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ByUpendra Prasad

एससी/एसटी एक्ट ने डुबोई भाजपा की नैया

उपेन्द्र प्रसाद

तीन हिन्दी प्रदेशों में भाजपा को मिली हार अप्रत्याशित नहीं है। पिछले कुछ समय से देश का राजनैतिक माहौल कुछ ऐसा बन रहा था, जिसके कारण भारतीय जनता पार्टी का सितारा गर्दिश में जाता प्रतीत हो रहा था। यह सच है कि नोटबंदी और जीएसटी की यादों से लोग मुक्त हो चुके थे, लेकिन एससी/एसटी एक्ट के कारण देश की अधिसंख्य आबादी के लोग भाजपा सरकार से बहुत नाराज हो गए थे।

भाजपा के लिए सबसे अधिक चिंता की बात यह थी कि नाराज होने वाले लोगों में वे ही लोग ज्यादातर थे, जो उन्हें सत्ता में लाया करते थे। सवर्ण और ओबीसी के कारण ही भाजपा की सरकारें बनती रही हैं। मुस्लिम और दलित उन्हें वोट नहीं देते हैं। मुस्लिम वोटों की तो भाजपा को परवाह नहीं है, लेकिन दलित मतों के लिए वह 2014 से ही बहुत ज्यादा सक्रिय है और प्रधानमंत्री सत्ता संभालने के बाद ही भीम भीम की माला जप रहे हैं। उन्हीं कोशिशों के तहत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए एससी/एसटी एक्ट को अपने मूल रूप में स्थापित कर दिया। इसके कारण उन्हें दलितों का वोट तो नहीं मिला, लेकिन उनके सवर्ण और ओबीसी मतदाता उनसे जरूर भड़क गए और इसका खामियाजा उनकी पार्टी को पिछले चुनावों में भुगतना पड़ा है।

एससी/एसटी एक्ट पर मोदी सरकार द्वारा दिखाई गई सक्रियता एक और कारण से प्रधानमंत्री के गले की फांस बनी हुई है। भाजपा के मूल समर्थक अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित स्थल पर रामलला का भव्य मंदिर चाहते हैं। उस स्थल का विवाद सुप्रीम कोर्ट में है। अब उनका कहना है कि यदि एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए कानून बनाया जा सकता है, तो फिर राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट को धता बताने में क्या दिक्कत है। उनके समर्थक इस विवाद से संबंधित कानूनी पेचदगियों को समझने के लिए तैयार नहीं हैं और मंदिर निर्माण के लिए नरेन्द्र मोदी पर दबाव डाल रहे हैं। उनमें से कुछ तो भाजपा के विरोध तक जाने की हद तक नाराज हो चुके हैं। भाजपा की इन तीनों राज्यों मंे हार का एक कारण यह भी है। हालांकि सच यह भी है कि संघ और संघ परिवार भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए वह सब कुछ रहा था, जो उनसे संभव था। इसके कारण ही तीनों राज्यों में रिकाॅर्ड मतदान हुए। मध्यप्रदेश और राजस्थान में पराजित होने के बावजूद भाजपा ने कांग्रेस को कड़ी टक्क्र दी। मध्यप्रदेश में तो उसे बहुमत पाने से भी रोक दिया। राजस्थान में भी कांग्रेस अपने टिकट पर बहुमत नहीं पा सकी, हालांकि अपने चुनाव पूर्व सहयोगियों की सहायता से वह बहुमत के आंकड़े को छू चुकी है।

भाजपा चुनाव हार चुकी है, लेकिन कांग्रेस के लिए भी मध्यप्रदेश और राजस्थान में जश्न मनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह सिर्फ भाजपा पर बढ़त का दावा कर सकती है, जीत का नहीं। छत्तीसगढ़ में उसकी निर्णायक जीत जरूर हुई है, लेकिन उसके लिए वह खुद नहीं, बल्कि वहां की परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से ग्रस्त राज्य है और प्रदेश तथा केन्द्र में भाजपा की सरकार होने के कारण वहां नक्सलियों पर पुलिस और सुरक्षाबलों पर काफी दबाव बढ़ा हुआ था। दोनों सरकारें छत्तीसगढ़ की जमीन जंगल और जल को काॅर्पोरेट के हाथों बेचने को सक्रिय थे। नक्सलियों का कांग्रेस से कोई प्रेम नहीं है, लेकिन उन्होंने इस बार उनकी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, क्योंकि उन्हें लगा कि केन्द्र और राज्य सरकारों में अलग अलग पार्टियों की सरकारें होना उनके हित में है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में भी भारी मतदान हुए और वह मतदान कांग्रेस के पक्ष में गया। रमन सिह सरकार ने एक पत्रकार को एक कथित सीडी कांड में गिरफ्तार कर लिया था। वह पत्रकार छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल का रिश्तेदार भी था। श्री बघेल को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। इसके कारण बघेल के प्रति छत्तीसगढ़ में सहानुभूति का भाव था। जेल जाने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें उनके अध्यक्ष पद से नहीं हटाया था। इसका लाभ कांग्रेस को हुआ। राहुल गांधी द्वारा किसानों की कर्जमाफी की घोषणा का भी किसानों द्वारा भारी स्वागत हुआ। इन सब कारणों के सम्मिलित प्रभाव ने वहां कांग्रेस को भारी बहुमत से सत्ता थमा दी है।

तीन राज्यों को भाजपा गंवा चुकी है। ये तीन राज्य वे हैं, जो भाजपा का अपने जन्मकाल से ही सबसे मजबूत गढ़ रहे हैं। राजस्थान और अविभाजित मध्यप्रदेश, जिसका एक हिस्सा अभी झारखंड है, मंे भारतीय जनता पार्टी और उसके पहले भारतीय जनसंघ कांग्रेस को चुनौती देने वाली एक मात्र पार्टी हुआ करती थी। अन्य राज्यों में तो भाजपा बाद मेें मजबूत पार्टी बनी। अब उन राज्यों मंे ह ीवह सत्ता से बाहर हो चुकी है। और उसके बाद सवाल उठता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का क्या होगा? नरेन्द्र मोदी भाजपा के लिए वोट जुगाड़ करने वाले सबसे बड़े नेता हैं। भाजपा में उनका अभी कोई विकल्प नहीं है। क्या वे 2019 के लोकसभा चुनाव मंे अपनी पार्टी को एक बार फिर सत्ता दिला सकेंगे- यह आज का सबसे बड़ा राजनैतिक सवाल है।
यदि मोदी मैजिक की बात की जाय, तो छत्तीसगढ़ में वह मैजिक नहीं चला, लेकिन राजस्थान में वह मैजिक अवश्य चला है, क्योंकि वहां भाजपा की एक बड़ी हार की संभावना व्यक्त की जा रही थी। इसका कारण यह है कि पिछले कुछ उपचुनावों में वहां भाजपा की करारी हार हुई थी। वहां का पूरा माहौल भाजपा और खासकर वसुधरा के खिलाफ था, लेकिन मोदी की कुछ रैलियों के बाद वहां की फिजा बदली और भारतीय जनता पार्टी फिर मुकाबले में आ गई और उसने कांग्रेस को बड़ी जीत से वंचित कर दिया। लेकिन दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में शायद मोदी का जादू नहीं चला। वहां एससी/एसटी एक्ट को लेकर समाज के कुछ तबके में बहुत रोष था और वह रोष मोदी मैजिक पर भारी पड़ा, हालांकि किसानों की समस्या जैसे अन्य मसले भी उसके खिलाफ काम कर रहे थे। तीन राज्यों की हार ने मोदी सरकार की 2019 के बाद वापसी पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं।

 

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ByUpendra Prasad

हम बिहारवासियों के लिए एक आखिरी उम्मीद उपेन्द्र कुशवाहा हीं हैं !

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मौर्यवंशी शशिकांत मेहता

कुछ हमारे कुर्मी मित्र बंधु हैं जो बिहार में आये दिन रालोसपा कार्यकर्ता व ज्यादातर कुशवाहा समाज के लोगो की हत्या, अपहरण जैसे घटना पर बड़े भोले बन कर कहते हैं कि इन घटनाओं के पीछे कौन लोग है उसको कुशवाहा समाज को जाँच करनी चाहिए । इन घटनाओं पर उपेन्द्र कुशवाहा जी को केन्द्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा दे कर राजनीति करनी चाहिए, वगैरह वगैरह ।

अब जब मैं इन कुर्मी मित्रों के टाइम लाइन जब देखता तब कहीं पर बिहार के कुशासन के खिलाफ एक शब्द तक नहीं मिलते, रालोसपा कार्यकर्ता या कुशवाहा समाज के साथ आये दिन हो रहे हत्या-अपहरण पर एक सिम्पैथी पोस्ट तक नहीं मिलता ! फिर यह अचानक कुशवाहा प्रेम उमड़ना ??

उपेंद्र कुशवाहा ने NDA से अलग होने के दिए संकेत, कहा- 'याचना नहीं अब रण होगा, संघर्ष बड़ा भीषण होगा'

दरअसल यह कुशवाहा समाज से प्रेम नहीं है बल्कि एक सोंची-समझी शातिर राजनीति है । राजनीति यह है कि बिहार के कुशासन के खिलाफ उपेन्द्र कुशवाहा ने पिछले कुछ सालों से हमला बोल रखा है खासकर शिक्षा के खिलाफ । बिहार के इस वास्तविक मुद्दे पर नीतिश कुमार घिरता देख व उपेन्द्र कुशवाहा जिसके पास उनके अपने समाज का भी बड़ा वोट बैंक है जिसकी फसल अबतक नीतिश कुमार काटा करते थे वह खिसकता जा रहा था । यहीं महत्वपूर्ण मजबूरी नीतिश कुमार को पतलचाट कर भाजपा के तरफ आ कर अपनी राजनीति बचाने को मजबूर होना पड़ा । आप जरा गौर करेंगे जब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी तब सबसे पहले उन्होंने शिक्षा मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा के स्वजातीय कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा को बनाया जबकि उससे पहले महागठबंधन सरकार में वे पीएचडी व कानून मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे थे । आप अगर मेरे पुराने पोस्ट को देखिए तभी मैंने कहा था कि कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा को शिक्षा मंत्री सिर्फ उपेन्द्र कुशवाहा के दवाब के कारण बनाया गया है ताकि उपेन्द्र कुशवाहा शिक्षा का मुद्दा न उठा सकें और उठायेंगे तो कुछ पतलचटवन कोईरी के मदद से इन दोनों के जातिए लड़ाई बना कर कुशवाहा समाज को तोड़ देंगे जिससे उपेन्द्र कुशवाहा खुद कमजोर हो जायेगा ।

खैर ऐसा हुआ नहीं और उपेन्द्र कुशवाहा लगातार जनहित से जुड़े मुद्दा शिक्षा को लेकर राज्य सरकार पर हमलावर रहे । चुकी उपेन्द्र कुशवाहा एक केन्द्रीय शिक्षा मंत्री हैं साथ हीं NDA के एक पार्टनर भी इसलिए जाहिर सी बात है इस मुद्दे को मीडिया में भी खुब जगह पाई और जनता के बीच भी इस अहम मुद्दे पर खुब चर्चा भी हो रही है और बिहार सरकार की किरकिरी भी ।

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अब इस मुद्दे को भटकाने के लिए नीतिश कुमार के नेतृत्व में जदयु ने दुसरे रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया…..

1. रालोसपा को कैसे साम-दंड से तोड़ कर उपेन्द्र कुशवाहा को कमजोर किया जाए

2. मुजफ्फरपुर बाल गृह योन उतपिड़न में मुख्य आरोपियों को छोड़ मंजू वर्मा को फंसाया गया ताकि इस पर उपेन्द्र कुशवाहा समर्थन करने पर आम जनता के बीच या विरोध करने पर कुशवाहा समाज के बीच दोनों हीं स्थितियों में इसे बदनाम किया जाए पर कामयाब नहीं हुए ।

3. जितने भी पतलचटवन कोईरी हैं उनको अपने घर बुला कर उपेन्द्र कुशवाहा के खिलाफ समाज को भड़काने का टास्क पकड़ा दिया गया और लालच भी खुब दिया गया ।

4. जदयु के सिलिपर सेल में जो हैं उन्हें कुशवाहा समाज के वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक रूप से सक्षम व एक्टीव हैं उन्हें टार्गेट कर रास्ते से हटाने के लिए लगा दिया गया जिसका कारण है बिहार में आये दिन कुशवाहा समाज के ऊपर हमले ।

अब नीतिश कुमार अपने लोगों के माध्यम से बिहार की जनता व कुशवाहा समाज में असफल प्रयास यह अफवाह फैला कर रहें हैं कि उपेन्द्र कुशवाहा NDA में रहते हुए जनता की आवाज बन सड़क पर उतर कर सिर्फ दिखावा कर रहें हैं और उन्हें सत्ता का लोभ है इसलिए इस्तीफा नहीं दे रहें हैं !

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दरअसल मामला यह नहीं है बल्कि बहुत हीं पेंचिदा राजनीतिक खेल है जिसे समझना होगा । जैसा मैंने पहले हीं कह चुका हूँ कि उपेन्द्र कुशवाहा एक केन्द्रीय मंत्री हैं और NDA का पार्टनर भी इसलिए जैसे हीं अपनी हीं सरकार जो जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बल्कि लूटतंत्र में मस्त है उसके खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उससे न सिर्फ इस लूटेरी सरकार की किरकिरी होती बल्कि यह स्टेट मीडिया से लेकर सेंट्रल मीडिया तक के खबरों में आती है जिससे इस निकम्मी सरकार की चर्चा में सच्चाई देश व राज्य की जनता के बीच ज्यादा तेजी से पहुँचती है ! यहीं कारण है कि इनके पतलचटवन लोग, भांड मीडिया इन पर इस्तीफे व NDA से अलग होने का दवाब बनाते हैं ताकि इसमें मंदबुद्धि के राजनीति लोग झांसे में आ कर इनका विरोध कर इस्तीफे के लिए तैयार कर दे जिससे जनता के असल मुद्दों पर मीडिया के माध्यम से चर्चा होना बंद हो जाए और सरकार अपनी किरकिरी से । पर उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली है ! वह नीतिश कुमार के हर चाल से वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि अपने राजनीतिक हीत साधने के लिए नीतिश कुमार किसी भी हद् तक गिर सकते हैं बस उन्हें और गिराना है तथा जनता के बीच उनके तथाकथित आदर्शवाद को नंगा करते रहना है ।

आदर्शवाद के चोला ओढ़े एक शातिर धुर्त राजनीतिक नीतिश कुमार को उपेन्द्र कुशवाहा के रूप में एक साक्षात काल है जो उनकी घटिया राजनीति को समाप्त कर देगा वर्ना इसके सिवाय कोई और नहीं है जो ऐसे धुर्त शातिर राजनीतिज्ञ की राजनीति को कोई समाप्त कर सकता है । हम बिहारवासियों के लिए एक आखिरी उम्मीद उपेन्द्र कुशवाहा हीं हैं ! अब वे कब तक NDA में रहेंगे और आगे का क्या रणनीति अपनाएँगे वह उनके ऊपर है । बस हमें सिर्फ इस नैतिक, लूटेरी सरकार का खात्मा हो बस ।

(From the Facebook Wall of मौर्यवंशी शशिकांत मेहता. This was written just before exit of Upendra Kushwaha from NDA)

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ByUpendra Prasad

सीबीआई संकट का अमित शाह कनेक्शनः अफसर एके शर्मा के कारण बढ़ा अस्थाना- वर्मा विवाद?

संतोष सिंह

 

सीबीआई में मचे घमासान की बिसात काफी पहले बिछ चुकी थी। बस, सही समय का इंतजार किया जा रहा था। लेकिन, आलोक वर्मा छह महीने में इतने मजबूत हो जाएंगे ये किसी ने नहीं सोचा था।
ये पूरी स्टोरी वर्मा और अस्थाना के साथ काम करने वाले एक ऐसे सूत्र से सामने आई है जो दोनों की कार्यशैली पर 20 वर्षों से नजर रख रहे हैं ।
शुरुआत केन्द्रीय कैबिनेट सचिव से करते हैं- नाम प्रदीप कुमार सिन्हा। बिहार से हैं और अस्थाना भी नेहरहाट से पढ़े हैं। बिहार कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी के बेटे से अपनी बेटी की शादी की है । आलोक वर्मा और प्रदीप कुमार सिन्हा में पुराना रिश्ता रहा है। प्रदीप कुमार सिन्हा पर मोदी को बहुत भरोसा है। दो बार सेवा विस्तार भी मिल चुंका है। राकेश अस्थाना को निदेशक बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद कहा ये जा रहा कि आलोक वर्मा का नाम प्रदीक कुमार सिन्हा ने सुझाया था। दोनों के बीच वर्षों पुराना रिश्ता रहा है। वैसे भी आलोक वर्मा की कभी कड़क छवि नहीं रही। इनकी पहचान सहज, सुलभ औऱ सत्ता के वफादार के रुप में होती थी। सरकार को भी ऐसे ही अधिकारी की जरुरत थी। सरकार वर्मा को निदेशक तो बना दी, लेकिन भरोसा राकेश अस्थाना पर कहीं ज्यादा था। इस वजह से दोनों के बीच खटास बढती ही चली गई। वर्मा कई बार अस्थाना की शिकायत लेकर पीएमओ गये, लेकिन कभी अस्थाना की शिकायत सुनी नहीं गयी।
इसी बीच गुजरात कैडर के ही सीनियर आईपीएस अधिकारी एकेशर्मा जो अमित शाह के काफी करीबी माने जाते हैं, इस खेल में इनकी एंट्री होती है क्योंकि राकेश अस्थाना का मोदी के सीधे किचेन तक प्रवेश था। इस वजह से अस्थाना कई मौके पर अमित शाह के आदेश को नजरअंदाज कर देते थे। इस वजह से अमित शाह भी अस्थाना के साथ उतना सहज महसूस नहीं करते थे। लेकिन, मोदी के चहेते होने के कारण कुछ कर भी नहीं सकते थे ।
वही एके शर्मा औऱ राजेश अस्थाना के बीच गुजरात से ही 36 का रिश्ता था। कई बार दोनों एक दूसरे को सार्वजनिक रुप से अपमानित कर चुके थे । जैसे ही मौका मिला एकेशर्मा आलोक वर्मा के साथ जुड़ गये और धीरे- धीरे राकेश अस्थाना के खिलाफ गोलबंदी शुरु हो गयी। फिर भी आलोक वर्मा किसी तरह से अपना कार्यकाल पूरा करके निकल जाना चाह रहे थे, लेकिन इसी बीच राकेश अस्थाना ने एक फर्जी बयान के सहारे आलोक वर्मा पर सीधा हमला बोल दिया। आलोक वर्मा इसकी शिकायत पीएमओ तक किए, लेेकिन किसी ने कोई नोटिस तक नहीं लिया ।

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मामला भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ था। ऐसे में आलोक वर्मा को समझ में आ गया कि पलटवार नहीं किये तो फिर रिटायरमेंट के बाद भी मुश्किलें बढ सकती है।.. और फिर शुरु हुआ अॉपरेशन अस्थाना। जिस दौरान अस्थाना और उनके साथ जुड़े सीबीआई के एक दर्जन से अधिक अधिकारी और एक रॉ के अधिकारी जो अस्थाना का बैचमेट हैं उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के पर्याप्त सबूत मिल गये ।
सीबीआई के दफ्तर में रहते हुए भी अस्थाना को इसकी भनक तक नहीं लगी कि उनके खिलाफ इतना बड़ा अॉपरेशन चल रहा है। इतने गुप्त तरीके से ये सब चल रहा था कि जब तक पता चलता तब तक अनुसंधान लगभग पूरी कर ली गयी थी। जैसे ही इसकी भनक लगी, अचानक एक खबर लुटियन जोन में काफी तेजी से फैलायी गयी कि आलोक वर्मा राफेल वाले में जाते-जाते जांच का आदेश कर देंगे। इसी बीच अस्थाना के खिलाफ कारवाई की सूचना पीएमओ पहुंची। खबर फैलाने वाले की बात में दम दिखने लगा। फिर क्या था, अस्थाना ने एक बार फिर साहब के लिए अपनी नौकरी तक दांव पर लगाने की बात कह बड़ा दांव खेल दिया, क्योंकि वर्मा औऱ शर्मा को हटना इतना आसान नहीं था।.. औऱ इन दोनों के हटे बगैर अस्थाना की खैर नहीं थी। फिर क्या था- वर्मा औऱ शर्मा के जितने भी करीबी अधिकारी थे उनको रातोंरात हटा दिया गया। देखिए आगे आगे होता है क्या। लेकिन, वर्मा भी कम पहुंचे हुए खिलाड़ी नहीं हैं। नौकरी का अधिकांश समय दिल्ली में गुजरा है औऱ नेटवर्क बनाने वालों में इनकी गिनती रही है ।
(ये पूरी स्टोरी वर्मा और अस्थाना के साथ काम कर चुके एक सीनियर अधिकारी के हवाले से लिखी गयी है जो मुझे अक्सर हाइप्रोफाईल मामलों की जानकारी देते रहते हैं और इनकी जानकारी काफी सटीक रहती है ।

From the Facebook Wall of Santosh Singh, the Editor of Kashish News Channel

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