्षण पाने वाली ओबीसी और दलित जातियों के लिए एक काॅमन पहचान की जरूरत ही नहीं रही, क्योंकि यह पहचान आरक्षण विरोधी जातियों के कारण ही थीं। लिहाजा अब बहुजन विमर्श का अंत हो रहा है।

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ByUpendra Prasad

एससी/एसटी एक्ट मोदी की असली चुनौती

उपेन्द्र प्रसाद

पांच प्रदेशों की विधानसभाओं के चुनाव के नतीजों के बाद आगामी लोकसभा चुनाव का मूड तैयार हो जाएगा और वह चुनाव अन्य चुनावों से काफी अलग होगा। उसमें एक बार फिर नरेन्द्र मोदी की निजी प्रतिष्ठा दांव पर लगी होगी। पिछले 2014 का लोकसभा चुनाव भ्रष्टाचार के खिलाफ चले एक बहुत बड़े आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुआ था। उस आंदोलन ने कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों की चूलें हिला दी थी। राजनीति में एक निर्वात पैदा हो गया था, जिसे नरेन्द्र मोदी ने अपने मार्केटिंग कौशल से भर दिया। सोशल मीडिया और टीवी मीडिया का इस्तेमाल करके भी एक ऐसा माहौल तैयार किया गया, जिसमें लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी ही देश की सभी समस्याओं का समाधान हैं। भारतीय जनता पार्टी की स्थिति उस समय कांग्रेस से बेहतर नहीं थी। भ्रष्टाचार का आंदोलन भी उसके नेतृत्व में नहीं हुआ था। वह आंदोलन एक अराजनैतिक नेता अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुआ था, जो आंदोलन के बाद अपने गांव वापस लौट गए थे और उससे पैदा हुए माहौल को भुनाने का मौका नरेन्द्र मोदी पर छोड़ दिया।

उसका भरपूर लाभ उठाते हुए नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलवा दिया। वह नरेन्द्र मोदी की निजी जीत थी। वह न तो भाजपा की जीत थी और न ही आरएसएस की। सच तो यह है कि यदि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में भाजपा प्रोजेक्ट नहीं करती, तो उसे कांग्रेस से ज्यादा सीटें नहीं मिलती और आंकड़ा 100 के आसपास ही रहता। आज भी भाजपा के पास नरेन्द्र मोदी के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। सच तो यह है कि पार्टी की नरेन्द्र मोदी पर निर्भरता और भी ज्यादा बढ़ गई है। पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में भी पार्टी को जो सफलता मिलती रही है, उसमें नरेन्द्र मोदी का सबसे ज्यादा योगदान रहता है। कर्नाटक चुनाव में भाजपा की हातल पतली थी, लेकिन नरेन्द्र मोदी के धुआंधार प्रचार के बाद वह प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और सत्ता तक पहुंचते पहुंचते रह गई।

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जाहिर है, आगामी लोकसभा चुनाव भी नरेन्द्र मोदी के नाम और चेहरे पर ही लड़ा जाएगा, लेकिन आज की सच्चाई यह है कि मोदी की छवि अब पहले वाली नहीं रही। उनकी सुपरमैन छवि धूमिल हो गई है। अब उन्हें देश की सभी समस्याओं का समाधान के रूप में भी नहीं लिया जा रहा। उनके भाषणों से अभी भी लोग प्रभावित होते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या अब काफी कम हो गई है। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों में तथ्यों का ध्यान नहीं रखते और कुछ ऐसी बातें कह देते हैं, जिसकी अपेक्षा प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति से नहीं की जा सकती। इसके कारण उनके विरोधी उन पर हावी हो जाते हैं। मेन स्ट्रीम टीवी न्यूज चैनल प्रघानमंत्री के भाषणों के कमजोर पहलुओं पर ध्यान नहीं देते, लेकिन सोशल मीडिया पर उनकी खूब चर्चा होती है और इस तरह मोदी की चमक धूमिल होती जा रही है।

 

जब नरेन्द्र मोदी अगले लोकसभा चुनावों का सामना कर रहे होंगे, ता उन्हें अपने कार्यकाल का हिसाब किताब देना होगा। नोटबंदी और जीएसटी विपक्षी पार्टियों द्वारा उठाए जाएंगे। मोदी सरकार ने इन दोनों निर्णयों से जिनको जितना नुकसान होना था, वह हो गया, इसलिए इन मुद्दों के कारण शायद ही भाजपा को अब नुकसान पहुंचाया जा सकता है। नोटबंदी एक अच्छे उद्देश्य से किया गया एक असफल घोषणा के रूप में लोगों के दिमाग मंे दर्ज हो गई है। जीएसटी एक आवश्यक नीतिगत फैसला ही था, जिसके कारण व्यापारियों को शुरुआती तौर पर परेशानी हुई, जो अस्वाभाविक नहीं था। एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में प्रवेश के कारण नुकसान तो होना ही था, सो हो गया। इसलिए जीएसटी को चुनावी मुद्दा बनाकर नरेन्द्र मोदी को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता।
हां, एससी/एसटी एक्ट में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को धता बता देने का मोदी सरकार का एक ऐसा निर्णय है, जिसके कारण उनके समर्थकों का एक वर्ग उनके खिलाफ खड़ा हो गया है। इसे कोई भी पार्टी मुद्दा नहीं बनाएगी, क्योंकि कोई भी बड़ी पार्टी एससी/एसटी को नाराज नहीं करना चाहती, लेकिन इसके कारण जो नुकसान नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी को हुआ है, उसका असर चुनाव में जरूर दिखेगा। यह असर तो हो रहे विधानसभा चुनावों मे भी दिखेगा। अगड़ी जातियों के लोगों का समर्थन नरेन्द्र मोदी और भाजपा के प्रति सबसे ज्यादा था। उनके अलावा ओबीसी जातियो के लोगों का भी खासा समर्थन उन्हें मिला था। दलित और मुस्लिम भाजपा के खिलाफ ही थे। लेकिन सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी और भाजपा ने दलितों को अपने पक्ष में लाने का काफी प्रयास किया। प्रयास करना गलत भी नहीं था, लेकिन वैसा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए था कि कहीं पुराना जनाधार दरक न जाये।
एससी/एसटी एक्ट में बदलाव कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने का मोदी सरकार का निर्णय दलितों को अपने पक्ष में करने का ही प्रयास था, लेकिन इसके कारण अगड़ी और ओबीसी जातियों के लोग उनसे नाराज हो गए, क्योंकि इस कानून का काफी दुरुपयोग हो रहा है और इसके शिकार भारी पैमाने पर लोग हो रहे हैं। सरकारी आंकडों के अनुसार इस एक्ट में दर्ज किए मामलों का लगभग 80 फीसदी अदालत में टिक नहीं पाता। यानी 100 में 80 मामले झूठे साबित होते हैं। यह तो सिक्के का एक पहलू हुआ। दूसरा पहलू यह है कि एससी/एसटी कानून का डर दिखाकर भारी पैमाने पर ब्लैकमेल का धंधा भी चल रहा है। मुकदमे का डर दिखाकर भी इसका दुरुपयोग हो रहा है और एक दावे के अनुसार वैसे मामले दर्ज मुकदमों की संख्या से कई गुना ज्यादा हैं।
जाहिर है, एससी/एसटी एक्ट नरेन्द्र मोदी के लिए 2019 के चुनाव में काफी निर्णायक साबित होने वाला है। यदि भाजपा की हार होती है, तो इसका सबसे बड़ा कारण मोदी सरकार का यह फैसला ही होगा। वैसे 2014 के चुनावों के पहले किए गए वायदों को पूरा नहीं करना भी उनपर भारी पड़ने वाला है।

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ByUpendra Prasad

अधिगृहित भूखंड के दुबारा अधिग्रहण की मांग क्यों कह रहे हैं संघ प्रमुख भागवत?

उपेन्द्र प्रसाद

अब तो इतना तय हो गया है कि लोकसभा चुनाव के पहले अयोध्या के विवादित स्थल पर राममंदिर का निर्माण शुरू नहीं हो सकता। अब जनवरी महीने में इस विवाद से जुड़े मुकदमे की सुनवाई की रूपरेखा तय की जाएगी। इस मुकदमे में एक से ज्यादा पक्ष हैं और अनेक किस्म की सत्य और काल्पनिक उलझनें हैं, जिनके कारण इस पर सुनवाई तुरंत समाप्त नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मसले पर अविलंब सुनवाई शुरू करने की अपील अस्वीकार करने के बाद मंदिर समर्थको की नींद हराम हो रही हैं और उनमे हताशा का भाव बढ़ता जा रहा है। और जब हताशा बढ़ती है, तो उसका शिकार विवेक हो जाता है, जिसके कारण विवेकहीन बातें शुरू हो जाती हैं।
वैसी ही एक विवेकहीन बात यह है कि कानून बनाकर या अध्यादेश लाकर केन्द्र सरकार या राज्य सरकार उस विवादित भूमि को अधिग्रहण कर सकती है और उस अधिगृहित जमीन को राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू संगठनों को सौंपा जा सकता है। इस तरह की मांग जोर पकड़ रही है। भारतीय जनता पार्टी के अनेक नेता इस तरह की मांग कर रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद ने तो औपचारिक रूप से इस तरह की मांग कर दी है कि राममंदिर के निर्माण को शुरू करने के लिए सरकार अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार नहीं करे, बल्कि कानून बनाकर उस भूखंड को मंदिर निर्माण के लिए तैयार संगठन को सुपूर्द कर दे।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी सरकार से कानून बनाने की मांग कर चुके हैं। सच तो यह है कि मंदिर निर्माण के लिए तैयार बैठे लोगों को लग रहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी हो मंदिर बनकर रहेगा। इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि मंदिर के पक्षधर मुकदमा हार जाने के बावजूद कानून की सहायता से वह भूखंड पा लेंगे। केन्द्र ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है और सरकार के पास यह अधिकार होता है कि उचित मुआवजा देकर वह कोई भी भूखंड अधिकृत कर ले। अब वहां मस्जिद तो है नहीं, इसलिए उसे अधिगृहित करने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं होगी।
लेकिन इस तरह के विचार रखने वाले यह भूल जाते हैं कि विवादित भूखंड पहले से ही तकनीकी रूप से केन्द्र सरकार द्वारा अधिगृहित संपत्ति है। यह अधिग्रहण नरसिंह राव सरकार ने 1993 में बाबरी मस्जिद के विघ्वंस के बाद किया था। विवादित 2 दशमलव 7 एकड़ जमीन के साथ साथ आस पास के 66 दशमलव 7 एकड़ जमीन नरसिंह राव सरकार ने एक अध्यादेश के द्वारा अधिगृहित कर ली थी। बाद में अध्यादेश का स्थान एक अधिनियम ने ले लिया। उस अधिनियम के तहत विवादित भूमि पर दाखिल सारी याचिकाओं को भी खारिज कर दिया गया था।
लेकिन भूमि अधिग्रहण के उस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने बताया कि अधिग्रहण यह भूमि किसी को देने के लिए नहीं किया गया है, बल्कि केन्द्र सरकार उसे अपनी कस्टडी में उसे रखना चाहती है, ताकि उसके कारण सांप्रदायिक तनाव को नियंत्रण में रखा जा सके। केन्द्र की उस दलील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण से संबंधित उस कानून को निरस्त नहीं किया। उसका सिर्फ एक हिस्सा, जिसमें सभी याचिकाओ को समाप्त माना गया था, उसे कोट्र ने निरस्त कर दिया और आदेश जारी किया कि केन्द्र उस भूमि की कस्टडी अपने पास रखे और याचिकाओ का निस्तारण होने के बाद जिसकी जीत होती है, भूमि उसे सौंप दे।

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यानी कानून बनने और उस पर कोर्ट के दिए गए फैसले के अनुसार वह विवादित भूखंड अभी भी अधिगृहित भूखंड है, जो केन्द्र सरकार की कस्टडी में है। उसे केन्द्र को तबतक अपनी कस्टडी में रखना है, जबतक अदालत उस पर अपना अंतिम फैसला नहीं सुना दे। उसके पहले केन्द्र को यथास्थिति बनाए रखनी है। वह किसी को वह भूखंड नहीं दे सकता और जहां तक अधिग्रहण करने के लिए अध्यादेश और अधिनियम बनाने का सवाल है, तो जो जमीन एक बार अधिगृति हो चुकी है, उसका अधिग्रहण वही सरकार दुबारा कैसे कर सकती है?
लिहाजा केन्द्र सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। मंदिर बनाने के लिए उतावला हो रहे लोग मोदी सरकार पर दबाव बनाते हुए कह रहे हैं कि जब तीन तलाक और एससी/एसटी एक्ट पर सरकार अध्यादेश और विधेयक ला सकती है, तो फिर राममंदिर के निर्माण के लिए वैसा क्यो नही कर सकती। लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि तीन तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट मे लंबित नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत ही उस पर अध्यादेश लाया गया है और एससी/एसटी एक्ट में पुनर्विचार याचिका तो केन्द्र ने ही कर रखा था और सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई वैधानिक कार्रवाई आगे करने के लिए रोक नहीं लगा रखी है।
विवादित भूखंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का केन्द्र सरकार को आदेश है कि वह वहां यथास्थिति बनाए रखे और वह अपने आपको उस जमीन को कस्टोडियन समझे न कि मालिक। अब जब सरकार उस जमीन की मालिक ही नहीं है, तो फिर वह उसे किसी को कैसे दे सकती और वह भी तब, जब उस जमीन के एक से ज्यादा दावेदार मौजूद हैं और उनके दावों की जाच सुप्रीम कोर्ट कर रहा है।
यही नहीं भारतीय राज्य एक धर्मनिरपेद्वक्ष राज्य है। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का बेसिक स्ट्रक्चर है, इसके साथ सरकार क्या संसद भी छेड़छाड़ नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अनेक फैसले में स्पष्ट किया है कि सेक्युलर होने के कारण सरकार अपने आपको किसी धर्म विशेष से जोड़कर फैसला नहीं ले सकती। भारतीय धर्मनिरपेक्षता को कोर्ट ने पारिभाषित करते हुए कहा है कि यह सर्वधर्म समभाव पर आधारित है और सरकार को निर्णय लेते समय सर्वधर्मसमभाव के भावना से ही काम करना होगा। इस भावना से विचलित होकर किया गया कोई फैसला यह बनाया गया कोई कानून सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया जाएगा। जाहिर है, सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे भाजपा सांसदों की कानून बनाकर मंदिर निर्माण का सपना, एक ऐसा दिवास्पन है, जो पूरा होता दिखाई नहीं पड़ता। इसका निर्माण तभी होगा, जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसके पक्ष में हो या विपक्ष में फैसला जाने के बाद भूखंड का मालिक अपनी मर्जी से उसे मंदिर निर्माण के लिए दे दे।

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ByUpendra Prasad

क्या सीबीआई संकट नरेन्द्र मोदी का वाटरलू साबित होगा?

उपेन्द्र प्रसाद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। वे लगातार बढ़ती जा रही हैं। ताजा समस्या सीबीआई के संकट से जुड़ी हुई है। इसके कारण मोदी प्रशासन की संकट मोचक क्षमता पर तो सवाल उठा ही है, इसके राजनैतिक निहितार्थ भाजपा के लिए और भी मारक है। राहुल गांधी को इस संकट के रूप में अपना राफेल मुद्दा और भी जोर शोर से उठाने का मौका मिला है और सरकार इस मसले पर जितना मुह खोलती है, वह उतना ही संदिग्ध होती जा रही है। उसके पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि राफेल की कीमत 3 गुना क्यों बढ़ गई। सच तो यह है कि इसकी कीमत के बारे में किसी प्रकार की जानकारी भी सरकार लोगों के साथ शेयर नहीं करना चाहती। सरकार के पास इस सवाल का जवाब भी नहीं है कि उसने सरकारी क्षेत्र के हिन्दुस्तान एयरोनाॅक्सि लिमिटेड से आॅफसेट ठेका छीनकर अनिल अंबानी की अनुभवहीन कंपनी के पास क्यों जाने दिया?
सीबीआई का यह संकट दो अधिकारियों के बीच वर्चस्व का नतीजा है। वैसे संगठन मे वर्चस्व तो उसी का होता है, जो उसका प्रमुख होता है और निदेशक होने के नाते आलोक वर्मा ही इस संगठन के प्रमुख थे। इसलिए वर्चस्व तो उन्हीं का होना चाहिए था, पर प्रधानमंत्री की नजदीकी के कारण राकेश अस्थाना उनके समानान्तर एक सत्ता बन गए थे और पूरे संकट का मूल कारण भी यही है। कहते हैं कि आलोक वर्मा ने अस्थाना के समानान्तर वर्चस्व को स्वीकार भी कर लिया था, लेकिन अमित शाह के एक पसंदीदा अफसर एके शर्मा के सीबीआई में अतिरिक्त महानिदेशक के रूप में आने के बाद आलोक वर्मा अपने वर्चस्व को मिल रही चुनौती के खिलाफ सक्रिय हो गए थे। इस तरह से संगठन में दो गुट बन गए और मामला बिगड़ता चला गया। एक दूसरे के ऊपर भ्रष्टाचार के लगाए आरोपों के मामले मे वर्मा और अस्थाना में से कौन सही हैं और कौन गलत, इसके बारे में इस समय कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन संगठन की गुटबाजी रोकने में केन्द्र या सीवीसी ( केन्द्रीय निगरानी आयोग) की विफलता को स्वतः स्पष्ट है।

दरअसल कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सितारे गर्दिश में चल रहे हैं। उस चुनाव के बाद जिस तरह से बहुमत को नकार कर अल्पमत यदुरप्पा सरकार का गठन हुआ, वह बहुत ही आपत्तिजनक था और उसके बाद यह लगने लगा था कि चुनावों के नतीजो को भी अर्थहीन बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी तत्पर है। यदुरप्पा की सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण खरीद- फरोख्त से अपना अस्तित्व बचाने की घोषित मंशा में विफल हो गई, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र पर मंडराते खतरे की घंटी बजा दी थी। उसके साथ ही कुछ ऐसे संघ विरोधी लोग जो बेहतरी की उम्मीद में नरेन्द्र मोदी के समर्थक बने हुए थे, वे एकाएक मोदी के खिलाफ हो गए। गुजरात और कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा की गई गलतबयानियों ने भी उनकी छवि को धूमिल करने का काम किया और उनका समर्थन सिर्फ संघ और भाजपा के दायरे तक सिमटना शुरू हो गया।
कर्नाटक चुनाव के बाद एसएसी-एसटीएक्ट पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी की एक और परीक्षा ली, जिसमें वे विफल हो गए। उन्होंने एक गलत राजनैतिक कदम उठाते हुए एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए संशोधन को निरस्त कर दिया। कोर्ट का फैसला गलत नहीं था, क्योकि इस एक्ट का भारी पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। इस एक्ट के खिलाफ सवर्ण ही नहीं, बल्कि ओबीसी समुदायों के लोग भी हैं। अल्पसंख्यक समुदाय भी इसे समाप्त देखना चाहता है, लेकिन कुछ दलित नेताओं के दबाव मंे प्रधानमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करते हुए एक और कानूनी संशोधन कर डाला।

उसका असर यह हुआ कि मोदी के सवर्ण समर्थक एकाएक नाराज हो गए और वे मोदी विरोधी हो गए। सोशल मीडिया में वे नोटा के पक्ष में अभियान चलाने लगे। वे भाजपा को वोट न देने की कसमें खाने लगे। दलित वोट पाने के लिए नरेन्द्र मोदी ने अपने सबसे प्रबल समर्थक आधार सवर्ण को ही नाराज कर दिया और नये नये बने ओबीसी आधार को भी नाखुश कर दिया, क्योंकि वे सब इस एक्ट के दुरुपयोग के कारण अपने आपको पीड़ित पा रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि एसएसी-एसटी एक्ट ने नरेन्द्र मोदी और भाजपा का भारी नुकसान पहुंचा दिया है। दलित आधार में उसके घुसने की दूर दूर तक कोई संभावना नहीं, क्योंकि मोदी सरकार से उनकी शिकायत बढ़ती ही जा रही है। एसएसी-एसटी एक्ट के बाद सोशल मीडिया पर मोदी भक्तों की संख्या घटकर आधी हो गई है। उसके कारण मोदी विरोधी आज सोशल मीडिया में मोदी समर्थकों पर हावी हो गए हैं।
इस बीच राफेल नरेन्द्र मोदी के लिए एक स्थायी चुनौती बना हुआ है। यह आश्चर्य की बात है कि गैर कांग्रेसी विपक्ष एक मसले पर खामोश क्यों है। शायद वह इसलिए चुप है, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने की उसमें क्षमता नहीं, क्योंकि वह खुद दूध का धुला हुआ नहीं है। लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस इस मसले को छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं हैं और सीबीआई का ताजा संकट उसे एक और मौका दे रहा है कि वह इस मसले को और भी हवा दे। उधर सभी एजेंडे को कांग्रेस की ओर मोड़ने की रणनीति में अब भाजपा अपने आपको घिरी पा रही है। उसकी रणनीति कांग्रेस के प्रति आक्रामक रुख बनाकर पुराने जमाने को ही मुद्दा बनाए रखना था, लेकिन जब सवाल आपके ऊपर टकटकी लगाए हुए हो, तो पहले आपको उन सवालों से निबटना होता है और उन्हें छोड़कर आपने अपनी तरफ से सवाल दागने शुरू कर दिए, तो फिर आप खुद प्रहसन का पात्र बन जाते हैं। यही नरेन्द्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी के साथ हो रहा है। और इसके साथ ही यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या सीबीआई का वर्तमान संकट नरेन्द्र मोदी के लिए वाटरलू साबित होगा।

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सीबीआई संकट का अमित शाह कनेक्शनः अफसर एके शर्मा के कारण बढ़ा अस्थाना- वर्मा विवाद?

संतोष सिंह

 

सीबीआई में मचे घमासान की बिसात काफी पहले बिछ चुकी थी। बस, सही समय का इंतजार किया जा रहा था। लेकिन, आलोक वर्मा छह महीने में इतने मजबूत हो जाएंगे ये किसी ने नहीं सोचा था।
ये पूरी स्टोरी वर्मा और अस्थाना के साथ काम करने वाले एक ऐसे सूत्र से सामने आई है जो दोनों की कार्यशैली पर 20 वर्षों से नजर रख रहे हैं ।
शुरुआत केन्द्रीय कैबिनेट सचिव से करते हैं- नाम प्रदीप कुमार सिन्हा। बिहार से हैं और अस्थाना भी नेहरहाट से पढ़े हैं। बिहार कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी के बेटे से अपनी बेटी की शादी की है । आलोक वर्मा और प्रदीप कुमार सिन्हा में पुराना रिश्ता रहा है। प्रदीप कुमार सिन्हा पर मोदी को बहुत भरोसा है। दो बार सेवा विस्तार भी मिल चुंका है। राकेश अस्थाना को निदेशक बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद कहा ये जा रहा कि आलोक वर्मा का नाम प्रदीक कुमार सिन्हा ने सुझाया था। दोनों के बीच वर्षों पुराना रिश्ता रहा है। वैसे भी आलोक वर्मा की कभी कड़क छवि नहीं रही। इनकी पहचान सहज, सुलभ औऱ सत्ता के वफादार के रुप में होती थी। सरकार को भी ऐसे ही अधिकारी की जरुरत थी। सरकार वर्मा को निदेशक तो बना दी, लेकिन भरोसा राकेश अस्थाना पर कहीं ज्यादा था। इस वजह से दोनों के बीच खटास बढती ही चली गई। वर्मा कई बार अस्थाना की शिकायत लेकर पीएमओ गये, लेकिन कभी अस्थाना की शिकायत सुनी नहीं गयी।
इसी बीच गुजरात कैडर के ही सीनियर आईपीएस अधिकारी एकेशर्मा जो अमित शाह के काफी करीबी माने जाते हैं, इस खेल में इनकी एंट्री होती है क्योंकि राकेश अस्थाना का मोदी के सीधे किचेन तक प्रवेश था। इस वजह से अस्थाना कई मौके पर अमित शाह के आदेश को नजरअंदाज कर देते थे। इस वजह से अमित शाह भी अस्थाना के साथ उतना सहज महसूस नहीं करते थे। लेकिन, मोदी के चहेते होने के कारण कुछ कर भी नहीं सकते थे ।
वही एके शर्मा औऱ राजेश अस्थाना के बीच गुजरात से ही 36 का रिश्ता था। कई बार दोनों एक दूसरे को सार्वजनिक रुप से अपमानित कर चुके थे । जैसे ही मौका मिला एकेशर्मा आलोक वर्मा के साथ जुड़ गये और धीरे- धीरे राकेश अस्थाना के खिलाफ गोलबंदी शुरु हो गयी। फिर भी आलोक वर्मा किसी तरह से अपना कार्यकाल पूरा करके निकल जाना चाह रहे थे, लेकिन इसी बीच राकेश अस्थाना ने एक फर्जी बयान के सहारे आलोक वर्मा पर सीधा हमला बोल दिया। आलोक वर्मा इसकी शिकायत पीएमओ तक किए, लेेकिन किसी ने कोई नोटिस तक नहीं लिया ।

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मामला भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ था। ऐसे में आलोक वर्मा को समझ में आ गया कि पलटवार नहीं किये तो फिर रिटायरमेंट के बाद भी मुश्किलें बढ सकती है।.. और फिर शुरु हुआ अॉपरेशन अस्थाना। जिस दौरान अस्थाना और उनके साथ जुड़े सीबीआई के एक दर्जन से अधिक अधिकारी और एक रॉ के अधिकारी जो अस्थाना का बैचमेट हैं उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के पर्याप्त सबूत मिल गये ।
सीबीआई के दफ्तर में रहते हुए भी अस्थाना को इसकी भनक तक नहीं लगी कि उनके खिलाफ इतना बड़ा अॉपरेशन चल रहा है। इतने गुप्त तरीके से ये सब चल रहा था कि जब तक पता चलता तब तक अनुसंधान लगभग पूरी कर ली गयी थी। जैसे ही इसकी भनक लगी, अचानक एक खबर लुटियन जोन में काफी तेजी से फैलायी गयी कि आलोक वर्मा राफेल वाले में जाते-जाते जांच का आदेश कर देंगे। इसी बीच अस्थाना के खिलाफ कारवाई की सूचना पीएमओ पहुंची। खबर फैलाने वाले की बात में दम दिखने लगा। फिर क्या था, अस्थाना ने एक बार फिर साहब के लिए अपनी नौकरी तक दांव पर लगाने की बात कह बड़ा दांव खेल दिया, क्योंकि वर्मा औऱ शर्मा को हटना इतना आसान नहीं था।.. औऱ इन दोनों के हटे बगैर अस्थाना की खैर नहीं थी। फिर क्या था- वर्मा औऱ शर्मा के जितने भी करीबी अधिकारी थे उनको रातोंरात हटा दिया गया। देखिए आगे आगे होता है क्या। लेकिन, वर्मा भी कम पहुंचे हुए खिलाड़ी नहीं हैं। नौकरी का अधिकांश समय दिल्ली में गुजरा है औऱ नेटवर्क बनाने वालों में इनकी गिनती रही है ।
(ये पूरी स्टोरी वर्मा और अस्थाना के साथ काम कर चुके एक सीनियर अधिकारी के हवाले से लिखी गयी है जो मुझे अक्सर हाइप्रोफाईल मामलों की जानकारी देते रहते हैं और इनकी जानकारी काफी सटीक रहती है ।

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सीबीआई के अंदर घमासान : प्रधानमंत्री मोदी के सामने एक नया संकट

उपेन्द्र प्रसाद

देश के पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अगले चंद महीनों के अंदर लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। और बीच देश की सबसे बड़ी जांच एजंेसी केन्द्रीय जांच ब्यूरो( सीबीआई) के अंदर घमासान छिड़ गया है। देखने पर तो यह घमासान सीबीआई के दो वरिष्ठतम पदों पर बैठे दो अधिकारियों के बीच में है, लेकिन यह घमासान अपने जद में पूरी सीबीआई और उसकी नियंत्रक राजनैतिक प्रतिष्ठान को भी घेरे में लेने की क्षमता रखता है। सीबीआई अब सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय यानी प्रधानमंत्री के नियंत्रण में है, इसलिए सवाल देश के सर्वोच्च कार्यालय पर भी खड़े हो सकते हैं।
एक अभूतपूर्व घटना के तहत सीबीआई ने अपने दूसरे सबसे बड़े अधिकारी राकेश अस्थाना पर तीन करोड़ रुपया घूस लेकर मांस निर्यातक मोइन कुरेशी के मामले से जुड़े एक व्यापारी साना को क्लीनचिट देने के मामले में मुकदमा किया है। दिलचस्प है कि अस्थाना सीबीआई प्रमुख और अपने बाॅस आलोक वर्मा पर उस व्यापारी से दो करोड़ रुपया घूस लेकर उसे बचाने की कोशिश करने का आरोप लगा रहे थे। यह आरोप उन्होंने लिखित रूप से लगाया था और उनके द्वारा लगाए आरोप की जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है।
और इस बीच सीबीआई प्रमुख ने अपने डिपुटी अस्थाना पर ही उसी व्यापारी को गवाह बनाकर तीन करोड़ की घूस लेने के मामले मे फंसा दिया। इसमें एक और दिलचस्प बात है और वह यह है कि अस्थाना के खिलाफ मुकदमा दायर करने के पहले ऊपर से इजाजत नहीं ली गई, जबकि उस तरह की इजाजत जरूरी थी। जाहिर है, वर्मा हड़बड़ी में हैं और अपने ऊपर लगाए गए आरोप की जांच पूरी होने के पहले ही उन्होंने उसी व्यापारी की गवाही से अपने डिपुटी अस्थाना पर मुकदमा ठोंक दिया है।
जब बात मुकदमेबाजी की आती है, तो मामला अदालत के पास पहुंचता है और अदालतें सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती हैं। यह भी देखा जाता है कि वह गवाह कितना विश्वसनीय है। इस मामले मे गवाह वह व्यक्ति है, जो खुद जांच के तहत गिरफ्तारी और दोषी साबित होने के खतरे का सामना कर रहा था। वर्मा का कहना है कि साना ने अस्थाना को घूस दिए, तो अस्थाना का कहना है कि साना ने वर्मा को घूस दिए। अब चूंकि सीबीआई की कमान वर्मा के हाथ में है, तो उन्होंने अपने बाॅस होने का फायदा उठाते हुए डिपुटी पर मुकदमा ठोक दिया और यदि अस्थाना वर्मा के बाॅस होते तो यह मुकदमा वर्मा पर ठोका जाता।

अब किसने घूस लिया, इसका पता तो बात में चलेगा या चलेगा भी या नहीं, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन जो कुछ सामने आ रहा है, उससे सीबीआई मजाक बनती जा रही है। सीबीआई के पास एक से एक बड़े और संवदेनशील मुकदमे हैं और इस अंदरूनी झगड़े से उसकी कार्यक्षमता निश्चय ही प्रभावित होगी और इससे देश का ही नुकसान होगा, क्योंकि विजय माल्या से लेकर, नीरव मोदी और अन्य अनेक हजारों करोड़ रूपये की लूट के मामले को सीबीआई देख रही है। खुद अस्थाना विजय माल्या औ अगुस्ता हेलिकाॅप्टर घोटाले के मामले को देख रहे हैं। अब वे उन मामलों को देखने की जगह अब अपना मुकदमा देखेंगे।
खुद भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना करते हुए कोई सीबीआई अधिकारी अन्य भ्रष्टाचार के मामले की जांच करने को नैतिक रूप से कितना सक्षम है, यह अलग सवाल है, जिस पर बहस की जा सकती है, लेकिन यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब सीबीआई को मिलजुलकर काम करना चाहिए था।
राकेश अस्थाना की छवि एक ईमानदार अधिकारी की है। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उनपर राजनैतिक दबाव असर नहीं करता और वे अपने कैरियर को दांव पर लगाकर वह वही करते हैं, जिसे वे अपना फर्ज समझते हैं। बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले में लालू यादव को सजा दिलवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वे गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और नरेन्द्र मोदी के साथ काम करने का उनका लंबा अनुभव रहा है। सीबीआई में उन्हें नरेन्द्र मोदी की पसंद का आदमी कहा जाता है।
चूंकि सीबीआई सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के मातहत काम करती है, इसलिए मोदीजी के लिए यह घमासान एक बहुत बड़ी चुनौती है। यदि वे इसे संभालने में विफल रहे, तो सबसे पहले तो इस संस्था की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाएगी और सारे अधिकारी खेमेबाजी में लग जाएंगे और उससे भी बुरा तब होगा, जब यह मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चला जाएगा। एफआईआई दायर किए जाने के बाद यह मामला अदालत में चला ही गया है और अब अस्थाना अपनी निजी हैसियत से भी उस मुकदमे को निरस्त कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

दोनों के बीच संघर्ष पिछले कई महीनों से मीडिया की सुर्खियां बन रहे थे। अस्थाना ले आरोप लगाया था कि वर्मा रेलवे होटल घोटाले के मामले में लालू और उनके परिवार के खिलाफ हो रही जांच को धीमा करने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब हो कि यह मामला भी अस्थाना के हाथ में ही है। आरोप है कि वर्मा ने छापा मारने से मना कर दिया था और उसके बावजूद छापे पड़े और सीबीआई की कार्रवाई आगे बढ़ी। वह मामला मीडिया में आने के बाद दोनों के झगड़े और तेज हुए और मोइन कुरेशी मामले में भी अस्थाना ने वर्मा पर अनावश्यक हस्तक्षेप का आरोप लगाया। इस बीच साना को बचाने के लिए एक राजनेता का नाम भी चर्चा मे आ गई।
सीबीआई के इस अंदरूनी संग्राम को रोकना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्हें अपने स्तर पर हस्तक्षेप कर यह पता लगाना चाहिए कि दोनों अधिकारियों में कौन सही है और कौन गलत। जो गलत है, उसे बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। यदि यह संग्राम नहीं रूका तो ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं और ऐसे एसे खुलासे- सही या गलत- हो सकते हैं, जिससे मोदी को राजनैतिक नुकसान हो सकता है।

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मोदी के मंत्री एमजे अकबर भी क्या यौन हिंसा के अपराधी हैं?

जितेन्द्र कुमार

अंततः यह खबर आज दिल्ली के महत्वपूर्ण अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की लीड स्टोरी बन पाई (हांलाकि कल कोलकाता से निकलनेवाला अखबार ‘द टेलीग्राफ’ ने इसे लीड बनाया था, जबकि एम जे अकबर उस अखबार का संस्थापक संपादक रहा है )। यह सिलसिला हिम्मत, मजबूती और बहादुरी के साथ चलते रहना चाहिए। और इसके लिए महिलाएं जितना हिम्मत जुटा पा रही हैं वो बधाई की पात्र हैं। क्योंकि वे सभी जानती हैं कि भारतीय समाज में उन ‘ह्वेलो’ की औकात कितनी ज्यादा है और ये आवाज उठानेवाली महिलाएं कितनी ‘कमजोर’ हैं। यह यह सच्चाई नहीं होती तो जो सुषमा स्वराज हर बात पर प्रतिकार करती हैं, अपने एक जुनियर मंत्री के खिलाफ बार-बार पूछे जाने पर चूं नहीं कर पाई। क्योंकि वह जानती हैं कि मुंह खोलने की कीमत कितनी अधिक हो सकती है! वह यह भी जानती हैं कि एक बार मुंह खोलीं तो कितने ‘अपनों’ के खिलाफ भी मुंह खोलना पड़ सकता है!

इतना होने के बावजूद मेरी सदइच्छा है कि अगर टेलीवीजन में पत्रकारिता करनेवाली महिलाएं भी मुंह खोलतीं तो टेलीवीजन इंडस्ट्री का भला होता और भविष्य में महिलाएं थोड़ा-बहुत बेखौफ होकर सहजता से काम कर पातीं। फिर भी, मुझे विश्वास है कि थोड़े दिनों में कोई न कोई वीरागंना आवाज उठाएगीं। लेकिन इससे भी ज्यादा विश्वास इस बात पर है कि वह आवाज आज की आवाज से कहीं अधिक मुखर होगी!

लेकिन जिस बात से मुझे सबसे ज्यादा निराशा है वह यह कि ब्यूरोक्रेसी के खिलाफ किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया है। जबकि हकीकत हम जानते हैं कि वहां कितनी सड़ांध है। सार्वजनिक जानकारी में इस तरह का मामला सिर्फ और सिर्फ केपीएस गिल का था जब उसने एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रुपन देवल बजाज के साथ छेड़खानी की थी। यकीन मानिए, वह कुछ भी नहीं था! उससे कई-कई गुणा दुर्व्यवहार वहां महिलाओं के साथ प्रतिदिन वरिष्ठ अधिकारी अपने कनिष्ठ के साथ करते हैं। मेरी दिली ख्वाहिश है कि वहां से भी आवाज निकलनी चाहिए कि जो लोग पूरे देश को कानून-व्यवस्था और आचार-व्यवहार समझाते रहते हैं वे अपनी महिला सहयोगियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं?

वैसे कल इंदिरा जयसिंग ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे ‘अपने न्यायमूर्ति को जानें’ लेख में न्यायपालिका को लेकर टिप्पणी की है। इस लेख में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण बातों के अलावा यह भी कहा है कि हमें न्यायमूर्तियों को उनकी नियुक्ति से पहले जानने का अधिकार होना चाहिए। इंदिरा जयसिंग के अनुसार, “ क्योंकि वे तय करते हैं कि आप क्या खाएगें, आप क्या बोलेगें और क्या नहीं बोलेगें, आप किसके साथ सहवास कर सकते हैं या फिर आप मंदिर जा सकती हैं या नहीं जा सकती हैं। बात इतने पर खतम नहीं होती है। वे जिंदगी और मौत तय करते हैं, वे अपराधी और निरपराधी तय करते हैं, वे आपकी नजरबंदी और आजादी तय करते हैं या फिर आपको बेल मिलेगा या होगा जेल। कौन आंतकवादी है और कौन नहीं है, ये भी वही तय करते हैं। जिंदगी का कोई भी ऐसा लम्हा नहीं है जो कानून द्वारा निर्धारित नहीं होता है और न्यायधीश उसके सबसे बड़े व्याखाकार हैं।”

आप आवाज उठानेवाली महिलाओं को सलाम!

बोल कि लब आजाद हैं तेरे!

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गुजरात में हमले : संकट में मोदी की वापसी

उपेन्द्र प्रसाद

 

आगामी 5 राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखें घाषित हो चुकी हैं। इनमें से तीन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और उन्हें बनाए रखने के लिए पार्टी के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं। राजस्थान का हाथ से निकलना तो तय है और यदि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का वर्तमान राजनैतिक माहोल बदलने में नरेन्द्र मोदी कामयाब नहीं हो पाए, तो इन दोनों राज्यों की सत्ता भी भाजपा के हाथों से फिसल जाएगी।
2019 का लोकसभा चुनाव इन तीन राज्यो के चुनावी नतीजों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते, हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के कारण लोकसभा चुनाव में पार्टी आगामी विधानसभा चुनावों की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, क्योंकि नरेन्द्र मोदी से अभी भी लोगों का मोहभंग नहीं हुआ है, हालांकि इसका दौर शुरू हो गया है। जाहिर है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही भाजपा की नाव को पार लगा सकते हैं। पार्टी की उनपर निर्भरता आज 2014 की अपेक्षा ज्यादा बढ़ गई है।
लेकिन गुजरात में उत्तर भारतीयों और खासकर हिन्दी प्रदेशों के लोगों पर जो हमले हो रहे हैं, वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपशकुन का काम कर रहे हैं। वहां से भारी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं। पलायन करने वालों मे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के लोगों की संख्या बहुत है और इन्हीं राज्यों में मिली सफलताओं के कारण आज भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है।
मोदीजी की समस्या यह है कि वे गुजरात से ही हैं और गुजरात में उनकी पार्टी की ही सरकार है। उनकी पसंद का आदमी ही वहां मुख्यमंत्री है। इसलिए वहां रह रहे दूसरे प्रदेशों के लोगों को सुरक्षा प्रदान करना मोदीजी का ही दायित्व है। यदि वहां से मार खा खा कर लोग अपने घरों में वापस लौटते हैं, तो उनके गृहराज्यों में गुजरात विरोधी भावना जरूर फैलेगी और सुरक्षा नहीं प्रदान करने के लिए नरेन्द्र मोदी उनके गुस्से का स्वाभाविक तौर पर शिकार हो जाएंगे।

 

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कांग्रेस के नेता संजय निरूपम ने गुजरात में हो रहे हमलों को लेकर नरेन्द्र मोदी पर हमला करना शुरू भी कर दिया। वैसे उनकी बातें भड़काऊ भी हैं और इस तरह बातंे उन्हें नहीं करनी चाहिए, लेकिन संजय निरूपम मूल रूप से शिवसैनिक ही हैं और वे आरएसएस की पत्रिका पांचजन्य में भी काम कर चुके हैं, इसलिए कांग्रेसी होने के बावजूद वे भाजपा कार्यकत्र्ताा और शिवसैनिकों की भाषा का इस्तेमाल करते हैं और उनके बयान भी भड़काऊ होते हैं।
संजय निरुपम ने गुजरात में हिन्दी प्रदेशों के लोगों पर हो रहे हमले का हवाला देते हुए कहा कि नरेन्द्र मोदी को भी वाराणसी जाना है। उनकी भाषा में धमकी है, लेकिन वह गुजरात के लोगो को भी याद दिला रहे हैं कि तुम लोगों के राज्य के बाशिंदे जो देश के प्रधानमंत्री भी हैं, वाराणसी लोकसभा क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, इसलिए यह मत समझो कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग ही तुम्हारे प्रदेश में आते हैं, बल्कि तुम्हारे प्रदेश के लोग भी बिहार और उत्तर प्रदेश जाते हैं और वहां के लोगों पर निर्भर हैं।
संजय निरूपम की बात तो अपनी जगह है, लेकिन सच्चाई यह है कि अपनी स्वीकार्यता बढाने या बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। उनकी सरकार के कार्यकाल की विफलता को लेकर विपक्ष उनपर हमलावर है और राहुल गांधी तो राफेल को लेकर उनके ऊपर सीधा हमला भी कर रहे है। प्रधानमंत्री की अपनी छवि उनकी पूंजी रही है और वे भारतीय जनता पार्टी की एकमात्र पूंजी है। उन्हें अपने बल पर ही दुबारा सत्ता में आना है, लेकिन गुजरात में हिन्दी प्रदेशों के लोगों पर हो रहे हमले अंततः नरेन्द्र मोदी के ही खिलाफ जाएंगे।

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एक समय था जब गुजरातियों को मुंबई से भगाने का अभियान शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे चलाते थे। मुंबई की अर्थव्यवस्था पर गुजरातियों का कब्जा था और बाल ठाकरे जैसे लोगों को लगता था कि यदि गुजरातियों को वहां से भगा दिया जाय, तो मराठी लोग संपन्न हो जाएंगे। कहने की जरूरत नहीं कि ठाकरे विफल रहे और उस अभियान के बाद गुजराती क्या भागेंगे, हिन्दी प्रदेशों के लोग भी लाखो की संख्या में वहां पहुंच गए।
बहरहाल, गुजराती अपने प्रदेश के बाहर के लोगों पर हमले कर रहे हैं और उन्हें गुजरात छोड़ने के लिए कह रहे हैं। जिस तरह से हमले हो रहे हैं, उससे तो ऐसा ही लगता है कि दूसरे प्रदेशों के लोगों के खिलाफ गुस्सा एकाएक नहीं बना है। जरूर कोई न कोई शक्ति पहले से काम कर रही होगी। हमले की शुरुआत बिहार के किसी कामगार द्वारा 14 महीने की एक लड़की के साथ बलात्कर की कथित घटना के बाद हुई। आज पूरे उत्तर भारत में इस तरह की बीमारी फैली हुई है और गुजरात के अपने सभी लोग भी इस बीमारी से बचे हुए नहीं हैं। इंटरनेट पर अश्लील क्लिप, टीवी चैनलों पर रियल्टी शो के नाम पर दिखाया जा रहा भौंडापन और शहरी जीवन के तनावों ने दक्षिणी भारत को छोड़कर हर जगह ऐसा माहौल तैयार कर दिया है कि छोटी छोटी बच्चियां तक असुरक्षित हो गई हैं।
पर एक मानसिक रोगी द्वारा किए गए अपराध के लिए गुजरात में रह रहे अन्य प्रदेशों पर हमला बेहद शर्मनाक है। एक व्यक्ति के अपराध के लिए लाखों लोगो को दोष देना गलत है। लेकिन यह सब गुजरात में हो रहा है और इसे रोकने की जिम्मेदारी न केवल गुजरात की सरकार की है, बल्कि वहां के भद्रजनों को भी इसमें भारी पैमाने पर हस्तक्षेप करना होगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दायित्व सबसे ज्यादा बन जाता है, क्योंकि वहां उनकी पार्टी की ही सरकार है। जो कुछ भी वहां हो रहा है, उसका राजनैतिक नुकसान तो भाजपा को ही होगा, इसलिए यह भी संभव है कि भाजपा विरोधी तत्व उस हुड़दंग में सबसे ज्यादा सक्रिय हों। लेकिन उन हुड़दंबियों को पकड़ना और उनके इरादे का नाकाम करने की जिम्मेदारी भी नरेन्द्र मोदी की अपनी सरकार और गुजरात की उनकी पार्टी की सरकार की है। यदि उन्होंने हुडदंगियों पर काबू नहीं पाया, तो वे किस मुह से गुजरात के बाहर वोट मांगेगे?

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ByUpendra Prasad

आधार पर सुप्रीम फैसला: करेंगे मोदी बेनामी संपत्ति पर सर्जिकल स्ट्राइक?

उपेन्द्र प्रसाद

सुप्रीम कोर्ट ने आधार की संवैधानिकता पर अपना फैसला दे दिया है। न केवल इसने आधार को संवैधानिक माना है, बल्कि इस पर बने एक कानून की वैधता की भी पुष्टि कर दी है। उस कानून की वैधता की पुष्टि करते हुए उसने उस अनुच्छेद को हटा दिया है, जिसके तहत निजी कंपनियों को भी आधार डेटा उपलब्ध कराने का प्रावधान था। निजी कंपनियां किसी व्यक्ति को अपना आधार नंबर देने को बाध्य नहीं कर सकती, लेकिन सरकारी सेवाओं और कार्यक्रमों से आधार लिंकिंग पर कोई रोक नहीं लगी है।
यह फैसला ऐतिहासिक है और इसके आधार आधारित प्रशासन व्यवस्था का विकास किया जा सकता है और अनेक प्रशासनिक जगहों से भ्रष्टाचार मिटाया जा सकता है या उसे न्यूनतम किया जा सकता है। यह समाज के लोकतांत्रिककरण की दिशा में आगे बढ़ने का उपकरण साबित हो सकता है। अब सवाल उठता है कि मोदी सरकार आगे क्या करेगी?
काले धन को मिटाने या उस पर रोक लगाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 5 सौ और 1 हजार के पुराने नोटों को रद्द कर दिया था। एकाएक रद्द करने की घोषणा से पूरे देश में अफरातफरी मच गई थी और देश के लोगों को अभूतपूर्व परेशानियों का सामना करना पड़ा था। कितने लोग तो बैंको में अपने पुराने नोट जमा करने और नये नोट निकालने के लिए कतार में खड़े खड़े ही मर गए थे। कुछ बैंककर्मी काम के बोझ के तले दब कर मर गए थे। नोटबंदी के कारण अनेक काम धंधे तबाह हो गए और लाखों लोग बेरोजगार हो गए।
उसके बावजूद उस समय नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी। नोटबंदी के शुरुआती महीनों में जहां जहां चुनाव हो रहे थे, लगभग सभी जगहों पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। नोटतंगी के दौर में ही उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा को अभूतपूर्व और ऐतिहासिक सफलताएं हासिल हुई।
उसका कारण यह था कि लोग वास्तव में काले धन की समानान्तर अर्थव्यवस्था से निजात चाहते थे और उन लोगों को दंडित देखना चाहते थे, जिन्होंने गलत सलत तरीके से अपार धन प्राप्त कर रखे थे। लोगों की वह लालसा नरेन्द्र मादी, उनकी सरकार और उनकी पार्टी को लोकप्रिय बना रही थी और चुनावों में उसके कारण सत्तारूढ़ पार्टी के उम्मीदवार बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे।

पर नोटबंदी विफल हो चुकी है। नोटबंदी की घोषणा करते हुए जितने भी लाभ प्रधानमंत्री ने गिनाए थे, उनमें से एक भी देखने को नहीं मिला। उन्होंने कहा था कि 500 और 1000 के नोट रद्दी के टुकड़ों में तब्दील हो रहे हैं, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। लगभग सभी रद्द किए गए पुराने नोट बैंकों में वापस आ गए हैं। इतनी सारी परेशानियों और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नया नोट छापने में किए गए हजारों करोड़ रुपये के खर्च के बावजूद रद्द की गई करेगी के रूप में काला धन नहीं पकड़ा जा सका और न ही उसे समाप्त किया जा सका। उलटे उस घोषणा के कारण काला धन के निर्माण के कुछ नये रास्ते भी खुल गए और हवाला कारोबारियों, भ्रष्ट बैंक कर्मचारियों और जालसाजों की चांदी हो गई थी।
नोटबंदी के दौर में ही काले धन के विशेषज्ञ यह कहते दिख रहे थे कि काले धन का मात्र 3 से 5 फीसदी ही करेंसी के रूप में लोगों के पास रहता है। काला धन तो सबसे ज्यादा जमीन जायदादा के रूप में लोग अपने पास रखते हैं। इसलिए जमीन जायदाद के रूप में रखे काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है। नोटबंदी की उस तरह हो रही आलोचना के बाद नरेन्द्र मोदी की सरकार ने संकेत दिया था कि आधार से जमीन जायदाद व अन्य संपत्तियों को लिंक कर बेनामी संपत्ति का पता लगाया जा सकता है और उन संपत्तियों को बने नये कानून के तहत सीज किया जा सकता है।

पंजाब नेशनल बैंक का महाघोटाला: मोदी के सामने एक नई चुनौती

लेकिन सरकार के हाथ बंधे हुए थे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में आधार की वैधता और सांवैधानिकता पर ही सवाल खड़े किए जा रहे थे। मामला सुप्रीम कोर्ट में था और सरकार संपत्तियों को आधार से लिंक करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकती थी, क्योंकि उस पैन से लिंक करने का उस निर्णय भी लगातार टलता जा रहा था।
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने आधार की संवैधानिकता को स्वीकार कर लिया है और इसे सामाजिक लोकतंत्र की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है, तो सरकार के सामने वह अवरोध समाप्त हो गया है, जिसके कारण वह आधार से लोगों की अचल संपत्तियों को लिंक करवा सकती है। अचल ही नहीं, सोने जेवरात जैसी चल संपत्तियों को भी सरकार चाहे तो आदेश जारी कर आधार से लिंक करवा सकती है। इससे यह पता चल जाएगा कि किसके पास कितनी संपत्तियां और संपत्तियों का ब्यौरा भी मिल जाएगा।
अभी तो सरकार उन लोगों को ईनाम देने की योजना चला जा रही है, जो किसी अन्य व्यक्ति के पास जमा बेनामी संपत्ति की जानकारी देते हैं। लेकिन अधिकांश जानकारियां अनुमान के आधार पर दी जाती हैं, जिनके कारण कार्रवाई नहीं हो पाती। संपत्तियों को आधार से लिंक किए जाने के बाद खुद संपत्ति मालिक द्वारा ही जानकारी उपलब्ध करा दी जाएगी और उसके बाद बेनामी संपत्तियों का पता आसानी से लग जाएगा।

जिन संपत्तियों की आधार से लिंकिंग नहीं होगी, उन्हें सरकार बेनामी संपत्ति मान सकती है और कानून के अनुसार उसे जब्त किया जा सकता है और उसके जो दावेदार हों, उनके खिलाफ मुकदमा भी चलाया जा सकता है। खुद द्वारा बताई गई संपत्ति का अर्जित करने के सा्रेत बताने में विफल लोगों की संपत्तियां बेनामी संपत्ति नये कानून के तहत पहले ही घोषित हो चुकी है। इसलिए वैसे संपत्तियों को जब्त करने और उनके मालिकों के खिलाफ कार्रवाई करने में सरकारी एजेंसियों को कोई परेशानी नहीं होगी।
सवाल उठता है कि क्या नरेन्द्र मोदी ऐसा साहसिक फैसला ले पाएंगे? उन्हें अगले साल ही देश की जनता से अपने लिए एक और जनादेश की मांग करनी है। बेनामी संपत्ति पर आधार के तोप से किया गया सर्जिकल स्ट्राइक करने के पहले वे निश्चय ही चुनावी नफा नुकसान का आकलन करेंगे।

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