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ByUpendra Prasad

अनारक्षितों को 10 फीसदी आरक्षण: बहुजन राजनीति का अंत?

 

उपेन्द्र प्रसाद

मोदी सरकार द्वारा अनारक्षित समुदायों की कम आय वाले लोगांे को आरक्षण देकर सामाजिक बदलाव को एक नई दिशा दे दी है। जाति आधारित भारतीय समाज पर इसका जबर्दस्त असर पड़ेगा और यह बदलाव सकारात्मक ही होगा। 1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों के लागू किए जाने के बाद भी समाज पर जबर्दस्त असर पड़ा था और उस असर को आजतक महसूस किया जा सकता है।

वीपी सिंह ने किन परिस्थितियों मंे मंडल आयोग की सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने वाली सिफारिश के अमल की घोषणा की थी, यह अब ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसने पूरे समाज को आलोड़ित कर दिया था। उसका सबसे बड़ा असर यह पड़ा कि पहले से आरक्षण पा रहे अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग और मंडल आयोग के तहत आने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग एक मंच पर आ गए थे।

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चूंकि आरक्षण का खूब विरोध हो रहा था और यह विरोध काफी हिंसक और कहीं कहीं आत्मघाती भी था, इसलिए आरक्षण पाने वाले समुदायों के बीच परस्पर अपनापन का बोध हुआ। और इसी बोध से एक नई राजनीति निकली, जिसे बहुजन राजनीति कहा जाता है। इस राजनीति में बहुत संभावनाएं थीं, लेकिन इसका नेतृत्व जातिवादी नेताओं के हाथ में था। उनके जातिवाद का पहला असर तो यह हुआ कि खुद विश्वनाथ प्रताप सिंह उस बहुजनवादी स्कीम से बाहर हो गए, क्योंकि वे आरक्षित तबके से नहीं थे। जातिवादी ओबीसी और दलित नेताओं ने न तो उनका नेतृत्व स्वीकार किया और न ही वह सम्मान दिया, जो उन्हें एक नई राजनीति शुरू करने के लिए मिलना चाहिए था।

पहली गद्दारी मुलायम सिंह यादव ने की। मुलायम की सरकार बिना भाजपा या कांग्रेस के समर्थन के उत्तर प्रदेश में बनी रह सकती थी, लेकिन वीपी सिंह के जनता दल से अलग होकर न केवल मुलायम ने वीपी सिंह को कमजोर किया, बल्कि खुद कांग्रेस के समर्थन पर वह आश्रित हो गए। वीपी सिंह से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले मुलायम की अपनी राजनीति समाप्त होती दिखाई दी, तो उन्होंने 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांशीराम और मायावती की बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन कर लिया।

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मुलायम यादव की इस नाजायज राजनीति से कांशीराम और मायावती जैसे नेता पैदा हुए। ये दोनों पहले से ही बहुजन समाज पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन इन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। उत्तर प्रदेश के 1989 और 1991 के विधानसभा चुनावों में बसपा को 11 -12 सीटें मिली थीं। एक बार मायावती सांसद भी बनी थीं, लेकिन 1991 में अपना चुनाव हार गई थीं।

कांशीराम ने 1980 के दशक में ही यह महसूस कर लिया था कि यदि दलित और ओबीसी का मोर्चा बन जाय, तो यह मोर्चा सत्ता में आ सकता है। लेकिन उस समय समस्या यह थी कि देश के स्तर पर दलितों को तो आरक्षण मिला हुआ था, लेकिन ओबीसी के आरक्षण के लिए बने मंडल आयोग की फाइल केन्द्र सरकार ने दबा रखी थी। उसके लिए कर्पूरी ठाकुर, चैधरी ब्रह्म प्रकाश, चन्द्रजीत यादव, महेन्द्र कुमार सैनी, रामअवधेश सिंह और मधु लिमये जैसे नेता लगातार आंदोलन कर रहे थे। अपनी सीमित शक्ति के साथ कांशीराम भी जब तब मंडल आयोग लागू करो कि नारेबाजी करवा देते थे।

कांशीराम की बहुजन राजनीति के लिए ओबीसी को आरक्षण मिलना जरूरी था। जनता दल का चुनावी घोषणा पत्र मधुलिमये जैसे विद्वान नेता लिखा करते थे और उन्होंने 1989 चुनाव के पहले जनता दल के घोषणा पत्र में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का वायदा डाल रखा था। उस वायदे का दबाव वीपी सिंह सरकार पर था। वीपी सरकार द्वारा बुलाए गए संसद के पहले ही संयुक्त सत्र में जिसे राष्ट्रपति संबोधित करते हैं, लोकदल केे राज्यसभा सांसद रामअवधेश सिंह और बसपा की लोकसभा सांसद मायावती में हंगामा खड़ा कर दिया। उन दोनों ने मंडल आयोग लागू करो के नारे लगाए और जनता दल के कर्पूरी ठाकुर और मुलायम के समर्थकों ने भी उनका साथ दिया।

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बहरहाल, मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की घोषणा हुई और इसके साथ ही दलित और ओबीसी का एक साझा मंच बहुजन नाम से तैयार हो गया। राजनीति पर इसका असर पड़ना लाजिमी था, लेकिन बिकाऊ नेतृत्व के कारण इससे कथित बहुजनों का नुकसान ही हो गया। बहुजन आंदोलन के नेता नैतिक रूप से कमजोर थे। वे लोभी थे और उनमें प्रतिबद्घता भी नहीं थी। बहुजन का नारा लगाकर सत्ता में आना और सत्ता की लूटपाट करना ही उनका उद्देश्य था। सत्ता की लूट में वे एक दूसरे से लड़ते और झगड़ते भी रहे और इस तरह कभी मिलते और कभी टूटते भी रहे।

मुलायम के वीपी द्वेष से पैदा हुए कांशीराम और मायावती ने सबसे पहले बहुजन आंदोलन से गद्दारी की। वे मुलायम के समर्थन से अपनी पार्टी के 67 विधायक जिताने में सफल हुए थे और उनके बूते उन्होंने भाजपा से समर्थन लेकर मुलायम का साथ ही छोड़ दिया। इस तरह उनकी बहुजन राजनीति उनके लालच का शिकार हो गई और उसके बाद समाज में जो कुछ होता रहा, वह तो बहुत ही शोचनीय है। विदेशी शक्तियां भारतीय जातिव्यवस्था में पैदा हो रहे विक्षोभ का लाभ उठाने लगी। बिकाऊ बहुजन बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तैयार हो गया और सत्ता के लिए हुई कथित बहुजन एकता को साम्प्रदायिकता की ओर मोड़ दिया गया। सांपद्रायिकता का वह स्वर हिन्दू धर्म और पहचान का विरोधी था। समाज में एक नई बीमारी पैदा हो गई और इस बीमारी की प्रतिक्रिया ने हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा को सत्ता में लाने का काम कर दिया।

अब सवर्णों को भी आरक्षण मिल गया है। इसके कारण देश की 100 फीसदी जातियां आरक्षण के दायरे में आ गई हैं। दलित और ओबीसी जातियों के आरक्षण के दायरे में आने से वे एक मच पर आ गई थीं और अनारक्षित तबका उनके विरोधी के रूप में उनके अस्तित्व को पहचान दे रहा था। अब जब सारी जातियां आरक्षण के दायरे में आ गई हैं, तो फिर आरक्षण पाने वाली ओबीसी और दलित जातियों के लिए एक काॅमन पहचान की जरूरत ही नहीं रही, क्योंकि यह पहचान आरक्षण विरोधी जातियों के कारण ही थीं। लिहाजा अब बहुजन विमर्श का अंत हो रहा है।

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ByUpendra Prasad

क्या सुप्रीम कोर्ट में टिक पाएगा आर्थिक आधार पर मिला आरक्षण

उपेन्द्र प्रसाद

मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर अनारक्षित तबकों को दिए जा रहे आरक्षण को लेकर एक सवाल यह खड़ा किया जा रहा है कि यह सुप्रीम कोर्ट में टिक ही नहीं पाएगा, क्योंकि पहले भी इस तरह के निर्णय कोर्ट द्वारा खारिज कर दिए गए हैं। अनेक राज्यों ने समय समय पर आंदोलनों के दबाव में आर्थिक आधार पर आरक्षण के फैसले किए और हमेशा सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालयों ने उन्हें खारिज कर दिया। अनेक बार अनारक्षित जातियों को ओबीसी श्रेणी का कहकर भी आरक्षण देने की कोशिश की गई, लेकिन वे सारी कोशिशें भी नाकाम रहीं।
राज्य सरकार की क्या बात, खुद केन्द्र सरकार ने भी 1991 में आर्थिक आधार पर तथाकथित सवर्णो को 10 फीसदी आरक्षण दिए थे। उस समय मंडल का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की पीठ ने की थी। पीठ ने सर्वसम्मति से आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण को खारिज कर दिया। इसका कारण बताते हुए यह कहा गया कि संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था ही नहीं है। उसमें स्पष्ट लिखा गया है कि नागरिकों के पिछड़े वर्ग को ही आरक्षण दिया जाएगा और पिछड़ेपन का आधार सामाजिक और शैक्षिक बताया गया है, आर्थिक नहीं। इसलिए आर्थिक आधार पर दिया गया आरक्षण असंवैधानिक माना गया।

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इसके अतिरिक्त खुद सप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दे रखी है कि आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके कारण ही ओबीसी को मात्र 27 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है, जबकि मंडल आयोग के अनुसार पिछड़ों की आबादी 52 फीसदी है और सिफारिश भी 52 फीसदी आरक्षण देने की की गई थी। हां, यह कहा गया था कि 50 फीसदी सीमा को ध्यान में रखते हुए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण फिलहाल दे दिया जाए और बाद में 50 फीसदी की सीमा को हटाकर उनका आरक्षण 52 फीसदी की दिया जाय।
लेकिन किसी सरकार ने 50 फीसदी की सीमा को हटाने के लिए संविधान में संशोधन नहीं किया और न ही आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए किसी प्रकार की संवैधानिक व्यवस्था की। इसका असर यह हुआ कि भिन्न निन्न आंदोलनों के दबाव मे सरकार ने जब जब आंदोलनकारी समूहों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की, कोर्ट में वह व्यवस्था खारिज हो गई।
क्या मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर दिए जा रहे 10 फीसदी आरक्षण का भी वही हश्र होगा? यह सवाल उठना लाजिमी है। तो इस सवाल का जवाब यही हो सकता है कि यदि संविधान में किसी तरह के बदलाव किए बिना यह फैसला किसी कानून के द्वारा अमल में लाने की कोशिश की जाती है, तो वह कोशिश विफल हो जाएगी। उस निर्णय को अदालत में चुनौती मिलने के बाद अदालत पहले वाले फैसले को दुहराते हुए उसे खारिज कर देगी। लेकिन यदि सरकार ने पहले से ही सावधानी बरती तो संभवतः सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाएगा।

केन्द्र सरकार की सावधानी यही हो सकती है कि वह संविधान की धारा 15 और 16 में बदलाव कर समाज के अनारक्षित तबकों के गरीब लोगों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था कर दे। यानी आर्थिक आधार पर आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था हो जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस आधार पर इसे खारिज नहीं कर पाएगा कि सरकार का वह निर्णय असंवैधानिक है।

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दूसरी अड़चन 50 फीसदी की सीमा है। यह सीमा संविधान ने तय नहीं की है। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई सीमा है और इसे संविधान की धारा 15 और 16 की व्याख्या करके ही तय किया गया है। कोर्ट का कहना है कि इन दोनों धाराओ मे जाति, धर्म, वर्ग, ल्रिग इत्यादि के आधार पर किसी तरह भेदभाव न किए जाने की व्यवस्था है और अपवाद के रूप में पिछड़े वर्गाें के लिए इस समतावादी व्यवस्था के उल्ल्ंाघन का प्रावधान है। मतलब नियम यह है कि भेदभाव नहीं होगा और अपभाद है कि नागरिकों के पिछड़े वर्गो के लिए भेदभाव किया जा सकता है। कोर्ट का कहना है कि यदि 50 फीसदी से अधिक का आरक्षण होता है, तो अपवाद ही नियम बन जाएगा और नियम है जो अपवाद हो जाएगा। इसलिए अपवाद को अपवाद बना रहने के लिए आरक्षण केा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं किया जा सकता।
फिलहाल संविधान की यह व्यवस्था भी संविधान का हिस्सा बन गई है और इसे खारिज करने के लिए संविधान में संशोधन कर स्पष्ट किया जा सकता है कि यह सीमा 60 फीसदी की जाती है या 50 फीसदी से ऊपर जो आरक्षण दिया जा रहा है वह संविधान के उस नियम का हिस्सा है, जो समान अवसर का अधिकार देता है और भेदभाव के खिलाफ है, क्योंकि इस तरह के आरक्षण में धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र, रेस इत्यादि के आधार पर भेदभाव नहीं किया गया है, बल्कि भेदभाव आर्थिक आधार पर किया गया है।
यह तो निश्चित है कि सुप्रीम कोर्ट मे इस निर्णय को चुनौती दी जाएगी और उसमे कहा जाएगा कि 50 फीसदी की सीमा का उल्लंधन संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट मे इसके पक्ष और खिलाफ मे तर्क दिए जाएंगे। फैसला तो अंततः सुप्रीम कोर्ट ही करेगी, लेकिन मंडल मुकदमे मे ओबीसी आरक्षण की पैरवी करने वाले वकील रामजेठमलानी ने अपने एक भाषण में एक बार कहा था कि आरक्षण की 50 फीसदी सीमा के टूटने से संविधान का मूल ढांचा टूटना साबित नहीं हो पाएगा, क्योंकि मूल ढांचा क्या है, इसका निर्घारण जज अपने मत के अनुसार नहीं कर पाएंगे और उन्हे संविधान में ही देखना होगा कि क्या 50 फीसदी की सीमा मूल ढांचे का हिस्सा है या नहीं। चूंकि ऐसा कहीं सविधान मे ंनहीं लिखा हुआ है, इसलिए कोर्ट कुछ भी नहीं कर पाएगा।(संवाद)

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ByUpendra Prasad

एससी/एसटी एक्ट ने डुबोई भाजपा की नैया

उपेन्द्र प्रसाद

तीन हिन्दी प्रदेशों में भाजपा को मिली हार अप्रत्याशित नहीं है। पिछले कुछ समय से देश का राजनैतिक माहौल कुछ ऐसा बन रहा था, जिसके कारण भारतीय जनता पार्टी का सितारा गर्दिश में जाता प्रतीत हो रहा था। यह सच है कि नोटबंदी और जीएसटी की यादों से लोग मुक्त हो चुके थे, लेकिन एससी/एसटी एक्ट के कारण देश की अधिसंख्य आबादी के लोग भाजपा सरकार से बहुत नाराज हो गए थे।

भाजपा के लिए सबसे अधिक चिंता की बात यह थी कि नाराज होने वाले लोगों में वे ही लोग ज्यादातर थे, जो उन्हें सत्ता में लाया करते थे। सवर्ण और ओबीसी के कारण ही भाजपा की सरकारें बनती रही हैं। मुस्लिम और दलित उन्हें वोट नहीं देते हैं। मुस्लिम वोटों की तो भाजपा को परवाह नहीं है, लेकिन दलित मतों के लिए वह 2014 से ही बहुत ज्यादा सक्रिय है और प्रधानमंत्री सत्ता संभालने के बाद ही भीम भीम की माला जप रहे हैं। उन्हीं कोशिशों के तहत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए एससी/एसटी एक्ट को अपने मूल रूप में स्थापित कर दिया। इसके कारण उन्हें दलितों का वोट तो नहीं मिला, लेकिन उनके सवर्ण और ओबीसी मतदाता उनसे जरूर भड़क गए और इसका खामियाजा उनकी पार्टी को पिछले चुनावों में भुगतना पड़ा है।

एससी/एसटी एक्ट पर मोदी सरकार द्वारा दिखाई गई सक्रियता एक और कारण से प्रधानमंत्री के गले की फांस बनी हुई है। भाजपा के मूल समर्थक अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित स्थल पर रामलला का भव्य मंदिर चाहते हैं। उस स्थल का विवाद सुप्रीम कोर्ट में है। अब उनका कहना है कि यदि एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए कानून बनाया जा सकता है, तो फिर राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट को धता बताने में क्या दिक्कत है। उनके समर्थक इस विवाद से संबंधित कानूनी पेचदगियों को समझने के लिए तैयार नहीं हैं और मंदिर निर्माण के लिए नरेन्द्र मोदी पर दबाव डाल रहे हैं। उनमें से कुछ तो भाजपा के विरोध तक जाने की हद तक नाराज हो चुके हैं। भाजपा की इन तीनों राज्यों मंे हार का एक कारण यह भी है। हालांकि सच यह भी है कि संघ और संघ परिवार भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए वह सब कुछ रहा था, जो उनसे संभव था। इसके कारण ही तीनों राज्यों में रिकाॅर्ड मतदान हुए। मध्यप्रदेश और राजस्थान में पराजित होने के बावजूद भाजपा ने कांग्रेस को कड़ी टक्क्र दी। मध्यप्रदेश में तो उसे बहुमत पाने से भी रोक दिया। राजस्थान में भी कांग्रेस अपने टिकट पर बहुमत नहीं पा सकी, हालांकि अपने चुनाव पूर्व सहयोगियों की सहायता से वह बहुमत के आंकड़े को छू चुकी है।

भाजपा चुनाव हार चुकी है, लेकिन कांग्रेस के लिए भी मध्यप्रदेश और राजस्थान में जश्न मनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह सिर्फ भाजपा पर बढ़त का दावा कर सकती है, जीत का नहीं। छत्तीसगढ़ में उसकी निर्णायक जीत जरूर हुई है, लेकिन उसके लिए वह खुद नहीं, बल्कि वहां की परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से ग्रस्त राज्य है और प्रदेश तथा केन्द्र में भाजपा की सरकार होने के कारण वहां नक्सलियों पर पुलिस और सुरक्षाबलों पर काफी दबाव बढ़ा हुआ था। दोनों सरकारें छत्तीसगढ़ की जमीन जंगल और जल को काॅर्पोरेट के हाथों बेचने को सक्रिय थे। नक्सलियों का कांग्रेस से कोई प्रेम नहीं है, लेकिन उन्होंने इस बार उनकी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, क्योंकि उन्हें लगा कि केन्द्र और राज्य सरकारों में अलग अलग पार्टियों की सरकारें होना उनके हित में है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में भी भारी मतदान हुए और वह मतदान कांग्रेस के पक्ष में गया। रमन सिह सरकार ने एक पत्रकार को एक कथित सीडी कांड में गिरफ्तार कर लिया था। वह पत्रकार छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल का रिश्तेदार भी था। श्री बघेल को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। इसके कारण बघेल के प्रति छत्तीसगढ़ में सहानुभूति का भाव था। जेल जाने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें उनके अध्यक्ष पद से नहीं हटाया था। इसका लाभ कांग्रेस को हुआ। राहुल गांधी द्वारा किसानों की कर्जमाफी की घोषणा का भी किसानों द्वारा भारी स्वागत हुआ। इन सब कारणों के सम्मिलित प्रभाव ने वहां कांग्रेस को भारी बहुमत से सत्ता थमा दी है।

तीन राज्यों को भाजपा गंवा चुकी है। ये तीन राज्य वे हैं, जो भाजपा का अपने जन्मकाल से ही सबसे मजबूत गढ़ रहे हैं। राजस्थान और अविभाजित मध्यप्रदेश, जिसका एक हिस्सा अभी झारखंड है, मंे भारतीय जनता पार्टी और उसके पहले भारतीय जनसंघ कांग्रेस को चुनौती देने वाली एक मात्र पार्टी हुआ करती थी। अन्य राज्यों में तो भाजपा बाद मेें मजबूत पार्टी बनी। अब उन राज्यों मंे ह ीवह सत्ता से बाहर हो चुकी है। और उसके बाद सवाल उठता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का क्या होगा? नरेन्द्र मोदी भाजपा के लिए वोट जुगाड़ करने वाले सबसे बड़े नेता हैं। भाजपा में उनका अभी कोई विकल्प नहीं है। क्या वे 2019 के लोकसभा चुनाव मंे अपनी पार्टी को एक बार फिर सत्ता दिला सकेंगे- यह आज का सबसे बड़ा राजनैतिक सवाल है।
यदि मोदी मैजिक की बात की जाय, तो छत्तीसगढ़ में वह मैजिक नहीं चला, लेकिन राजस्थान में वह मैजिक अवश्य चला है, क्योंकि वहां भाजपा की एक बड़ी हार की संभावना व्यक्त की जा रही थी। इसका कारण यह है कि पिछले कुछ उपचुनावों में वहां भाजपा की करारी हार हुई थी। वहां का पूरा माहौल भाजपा और खासकर वसुधरा के खिलाफ था, लेकिन मोदी की कुछ रैलियों के बाद वहां की फिजा बदली और भारतीय जनता पार्टी फिर मुकाबले में आ गई और उसने कांग्रेस को बड़ी जीत से वंचित कर दिया। लेकिन दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में शायद मोदी का जादू नहीं चला। वहां एससी/एसटी एक्ट को लेकर समाज के कुछ तबके में बहुत रोष था और वह रोष मोदी मैजिक पर भारी पड़ा, हालांकि किसानों की समस्या जैसे अन्य मसले भी उसके खिलाफ काम कर रहे थे। तीन राज्यों की हार ने मोदी सरकार की 2019 के बाद वापसी पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं।

 

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ByUpendra Prasad

हम बिहारवासियों के लिए एक आखिरी उम्मीद उपेन्द्र कुशवाहा हीं हैं !

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मौर्यवंशी शशिकांत मेहता

कुछ हमारे कुर्मी मित्र बंधु हैं जो बिहार में आये दिन रालोसपा कार्यकर्ता व ज्यादातर कुशवाहा समाज के लोगो की हत्या, अपहरण जैसे घटना पर बड़े भोले बन कर कहते हैं कि इन घटनाओं के पीछे कौन लोग है उसको कुशवाहा समाज को जाँच करनी चाहिए । इन घटनाओं पर उपेन्द्र कुशवाहा जी को केन्द्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा दे कर राजनीति करनी चाहिए, वगैरह वगैरह ।

अब जब मैं इन कुर्मी मित्रों के टाइम लाइन जब देखता तब कहीं पर बिहार के कुशासन के खिलाफ एक शब्द तक नहीं मिलते, रालोसपा कार्यकर्ता या कुशवाहा समाज के साथ आये दिन हो रहे हत्या-अपहरण पर एक सिम्पैथी पोस्ट तक नहीं मिलता ! फिर यह अचानक कुशवाहा प्रेम उमड़ना ??

उपेंद्र कुशवाहा ने NDA से अलग होने के दिए संकेत, कहा- 'याचना नहीं अब रण होगा, संघर्ष बड़ा भीषण होगा'

दरअसल यह कुशवाहा समाज से प्रेम नहीं है बल्कि एक सोंची-समझी शातिर राजनीति है । राजनीति यह है कि बिहार के कुशासन के खिलाफ उपेन्द्र कुशवाहा ने पिछले कुछ सालों से हमला बोल रखा है खासकर शिक्षा के खिलाफ । बिहार के इस वास्तविक मुद्दे पर नीतिश कुमार घिरता देख व उपेन्द्र कुशवाहा जिसके पास उनके अपने समाज का भी बड़ा वोट बैंक है जिसकी फसल अबतक नीतिश कुमार काटा करते थे वह खिसकता जा रहा था । यहीं महत्वपूर्ण मजबूरी नीतिश कुमार को पतलचाट कर भाजपा के तरफ आ कर अपनी राजनीति बचाने को मजबूर होना पड़ा । आप जरा गौर करेंगे जब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी तब सबसे पहले उन्होंने शिक्षा मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा के स्वजातीय कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा को बनाया जबकि उससे पहले महागठबंधन सरकार में वे पीएचडी व कानून मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे थे । आप अगर मेरे पुराने पोस्ट को देखिए तभी मैंने कहा था कि कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा को शिक्षा मंत्री सिर्फ उपेन्द्र कुशवाहा के दवाब के कारण बनाया गया है ताकि उपेन्द्र कुशवाहा शिक्षा का मुद्दा न उठा सकें और उठायेंगे तो कुछ पतलचटवन कोईरी के मदद से इन दोनों के जातिए लड़ाई बना कर कुशवाहा समाज को तोड़ देंगे जिससे उपेन्द्र कुशवाहा खुद कमजोर हो जायेगा ।

खैर ऐसा हुआ नहीं और उपेन्द्र कुशवाहा लगातार जनहित से जुड़े मुद्दा शिक्षा को लेकर राज्य सरकार पर हमलावर रहे । चुकी उपेन्द्र कुशवाहा एक केन्द्रीय शिक्षा मंत्री हैं साथ हीं NDA के एक पार्टनर भी इसलिए जाहिर सी बात है इस मुद्दे को मीडिया में भी खुब जगह पाई और जनता के बीच भी इस अहम मुद्दे पर खुब चर्चा भी हो रही है और बिहार सरकार की किरकिरी भी ।

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अब इस मुद्दे को भटकाने के लिए नीतिश कुमार के नेतृत्व में जदयु ने दुसरे रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया…..

1. रालोसपा को कैसे साम-दंड से तोड़ कर उपेन्द्र कुशवाहा को कमजोर किया जाए

2. मुजफ्फरपुर बाल गृह योन उतपिड़न में मुख्य आरोपियों को छोड़ मंजू वर्मा को फंसाया गया ताकि इस पर उपेन्द्र कुशवाहा समर्थन करने पर आम जनता के बीच या विरोध करने पर कुशवाहा समाज के बीच दोनों हीं स्थितियों में इसे बदनाम किया जाए पर कामयाब नहीं हुए ।

3. जितने भी पतलचटवन कोईरी हैं उनको अपने घर बुला कर उपेन्द्र कुशवाहा के खिलाफ समाज को भड़काने का टास्क पकड़ा दिया गया और लालच भी खुब दिया गया ।

4. जदयु के सिलिपर सेल में जो हैं उन्हें कुशवाहा समाज के वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक रूप से सक्षम व एक्टीव हैं उन्हें टार्गेट कर रास्ते से हटाने के लिए लगा दिया गया जिसका कारण है बिहार में आये दिन कुशवाहा समाज के ऊपर हमले ।

अब नीतिश कुमार अपने लोगों के माध्यम से बिहार की जनता व कुशवाहा समाज में असफल प्रयास यह अफवाह फैला कर रहें हैं कि उपेन्द्र कुशवाहा NDA में रहते हुए जनता की आवाज बन सड़क पर उतर कर सिर्फ दिखावा कर रहें हैं और उन्हें सत्ता का लोभ है इसलिए इस्तीफा नहीं दे रहें हैं !

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दरअसल मामला यह नहीं है बल्कि बहुत हीं पेंचिदा राजनीतिक खेल है जिसे समझना होगा । जैसा मैंने पहले हीं कह चुका हूँ कि उपेन्द्र कुशवाहा एक केन्द्रीय मंत्री हैं और NDA का पार्टनर भी इसलिए जैसे हीं अपनी हीं सरकार जो जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बल्कि लूटतंत्र में मस्त है उसके खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उससे न सिर्फ इस लूटेरी सरकार की किरकिरी होती बल्कि यह स्टेट मीडिया से लेकर सेंट्रल मीडिया तक के खबरों में आती है जिससे इस निकम्मी सरकार की चर्चा में सच्चाई देश व राज्य की जनता के बीच ज्यादा तेजी से पहुँचती है ! यहीं कारण है कि इनके पतलचटवन लोग, भांड मीडिया इन पर इस्तीफे व NDA से अलग होने का दवाब बनाते हैं ताकि इसमें मंदबुद्धि के राजनीति लोग झांसे में आ कर इनका विरोध कर इस्तीफे के लिए तैयार कर दे जिससे जनता के असल मुद्दों पर मीडिया के माध्यम से चर्चा होना बंद हो जाए और सरकार अपनी किरकिरी से । पर उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली है ! वह नीतिश कुमार के हर चाल से वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि अपने राजनीतिक हीत साधने के लिए नीतिश कुमार किसी भी हद् तक गिर सकते हैं बस उन्हें और गिराना है तथा जनता के बीच उनके तथाकथित आदर्शवाद को नंगा करते रहना है ।

आदर्शवाद के चोला ओढ़े एक शातिर धुर्त राजनीतिक नीतिश कुमार को उपेन्द्र कुशवाहा के रूप में एक साक्षात काल है जो उनकी घटिया राजनीति को समाप्त कर देगा वर्ना इसके सिवाय कोई और नहीं है जो ऐसे धुर्त शातिर राजनीतिज्ञ की राजनीति को कोई समाप्त कर सकता है । हम बिहारवासियों के लिए एक आखिरी उम्मीद उपेन्द्र कुशवाहा हीं हैं ! अब वे कब तक NDA में रहेंगे और आगे का क्या रणनीति अपनाएँगे वह उनके ऊपर है । बस हमें सिर्फ इस नैतिक, लूटेरी सरकार का खात्मा हो बस ।

(From the Facebook Wall of मौर्यवंशी शशिकांत मेहता. This was written just before exit of Upendra Kushwaha from NDA)

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ByUpendra Prasad

देवताओं को जाति प्रमाणपत्र क्यों बांटेंगे योगीजी?

 

उपेन्द्र प्रसाद

राजस्थान में एक चुनावी भाषण में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने हनुमानजी को दलित बताकर अपने आपको प्रहसन का पात्र बना लिया है। योगी देश की सबसे बड़ी आबादी वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री ही नहीं हैं, बल्कि खुद एक संन्यासी हैं और धार्मिक प्रवचन देने में वे सिद्धहस्त माने जाते हैं। वे राजनीति में हैं और राजनैतिक भाषण करने का भी उनका लंबा अनुभव है और कहने की जरूरत नहीं कि वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। यही कारण है कि देश में जहां कहीं भी चुनाव होता है, तो भारतीय जनता पार्टी की तरफ से उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में वहां भेजा जाता है। सच तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद वे भारतीय जनता पार्टी के दूसरे सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं।

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लेकिन जब आप धर्म और राजनीति में घालमेल करेंगे, तो वही होगा, जो आज हो रहा है। हनुमानजी को दलित बताकर योगी न केवल प्रहसन का पात्र बन रहे हैं, बल्कि उनको कानूनी नोटिस भी भेजे जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक भी योगी के उस भाषण के लिए अपनी नाखुशी जता चुके हैं। श्री नाईक ने प्रयागराज में संवाददाताओं का जवाब देते हुए कहा कि योगीजी को भाषण देते समय लोगों की आस्थाओं का भी ध्यान रखना चाहिए।
आखिर हनुमान को दलित कहे जाने पर एतराज किसको है? दलित संगठनों ने इस पर एतराज नहीं किया है, हालांकि यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि हनुमानजी दलित देवता हैं, तो फिर उनके कंधे पर जनेऊ क्यों रहता है? गौरतलब हो कि आजकल दलित वे कहलाते हैं, जो लंबे समय तक छुआछूत के शिकार होते रहे और आज भी कहीं कहीं हो रहे हैं। उन्हें या तो वर्णव्यवस्था से बाहर रखा गया है या शूद्र वर्ण का माना गया है। उनका जनेऊ संस्कार नहीं होता। जनेऊ संस्कार जिसका होता है, वे शूद्र नहीं रह जाते, बल्कि द्विज हो जाते हैं। मनुस्मृति में लिखा गया है,‘‘ जन्मना जायते शूद्राः सस्कारात् द्विज उच्चयते’’। अब ंसंस्कार से मतलब जनेऊ संस्कार का रह गया है। इसलिए यदि हनुमानजी जनेऊ पहनते हैं, तो वे द्विज हो गए। फिर वे न तो शूद्र रहे और न ही अवर्ण। फिर उन्हें दलित क्यो कहा जाए? जाहिर है, हिन्दुत्व की राजनीति करते करते योगीजी हिन्दुत्व का ही गलत स्वरूप लोगों के सामने पेश कर रहे हैं।

Image result for shivaऔर यह सब किया जा रहा है दलित वोट पाने के लिए। योगीजी को लगा कि हनुमान को दलित बताकर दलितों को खुश किया जा सकता है और उन्होंने वैसा कर भी दिया। लेकिन जो शिक्षित दलित हैं, उन्हें भी पता है कि जनेऊ धारी हनुमान उनके समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते। सच तो यह है कि केन्द्र मे सत्ता में आने के बाद ही भारतीय जनता पार्टी दलितो को अपने साथ जोड़ने के लिए जबर्दस्त मेहनत कर रही है। वह प्रतीकवाद का सहारा लेकर उन्हें अपने पक्ष में करना चाहती है। अम्बेडकर को गौरवान्वित करना उसी रणनीति का हिस्सा है, लेकिन सत्ता के केन्द्र में जब भागीदारी की बात आती है, तो भाजपा की सरकारे पीछे हटती दिखाई पड़ती हैं। इसलिए बीजेपी का भीमराग काम नहीं कर रहा है। और अब योगीजी ने हनुमान राग अलापकर दलितों पर डोरा डालने का काम शुरू कर दिया है।
हनुमान को दलित कहने से सबसे ज्यादा नाराज ब्राह्मण समुदाय ही है। उसी के एक संगठन ने योगीजी को कानूनी नोटिस भेजा है। वे योगीजी के भाषण से आहत महसूस कर रहे हैं। हनुमानजी को पहले गिरीजन और आदिवासी भी कहा जाता था। अब भी कहा जाता है। लेकिन इस पर किसी को आपत्ति नहीं होती, क्योंकि गिरीजन, आदिवासी या वनवासी किसी भी वर्ण का हो सकता है। हनुमान तो जंगल में रहते भी थे, इसलिए उन्हें वनवासी, गिरीजन और आदिवासी कहे जाने पर किसी को एतराज नहीं हो सकता, लेकिन दलित का अपना एक अलग मतलब होता है, जिसका संबंध समाज की जातिवादी और वर्णवादी संरचना से है।

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हनुमानजी बानर या उसी की एक प्रजाति से थे। ऐसा बताया गया है। भारतीय जनता पार्टी के एक दलित नेता, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन्होंने वानर शब्द की एक अलग व्याख्या पेश की थी। वे नेता थे सूरजभान, जो उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी हुआ करते थे। उन्होंने कहा कि वानर शब्द दो शब्दों के साथ मिलकर बना हुआ एक अपभ्रंश शब्द है। वे दो शब्द हैं वन और नर। हनुमानजी वन नर थे और ये दोनों एक साथ मिलकर वानर हो गए, लेकिन वे मानव प्रजाति के ही थे, न कि बंदर प्रजाति के।
अब हनुमानजी क्या थे और क्या नहीं थे या थे भी या नहीं, लेकिन योगीजी के भाषण ने सोशल मीडिया पर एक बहस छेड़ दी है और देवताओं की जातियां पूछी और बताई जा रही हैं। शिव जी जाति क्या थी और शनि महाराज की जाति क्या है। यमराज की जाति तक पूछी और बताई जा रही है। कोई शिवजी को भंगी बता रहा है, क्योंकि उनका एक नाम भंगी भी है, जो शायद उनकी भंग( विघ्वंस) करने की भूमिका के कारण है, लेकिन गहराई में जाये बिना उन्हें भंगी बताकर योगीजी को सलाह दी जा रही है कि अगले भाषण में वे शिवजी को भी भंगी घोषित कर ही दें, क्योंकि इससे वोटों की बेहतर फसल काटी जा सकती है।
यमराज की सवारी भैंसा होता है। भैंस चराने वाले भी शान से भैंस की सवारी करते हैं। इसलिए सोशल मीडिया में यमराज को अहीर बताया जा रहा है। शनि महाराज को तेल का चढ़ावा पसंद है, इसलिए उनकी जाति तेली बताई जा रही है और योगीजी को सलाह दी जा रही है कि वे बिना हिचक यमराज और शनि महाराज के लिए भी क्रमशः अहीर और तेली जाति का प्रमाणपत्र जारी कर ही दें।
आज राजनीति का विचित्र दौर चल रहा है। जातिवाद और सांप्रदायिकता के सहारे पहले भी चुनाव लड़े और जीते जाते रहे हैं, लेकिन वह सब एक हद के अंदर ही हुआ करता था, लेकिन अब वह हद टूट चुका है। शब्दों की मर्यादा अब टूट चुकी है। जो सड़क छाप नेता पहले आपसी बातचीत या नुक्कड़ की बातचीत में कहा करते थे, अब वही बातें विशाल जनसभाओं में भी की जाती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन सच है।

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ByUpendra Prasad

Modern Caste System is the Creation of European for Converting Hindu Communities into Christianity

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Tribhuwan Singh

Creation of modern Caste System was done for hunting the different Hindu communities in pieces, one by one, for conversion in the fold of Christianity.
They became hugely successful.

It were Portuguese bigot uneducated Christians, sponsored agents of Kings Nobles and Churches who succeeded to touch the India sea coasts in 1498. Wascodegama was his leader. They captured the land of Goa.

They used term #Caste most prevalent in Europe and sanctioned legally to compartmentalize the society in Nobel’s and serfdom, for different communities of India. Caste term originally comes from Portuguese and Latin word Castas.

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The travellers from Europe who came in contact of India in last five hundred years used word Caste and Tribes for Varnas. Tavernier and Venire two eminent travellers who came in contact of India used word caste and tribes to describe four Varna’s of Hindu system. They are treated as historians and Indologists by Historians.

Till date though these two terms which have been most often used by constitutional social and political systems and powers, have not been able to define that for what these terms actually exist.

Rest of the Europeans who followed Portuguese to India used this word caste expensively to define social, manufacturing and service communities of India.

When Britons took over Bengal in 1757 most of their first 50 years went on plundering stealing destroying the Indian manufacturers and states. They were able to establish themselves politically in this time period. In 1799 after defeating Tipu Sultan Dr Francis Hamilton Buchanan was given duty of surveying territory under East India Company about Indian agriculture and agro based economy and manufacturing along with technical details of manufacturing of various types of fabrics, leather material, iron steel and so many other things. He noted minute details of various technologies and came out with a 3 volume book in 1807 titled as “Journey from Madras through the countries of Mysore Canara and Malabar”. This was published by East India Company and its important documentation for Economic Historians of World. This book was gives detail description of social framework of Hindu society of that time.

Buchanan classified Hindu Society in 122 Castes/ Trades which is first official classification of its kind. He used word “Pure Caste” for Varna, and word “Caste” for “jati or Jat”.

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In next fifty years Briton pirates continued to plunder and money drain of India along with destruction of Indian manufacturing trade and Industry, which resulted in massive unemployment poverty hunger and de industrialization.

It resulted in massive revolt in 1857 by Indian Hindus and Muslims, which was suppressed by middle age brutality, obviously with the help of few Indian native kings.

After 1858 policy of Britons changed drastically. They used various methods to redescribe Indian History and society as per their political and Evangelical requirements.

New researches and Historians like Paul Baroch Angus Madison, Amiya Baghachi, have concluded that India was shareholder of more than 24% of Word GDP till 1750 from 0 AD, while British and USA combined were merely shareholders of 2% world GDP in 1759. But Briton destroyed agro trade and industry, so that India became share holder of only 2% world GDP in 1900.

In third 50th year of British Administration 2.5 to 3.0 crore Indians died because of malnutrition hunger and poverty as they couldn’t purchase food to feed themselves, because of British created unemployment and de industrialisation of India. But these facts were hidden from whole world in their documents.

Meanwhile they became busy in dividing India by creating massive hoax and rumours. They used several rumours for various reasons to create different identities amongst Hindus to “Divide and rule” and ” fabricate the concocted stories in the name of fictitious science to create the background of conversion”.

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Maxmuller dreamed of a Fantasy of certain Races speaking#Aryan_languages used to lived together in Asian Steppe before they migrated to west ( Europe) and East ( India) , in neighbourhood of Semites ( Read Jews) and Turaniyans ( read Islamists), in an unknown Era to the historians.

It caught the imagination of all pervert European Christians and this story was written and rewritten in various formats by European Christians. Their total aim was to delink their Religious Ancestry from Jews because of inbuilt hatred in Christianity towards them. It resulted in massive blood loss of Jews and Gypsies in Second World War by #Aryanized_Christians in leadership of Hitler.

Simultaneously they created #Dravida identity in South India by same perverted logics and fantasies of Aryan Invasion.

This Aryan fantasy was used to define Hindu society too along with biblical mapping of Hindu society based on #Curse_Of_Noah.
Curse of Noah created the basis of colour discrimination by white Christians towards non Christians.
By applying this curse they divided Hindus in their nongovernmental and semi governmental documents in Savarnas and Asavarnas, literally by interpreting meaning Varna as colour.
Fourth 50th year they used these fabricated and concocted pervert stories as part of state documentation to create the legal basis for future conversions.
Maxmuller, who has been worshipped as a great sage by Indian academia had declared that “Caste …… is greatest hurdle in conversion. But it might work as powerful engine of conversion in future not of Individuals but of whole community”.

So they targeted Caste and Brahmanism. They postulated that Caste was evil and it was creation of Brahmins while Aryans were entering in India, as Caste word is not mentioned in Vedas.

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Nesfield and Risley came with the postulation (story) that Caste was created by Aryans capturing the females of Aborigines (read Shudra and Dravid) and by making them wives and concubines.

They started segregating and isolating the different Hindu communities in different groups to address current divide and rule problems and to created background for future conversions.

They started Census of India in 1872. Census was government documentation, so it was a legalised tool too. They did census on basis of Varna in 1872 and 1881.
Census of 1891 was done on the basis of profession.
In 1901Lord HH Risley used various methods including anthrometry for census and identified 2378 castes and 42 races in Hindu community. He used name of Manusmriti that it mentions four Castes (not Varna’s) and then went on applying his own module to divide Hindu society in 13 broad groups.

Initial six groups were so called Aryans or Savarnas (1- Brahmins 2- Allied Castes to Brahmins 3- Kshatriya 4- Allied Caste to Kshatriya 5- Vaishya 6- Allied castes to Vaishya).
There were designated as upper castes by Risley and his successor Census commissioners, rest were designated as lower castes by him and others.
This Caste based census was continued in 1911, 1921, and 1931. It was discarded in 1941.

They targeted different Hindu communities and made laws to identify them separately from the others. This total exercise was done to create solid legal background for conversion of Hindus into Christian fold.

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They used a word #Depressed_Class in 1917 in disguise of educating the children of unemployed and de industrialized Hindus, which became part of 1921 Census. But its definition was not given that which group and communities will come under depressed class.

In 1928 Simon gave the task of defining this depressed class to Dr Ambedkar, who identified them as #Untouchables and submitted his report to Lothian committee in 1932.

Most of us are aware of Britons exercise of nominating Dr Ambedkar as representative of these newly created untouchables and giving them political bribe of separate electorate, followed by Gandhi’s fast strike and Poona pact.

In 1935 Government Act of India was created by British parliament, which in 1936 created a list of 429 castes as Scheduled Castes. It became part of Indian Constitution in 1950.

How did they target them sequentially?

First target was #banwasis , who were isolate recognized as #Animist in Census, later on incorporated in Constitution as Scheduled Tribes. Huge success in converting them.

Second Target was different artisan and manufacturing and farming communities, who were displaced from their traditional profession. Recognized in British Census as Shudra/ Aborigines/ untouchables / Dravida, later on incorporated Constitution as Scheduled Caste. But in sociology they are still recognized as #Moolniwasi , a translation of Aborigines or #Adivasi again translation of Aborigines.
They were incorporated in Constitution as #Scheduled Castes.

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They became successful in hunting them isolately different small fragments of this larger community, and ultimately converting them in Christianity.

All the people of #Kori or #Koli community are second best example of second category, as the records say that they were Respectable #BaisRajpoot whose whole family including females were used to weave the cloths, which had attracted ruffians and Pirates to come to the India.

Third category OBCs are extension of second one, who were again isolated for hunting and converting in 1989. They are now on target of foreign funded Christian missionaries, since then.
The separate communities who prefer to serve in the army from Non OBC community are targeted to go for violent movement, so that army can be weakened.

You have seen #Patidar community, #Jat community’s violent movement to get enrolled in OBC.
#Karani community, #Maratha Community, certain #Rajput community their next target.

Though many experts have proven that the proponent of Aryan Invasion Theory #Maxmuller was a Swindler, but the way Ruffian Christians were successful in Incorporating #Aryan_Dravid_Aborigines divide in Constitution of India, their goal of Hunting to Convert has-been hugely successful in India.

#Indian_Perspective_of_Caste :
Caste neither denotes Varna nor Jati/Jat. Indian human resource were categorized in four classes which was known as Varna- Brahmin ( Medha shakti – Intellectual force) Kshatriya ( Raksha Shakti – Defence Force ) Vaishya ( Vanijya – Trade ) and Shudra ( Service sector and manufacturing force also known as Shilpi).

Varna also denotes colour but irony is that it has no relation with Savarn or Asavarna.

Sawarna means within the same class, Asavarna means out of the class.

Whereas Jati or jat simply means extended family tree since more than ten thousand years.
According to Amarskosh Jat means – normal birth. How one can be society simply can be classified in upper or lower caste/ jati according to this simple understanding of Jati/Jat.

There are more than hundreds jatis or castes within each Varna according to Indian understanding of Hindu society.
But today Brahmin Kshatriya and Vaishya are three upper caste, and Shudra have been classified in more than six thousand castes after interference and interpretation of British colonizers.

 

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ByUpendra Prasad

मैकॉले से पहले क्या था..

हरिशंकर शाही

थॉमस बैबिंग्टन मैकॉले, यह एक ऐसा नाम है, जो भारत के वर्तमान हिंदुस्तानी समाज को आज तक प्रभावित करता है, और अक्सर मैकॉले को राक्षस और देवता दोनों बनाकर दिखाया जाता है. भले ही थॉमस बैबिंग्टन मैकॉले या लॉर्ड मैकॉले की मौत को 160 साल हो चुके हों, लेकिन यह नाम भारत में आज भी मथा जाता है, कहीं-कहीं तो गाली में और कहीं-कहीं तो महानता में.

और यह सब मैकॉले की शिक्षा नीति के साये में होता है जो 1835 में ब्रिटिश संसद पेश और लागू की गई थी. इसी के साए में कहा जाता है कि मैकॉले ने गुरूकुल पद्धति को समाप्त करके आधुनिक शिक्षा पद्धति को पूरे हिंदुस्तान के लिए पेश किया. वैसे कई इसके ठीक उलट तर्क भी पेश करते हैं.

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थॉमस बैबिंग्टन मैकॉले, एफआरएस (फेलो ऑफ रॉयल सोसाइटी- जो ब्रिटिश या यूरोपियन क्षेत्र की जानी-मानी विज्ञान सभा है), एफआरएसई (फेलो ऑफ रॉयल सोसाइटी ऑफ एडिनबर्ग- यह एक स्कॉटिश विद्वानों की सभा है), पीसी (प्रिवी काउंसिल के सदस्य – यह ब्रिटिश सम्राट या सम्राज्ञी के खास सलाहकारों संस्था है) पूरी तरह से पक्के ब्रिटिश थे और उनका 1834-1838 तक भारत में किया गया शोध या जानकारी प्राप्त करने का काम ही आगे नियम कानून बनाने का आधार था. वैसे 1834-38 यानी कुल 4 सालों में उन्होंने आज के पाकिस्तान से लेकर आज के बांग्लादेश और आज के रामेश्वरम तक सारा शोध कर डाला, यह भी कमाल था क्योंकि आज के जेट युग में भी इतनी तेज़ दौड़ने वाली गाड़ी और रेकार्ड व प्रासेस करने वाला कंप्यूटर मिलना मुश्किल है.

खैर हम यहाँ मैकॉले के प्रसिद्ध “मैकॉलेज़ मिनट्स ऑन एज्युकेशन, फरवरी 2, 1835” पर बात कर रहे हैं, जिसके आधार पर आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की नींव पड़ी थी. मैकॉले ने ब्रिटिश संसद में दी गई बहस में अरबी और संस्कृत भाषा में शिक्षा दिए जाने के पहलूओं और शिक्षा की भाषा पर अपने विचार दिए जिसे लागू किया गया साथ वैज्ञानिक शिक्षा पर सुझाव दिए जिसे बाद में वैसे का वैसा माना गया.

लेकिन इस दौरान उन्होंने एक शब्द युग्म का प्रयोग किया “लर्न्ड नेटिव्स ऑफ इंडिया” जो इस शिक्षा – यानी उनके द्वारा सुझाई गई शिक्षा – के प्रति काफी उत्सुक थे. अब यह लर्न्ड नेटिव्स यानी पढ़े-लिखे मूलनिवासी कौन थे, जाहिर है भारत की आज प्रचलित मूलनिवासी थ्योरी के मूलनिवासी तो होंगे नहीं. क्योंकि उनका तो संस्कृत पढ़ना अपराध था. तो फिर यह लर्न्ड नेटिव्स कौन थे और उनको संस्कृत भी आती रही हो. तो जहाँ तक अंगर संस्कृत ज्ञाता होने की बात है तो फिर यह तो ब्राह्मण क्लास रही होगी, तो क्या मैकाले द्वारा विज्ञान की शिक्षा के साथी वह लर्न्ड नेटिव्स, ब्राह्मण रहे होंगे. लेकिन हिंदुस्तान में प्रचलित थ्योरी तो यह मानती है कि ब्राह्मण गुरूकुल से सीधे लाभ प्राप्त करने वाले लोग थे तो ऐसे में अपना ही नुक्सान क्यों किया. क्या कोई करता है ऐसा?

साथ ही एक बात और अगर मैकॉले की पद्धति के ब्राह्मण यानी लर्न्ड नेटिव्स अगर साथी थे. तो फिर जाहिर है यह उनको फायदा देने वाली व्यवस्था होगी. तो ऐसे में जैसा प्रचारित किया जाता है कि इस पद्धति नुकसान किया तो आखिर वह नुकसान किया किसका होगा. आखिर किसी ना किसी को तो मैकॉले ने प्रभावित किया ही होगा.

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अब आती है विज्ञान और ज्ञान की भाषा की बात. पहली बात तो यह है कि वेदपाठी गुरूकुल में कौन जाता रहा होगा, क्योंकि अगर जाता रहा होता, तो “पढ़ैं फ़ारसी बेचें तेल” और “हाथ कंगन को आरसी क्या, और पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या” जैसी कहावतों में फ़ारसी के स्थान पर संस्कृत होना चाहिए था. भाषा-विज्ञान की बहसों में अक्सर हमारे उत्तर भारत के आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले अधिकांश शब्दों के फ़ारसी उद्मम मिलते हैं, ऐसे में फ़ारसी की लिपि कैलीग्राफ या प्रचीन लिपियों के करीब मिलती है. आगे यह कि संस्कृत तो बनारस में टिकी नहीं रह पाई जहाँ से लोग संस्कृत पढ़ने की दुहाई देते हैं, तो बाकी जगहों को जाने देते हैं.

खैर हमारा मकसद भाषाविज्ञान की बहसों में पड़ना नहीं है, हमारे बिंदु यह है कि आखिर मैकॉले का असर किस गुरुकुल शिक्षा पद्धति पर पड़ा होगा जबकि गुरुकुल शिक्षा पद्धति और संस्कृत पढ़कर तेल बेचने जैसा कोई जनमानस वाली कहावत नहीं है.

तो क्या मैकॉले के ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा ने हमारे ग्रामों और उनके भीतर मौजूद कामगारों के अपने धातुविज्ञान, बैद्यों के नाड़ी ज्ञान और आदिवासियों के तमाम जड़ी-बूटी और पशुओं और जंगलों के ज्ञान के नकारा साबित करने हुए उनको उनकी जड़ों से नफ़रत करना नहीं सिखाया.

मैकॉले का फायदा किसानों और कामगारों को होता कम दिखा क्योंकि शायद यह उनके लिए था नहीं या यह उसके लिए तैयार नहीं थे, या भारतीय परंपरागत ज्ञान को सूत्र में बांधना इस व्यवस्था काम था ही नहीं. अगर संस्कृत ज्ञान की भाषा होती तो वह लर्न्ड नेटिव्स जिनको संस्कृत आती थी वे मैकॉले के साथ खड़े होते क्या. तो आखिर मैकॉले का यह सुधार किसके खिलाफ था. सोचने की जरूरत है.

सवाल लंबे हैं, और जवाब भी तो अगले कुछ दिन मैकॉले और शिक्षा पद्धति और ब्रिटिश संसद के आस-पास ही घूमा जाएगा

From the Facebook Wall of Harishankar Shahi

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ByUpendra Prasad

क्या सीबीआई संकट नरेन्द्र मोदी का वाटरलू साबित होगा?

उपेन्द्र प्रसाद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। वे लगातार बढ़ती जा रही हैं। ताजा समस्या सीबीआई के संकट से जुड़ी हुई है। इसके कारण मोदी प्रशासन की संकट मोचक क्षमता पर तो सवाल उठा ही है, इसके राजनैतिक निहितार्थ भाजपा के लिए और भी मारक है। राहुल गांधी को इस संकट के रूप में अपना राफेल मुद्दा और भी जोर शोर से उठाने का मौका मिला है और सरकार इस मसले पर जितना मुह खोलती है, वह उतना ही संदिग्ध होती जा रही है। उसके पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि राफेल की कीमत 3 गुना क्यों बढ़ गई। सच तो यह है कि इसकी कीमत के बारे में किसी प्रकार की जानकारी भी सरकार लोगों के साथ शेयर नहीं करना चाहती। सरकार के पास इस सवाल का जवाब भी नहीं है कि उसने सरकारी क्षेत्र के हिन्दुस्तान एयरोनाॅक्सि लिमिटेड से आॅफसेट ठेका छीनकर अनिल अंबानी की अनुभवहीन कंपनी के पास क्यों जाने दिया?
सीबीआई का यह संकट दो अधिकारियों के बीच वर्चस्व का नतीजा है। वैसे संगठन मे वर्चस्व तो उसी का होता है, जो उसका प्रमुख होता है और निदेशक होने के नाते आलोक वर्मा ही इस संगठन के प्रमुख थे। इसलिए वर्चस्व तो उन्हीं का होना चाहिए था, पर प्रधानमंत्री की नजदीकी के कारण राकेश अस्थाना उनके समानान्तर एक सत्ता बन गए थे और पूरे संकट का मूल कारण भी यही है। कहते हैं कि आलोक वर्मा ने अस्थाना के समानान्तर वर्चस्व को स्वीकार भी कर लिया था, लेकिन अमित शाह के एक पसंदीदा अफसर एके शर्मा के सीबीआई में अतिरिक्त महानिदेशक के रूप में आने के बाद आलोक वर्मा अपने वर्चस्व को मिल रही चुनौती के खिलाफ सक्रिय हो गए थे। इस तरह से संगठन में दो गुट बन गए और मामला बिगड़ता चला गया। एक दूसरे के ऊपर भ्रष्टाचार के लगाए आरोपों के मामले मे वर्मा और अस्थाना में से कौन सही हैं और कौन गलत, इसके बारे में इस समय कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन संगठन की गुटबाजी रोकने में केन्द्र या सीवीसी ( केन्द्रीय निगरानी आयोग) की विफलता को स्वतः स्पष्ट है।

दरअसल कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सितारे गर्दिश में चल रहे हैं। उस चुनाव के बाद जिस तरह से बहुमत को नकार कर अल्पमत यदुरप्पा सरकार का गठन हुआ, वह बहुत ही आपत्तिजनक था और उसके बाद यह लगने लगा था कि चुनावों के नतीजो को भी अर्थहीन बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी तत्पर है। यदुरप्पा की सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण खरीद- फरोख्त से अपना अस्तित्व बचाने की घोषित मंशा में विफल हो गई, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र पर मंडराते खतरे की घंटी बजा दी थी। उसके साथ ही कुछ ऐसे संघ विरोधी लोग जो बेहतरी की उम्मीद में नरेन्द्र मोदी के समर्थक बने हुए थे, वे एकाएक मोदी के खिलाफ हो गए। गुजरात और कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा की गई गलतबयानियों ने भी उनकी छवि को धूमिल करने का काम किया और उनका समर्थन सिर्फ संघ और भाजपा के दायरे तक सिमटना शुरू हो गया।
कर्नाटक चुनाव के बाद एसएसी-एसटीएक्ट पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी की एक और परीक्षा ली, जिसमें वे विफल हो गए। उन्होंने एक गलत राजनैतिक कदम उठाते हुए एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए संशोधन को निरस्त कर दिया। कोर्ट का फैसला गलत नहीं था, क्योकि इस एक्ट का भारी पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। इस एक्ट के खिलाफ सवर्ण ही नहीं, बल्कि ओबीसी समुदायों के लोग भी हैं। अल्पसंख्यक समुदाय भी इसे समाप्त देखना चाहता है, लेकिन कुछ दलित नेताओं के दबाव मंे प्रधानमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करते हुए एक और कानूनी संशोधन कर डाला।

उसका असर यह हुआ कि मोदी के सवर्ण समर्थक एकाएक नाराज हो गए और वे मोदी विरोधी हो गए। सोशल मीडिया में वे नोटा के पक्ष में अभियान चलाने लगे। वे भाजपा को वोट न देने की कसमें खाने लगे। दलित वोट पाने के लिए नरेन्द्र मोदी ने अपने सबसे प्रबल समर्थक आधार सवर्ण को ही नाराज कर दिया और नये नये बने ओबीसी आधार को भी नाखुश कर दिया, क्योंकि वे सब इस एक्ट के दुरुपयोग के कारण अपने आपको पीड़ित पा रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि एसएसी-एसटी एक्ट ने नरेन्द्र मोदी और भाजपा का भारी नुकसान पहुंचा दिया है। दलित आधार में उसके घुसने की दूर दूर तक कोई संभावना नहीं, क्योंकि मोदी सरकार से उनकी शिकायत बढ़ती ही जा रही है। एसएसी-एसटी एक्ट के बाद सोशल मीडिया पर मोदी भक्तों की संख्या घटकर आधी हो गई है। उसके कारण मोदी विरोधी आज सोशल मीडिया में मोदी समर्थकों पर हावी हो गए हैं।
इस बीच राफेल नरेन्द्र मोदी के लिए एक स्थायी चुनौती बना हुआ है। यह आश्चर्य की बात है कि गैर कांग्रेसी विपक्ष एक मसले पर खामोश क्यों है। शायद वह इसलिए चुप है, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने की उसमें क्षमता नहीं, क्योंकि वह खुद दूध का धुला हुआ नहीं है। लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस इस मसले को छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं हैं और सीबीआई का ताजा संकट उसे एक और मौका दे रहा है कि वह इस मसले को और भी हवा दे। उधर सभी एजेंडे को कांग्रेस की ओर मोड़ने की रणनीति में अब भाजपा अपने आपको घिरी पा रही है। उसकी रणनीति कांग्रेस के प्रति आक्रामक रुख बनाकर पुराने जमाने को ही मुद्दा बनाए रखना था, लेकिन जब सवाल आपके ऊपर टकटकी लगाए हुए हो, तो पहले आपको उन सवालों से निबटना होता है और उन्हें छोड़कर आपने अपनी तरफ से सवाल दागने शुरू कर दिए, तो फिर आप खुद प्रहसन का पात्र बन जाते हैं। यही नरेन्द्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी के साथ हो रहा है। और इसके साथ ही यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या सीबीआई का वर्तमान संकट नरेन्द्र मोदी के लिए वाटरलू साबित होगा।

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ByUpendra Prasad

सीबीआई संकट का अमित शाह कनेक्शनः अफसर एके शर्मा के कारण बढ़ा अस्थाना- वर्मा विवाद?

संतोष सिंह

 

सीबीआई में मचे घमासान की बिसात काफी पहले बिछ चुकी थी। बस, सही समय का इंतजार किया जा रहा था। लेकिन, आलोक वर्मा छह महीने में इतने मजबूत हो जाएंगे ये किसी ने नहीं सोचा था।
ये पूरी स्टोरी वर्मा और अस्थाना के साथ काम करने वाले एक ऐसे सूत्र से सामने आई है जो दोनों की कार्यशैली पर 20 वर्षों से नजर रख रहे हैं ।
शुरुआत केन्द्रीय कैबिनेट सचिव से करते हैं- नाम प्रदीप कुमार सिन्हा। बिहार से हैं और अस्थाना भी नेहरहाट से पढ़े हैं। बिहार कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी के बेटे से अपनी बेटी की शादी की है । आलोक वर्मा और प्रदीप कुमार सिन्हा में पुराना रिश्ता रहा है। प्रदीप कुमार सिन्हा पर मोदी को बहुत भरोसा है। दो बार सेवा विस्तार भी मिल चुंका है। राकेश अस्थाना को निदेशक बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद कहा ये जा रहा कि आलोक वर्मा का नाम प्रदीक कुमार सिन्हा ने सुझाया था। दोनों के बीच वर्षों पुराना रिश्ता रहा है। वैसे भी आलोक वर्मा की कभी कड़क छवि नहीं रही। इनकी पहचान सहज, सुलभ औऱ सत्ता के वफादार के रुप में होती थी। सरकार को भी ऐसे ही अधिकारी की जरुरत थी। सरकार वर्मा को निदेशक तो बना दी, लेकिन भरोसा राकेश अस्थाना पर कहीं ज्यादा था। इस वजह से दोनों के बीच खटास बढती ही चली गई। वर्मा कई बार अस्थाना की शिकायत लेकर पीएमओ गये, लेकिन कभी अस्थाना की शिकायत सुनी नहीं गयी।
इसी बीच गुजरात कैडर के ही सीनियर आईपीएस अधिकारी एकेशर्मा जो अमित शाह के काफी करीबी माने जाते हैं, इस खेल में इनकी एंट्री होती है क्योंकि राकेश अस्थाना का मोदी के सीधे किचेन तक प्रवेश था। इस वजह से अस्थाना कई मौके पर अमित शाह के आदेश को नजरअंदाज कर देते थे। इस वजह से अमित शाह भी अस्थाना के साथ उतना सहज महसूस नहीं करते थे। लेकिन, मोदी के चहेते होने के कारण कुछ कर भी नहीं सकते थे ।
वही एके शर्मा औऱ राजेश अस्थाना के बीच गुजरात से ही 36 का रिश्ता था। कई बार दोनों एक दूसरे को सार्वजनिक रुप से अपमानित कर चुके थे । जैसे ही मौका मिला एकेशर्मा आलोक वर्मा के साथ जुड़ गये और धीरे- धीरे राकेश अस्थाना के खिलाफ गोलबंदी शुरु हो गयी। फिर भी आलोक वर्मा किसी तरह से अपना कार्यकाल पूरा करके निकल जाना चाह रहे थे, लेकिन इसी बीच राकेश अस्थाना ने एक फर्जी बयान के सहारे आलोक वर्मा पर सीधा हमला बोल दिया। आलोक वर्मा इसकी शिकायत पीएमओ तक किए, लेेकिन किसी ने कोई नोटिस तक नहीं लिया ।

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मामला भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ था। ऐसे में आलोक वर्मा को समझ में आ गया कि पलटवार नहीं किये तो फिर रिटायरमेंट के बाद भी मुश्किलें बढ सकती है।.. और फिर शुरु हुआ अॉपरेशन अस्थाना। जिस दौरान अस्थाना और उनके साथ जुड़े सीबीआई के एक दर्जन से अधिक अधिकारी और एक रॉ के अधिकारी जो अस्थाना का बैचमेट हैं उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के पर्याप्त सबूत मिल गये ।
सीबीआई के दफ्तर में रहते हुए भी अस्थाना को इसकी भनक तक नहीं लगी कि उनके खिलाफ इतना बड़ा अॉपरेशन चल रहा है। इतने गुप्त तरीके से ये सब चल रहा था कि जब तक पता चलता तब तक अनुसंधान लगभग पूरी कर ली गयी थी। जैसे ही इसकी भनक लगी, अचानक एक खबर लुटियन जोन में काफी तेजी से फैलायी गयी कि आलोक वर्मा राफेल वाले में जाते-जाते जांच का आदेश कर देंगे। इसी बीच अस्थाना के खिलाफ कारवाई की सूचना पीएमओ पहुंची। खबर फैलाने वाले की बात में दम दिखने लगा। फिर क्या था, अस्थाना ने एक बार फिर साहब के लिए अपनी नौकरी तक दांव पर लगाने की बात कह बड़ा दांव खेल दिया, क्योंकि वर्मा औऱ शर्मा को हटना इतना आसान नहीं था।.. औऱ इन दोनों के हटे बगैर अस्थाना की खैर नहीं थी। फिर क्या था- वर्मा औऱ शर्मा के जितने भी करीबी अधिकारी थे उनको रातोंरात हटा दिया गया। देखिए आगे आगे होता है क्या। लेकिन, वर्मा भी कम पहुंचे हुए खिलाड़ी नहीं हैं। नौकरी का अधिकांश समय दिल्ली में गुजरा है औऱ नेटवर्क बनाने वालों में इनकी गिनती रही है ।
(ये पूरी स्टोरी वर्मा और अस्थाना के साथ काम कर चुके एक सीनियर अधिकारी के हवाले से लिखी गयी है जो मुझे अक्सर हाइप्रोफाईल मामलों की जानकारी देते रहते हैं और इनकी जानकारी काफी सटीक रहती है ।

From the Facebook Wall of Santosh Singh, the Editor of Kashish News Channel

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ByUpendra Prasad

सीबीआई के अंदर घमासान : प्रधानमंत्री मोदी के सामने एक नया संकट

उपेन्द्र प्रसाद

देश के पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अगले चंद महीनों के अंदर लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। और बीच देश की सबसे बड़ी जांच एजंेसी केन्द्रीय जांच ब्यूरो( सीबीआई) के अंदर घमासान छिड़ गया है। देखने पर तो यह घमासान सीबीआई के दो वरिष्ठतम पदों पर बैठे दो अधिकारियों के बीच में है, लेकिन यह घमासान अपने जद में पूरी सीबीआई और उसकी नियंत्रक राजनैतिक प्रतिष्ठान को भी घेरे में लेने की क्षमता रखता है। सीबीआई अब सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय यानी प्रधानमंत्री के नियंत्रण में है, इसलिए सवाल देश के सर्वोच्च कार्यालय पर भी खड़े हो सकते हैं।
एक अभूतपूर्व घटना के तहत सीबीआई ने अपने दूसरे सबसे बड़े अधिकारी राकेश अस्थाना पर तीन करोड़ रुपया घूस लेकर मांस निर्यातक मोइन कुरेशी के मामले से जुड़े एक व्यापारी साना को क्लीनचिट देने के मामले में मुकदमा किया है। दिलचस्प है कि अस्थाना सीबीआई प्रमुख और अपने बाॅस आलोक वर्मा पर उस व्यापारी से दो करोड़ रुपया घूस लेकर उसे बचाने की कोशिश करने का आरोप लगा रहे थे। यह आरोप उन्होंने लिखित रूप से लगाया था और उनके द्वारा लगाए आरोप की जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है।
और इस बीच सीबीआई प्रमुख ने अपने डिपुटी अस्थाना पर ही उसी व्यापारी को गवाह बनाकर तीन करोड़ की घूस लेने के मामले मे फंसा दिया। इसमें एक और दिलचस्प बात है और वह यह है कि अस्थाना के खिलाफ मुकदमा दायर करने के पहले ऊपर से इजाजत नहीं ली गई, जबकि उस तरह की इजाजत जरूरी थी। जाहिर है, वर्मा हड़बड़ी में हैं और अपने ऊपर लगाए गए आरोप की जांच पूरी होने के पहले ही उन्होंने उसी व्यापारी की गवाही से अपने डिपुटी अस्थाना पर मुकदमा ठोंक दिया है।
जब बात मुकदमेबाजी की आती है, तो मामला अदालत के पास पहुंचता है और अदालतें सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती हैं। यह भी देखा जाता है कि वह गवाह कितना विश्वसनीय है। इस मामले मे गवाह वह व्यक्ति है, जो खुद जांच के तहत गिरफ्तारी और दोषी साबित होने के खतरे का सामना कर रहा था। वर्मा का कहना है कि साना ने अस्थाना को घूस दिए, तो अस्थाना का कहना है कि साना ने वर्मा को घूस दिए। अब चूंकि सीबीआई की कमान वर्मा के हाथ में है, तो उन्होंने अपने बाॅस होने का फायदा उठाते हुए डिपुटी पर मुकदमा ठोक दिया और यदि अस्थाना वर्मा के बाॅस होते तो यह मुकदमा वर्मा पर ठोका जाता।

अब किसने घूस लिया, इसका पता तो बात में चलेगा या चलेगा भी या नहीं, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन जो कुछ सामने आ रहा है, उससे सीबीआई मजाक बनती जा रही है। सीबीआई के पास एक से एक बड़े और संवदेनशील मुकदमे हैं और इस अंदरूनी झगड़े से उसकी कार्यक्षमता निश्चय ही प्रभावित होगी और इससे देश का ही नुकसान होगा, क्योंकि विजय माल्या से लेकर, नीरव मोदी और अन्य अनेक हजारों करोड़ रूपये की लूट के मामले को सीबीआई देख रही है। खुद अस्थाना विजय माल्या औ अगुस्ता हेलिकाॅप्टर घोटाले के मामले को देख रहे हैं। अब वे उन मामलों को देखने की जगह अब अपना मुकदमा देखेंगे।
खुद भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना करते हुए कोई सीबीआई अधिकारी अन्य भ्रष्टाचार के मामले की जांच करने को नैतिक रूप से कितना सक्षम है, यह अलग सवाल है, जिस पर बहस की जा सकती है, लेकिन यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब सीबीआई को मिलजुलकर काम करना चाहिए था।
राकेश अस्थाना की छवि एक ईमानदार अधिकारी की है। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उनपर राजनैतिक दबाव असर नहीं करता और वे अपने कैरियर को दांव पर लगाकर वह वही करते हैं, जिसे वे अपना फर्ज समझते हैं। बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले में लालू यादव को सजा दिलवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वे गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और नरेन्द्र मोदी के साथ काम करने का उनका लंबा अनुभव रहा है। सीबीआई में उन्हें नरेन्द्र मोदी की पसंद का आदमी कहा जाता है।
चूंकि सीबीआई सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के मातहत काम करती है, इसलिए मोदीजी के लिए यह घमासान एक बहुत बड़ी चुनौती है। यदि वे इसे संभालने में विफल रहे, तो सबसे पहले तो इस संस्था की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाएगी और सारे अधिकारी खेमेबाजी में लग जाएंगे और उससे भी बुरा तब होगा, जब यह मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चला जाएगा। एफआईआई दायर किए जाने के बाद यह मामला अदालत में चला ही गया है और अब अस्थाना अपनी निजी हैसियत से भी उस मुकदमे को निरस्त कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

दोनों के बीच संघर्ष पिछले कई महीनों से मीडिया की सुर्खियां बन रहे थे। अस्थाना ले आरोप लगाया था कि वर्मा रेलवे होटल घोटाले के मामले में लालू और उनके परिवार के खिलाफ हो रही जांच को धीमा करने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब हो कि यह मामला भी अस्थाना के हाथ में ही है। आरोप है कि वर्मा ने छापा मारने से मना कर दिया था और उसके बावजूद छापे पड़े और सीबीआई की कार्रवाई आगे बढ़ी। वह मामला मीडिया में आने के बाद दोनों के झगड़े और तेज हुए और मोइन कुरेशी मामले में भी अस्थाना ने वर्मा पर अनावश्यक हस्तक्षेप का आरोप लगाया। इस बीच साना को बचाने के लिए एक राजनेता का नाम भी चर्चा मे आ गई।
सीबीआई के इस अंदरूनी संग्राम को रोकना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्हें अपने स्तर पर हस्तक्षेप कर यह पता लगाना चाहिए कि दोनों अधिकारियों में कौन सही है और कौन गलत। जो गलत है, उसे बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। यदि यह संग्राम नहीं रूका तो ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं और ऐसे एसे खुलासे- सही या गलत- हो सकते हैं, जिससे मोदी को राजनैतिक नुकसान हो सकता है।

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