Category Archive Recent News

ByUpendra Prasad

एसटी-एससी, ओबीसी लगा रहे त्रिवेदी, गौड़ और झा सरनेम

उपाध्याय, पांडेय, भार्गव, गौड़, त्रिवेदी, झा, तोमर, बघेल, भदौरिया, गोयल और व्यास… ये वे उपनाम (सरनेम) हैं, जिनकी वजह से पीएससी इन दिनों परेशान है। हाल ही में जारी पीएससी 2013 की चयन सूची जारी होने के बाद उसे दोबारा इन सरनेम वाले परीक्षार्थियों के परिणाम निकालकर जांचने पड़ रहे हैं।

गलत परिणाम घोषित करने के आरोपों में घिरे रहने वाले पीएससी ने इस बार पारदर्शिता लाने की काफी कोशिश की थी। बावजूद इसके इस बार भी बड़ी संख्या में शिकायतें पहुंचीं। अधिकांश में यह आरोप था कि पीएससी ने आरक्षित कोटे की सीटों में सवर्णों को प्रवेश दे दिया। शिकायत सामने आते ही पीएससी में हड़कंप मच गया। सूत्रों के मुताबिक आरक्षित वर्ग के कोटे में सवर्णों में पाए जाने वाले सरनेम वाले परीक्षार्थी थे, उनकी कॉपियां और दस्तावेज दोबारा खुलवाए गए।

चयन सूची में शामिल कुछ खास सरनेम को आरोप लगाने वालों ने जिन नामों को आधार बनाकर पीएससी को शिकायत की है वे निम्न है। योगेश कुमार उपाध्याय, आलोक पांडेय, अग्नीश गोयल ,सौरभ तोमर, कीर्ति बघेल, बरखा गौड़ और आशा भार्गव जैसे उम्मीदवारों को अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग में आरक्षण का लाभ देते हुए चयनित किया गया है। ऐसे ही मीना झा, अजय झा नामक उम्मीदवारों को भी ओबीसी श्रेणी का लाभ दे दिया गया है।

आरोप लगाया जा रहा है कि सभी सरनेम सवर्ण जातियों के हैं। ऐसे में चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी कर सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को लाभ दे दिया गया है। इन उपनाम वाले अन्य उम्मीदवार चयन सूची में सामान्य श्रेणी में ही चुने गए हैं।

जांच के बाद पाया गया कि सूची में 21 उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके सरनेम सर्वणों में पाए जाने वाले सरनेम जैसे ही हैं लेकिन उनके दस्तावेजें के मुताबिक वे आरक्षित वर्ग में ही आते हैं। इसी आधार पर आरक्षित वर्ग में उनका चयन हुआ। यह असमंजस इस वजह से भी ज्यादा था कि एक समान सरनेम वालों में कुछ का चयन तो सामान्य वर्ग में हुआ, जबिक कुछ के चयन में जातिगत आरक्षण का उल्लेख था।

सरनेम नहीं, सर्टिफिकेट आधार

सरनेम के आधार पर किसी को आरक्षित या अनारक्षित नहीं माना जा सकता। आरक्षित वर्ग में चयनित हर उम्मीदवार के जाति प्रमाण-पत्र का सत्यापन इंटरव्यू से पहले ही हो चुका है। आरक्षण के लिए शासन द्वारा नियमानुसार जारी जाति प्रमाण-पत्र मान्य होता है, न कि सरनेम। -मनोहर दुबे, सचिव पीएससी

 

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

तीसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका है

विकास तेली

#तीसरा_विश्व_युद्ध दुनियाँ भर के लोग सोचते हैं कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए या अंतरिक्ष से या अंतरिक्ष के लिए लड़ा जाएगा। जबकि सच्चाई ये है तीसरा विश्व युद्ध शुरू हुए 28 साल हो चुके हैं,जो हमारे खेत-खलिहानों से होता हुआ हमारी रसोई में पहुंच चुका है। वर्तमान में देश में 40 करोड़ लोग ऐसे बीमार हैं,जो रोज दवा खाते हैं, अगले 10 साल में ये संख्या दोगुनी होने वाली है।डायबिटीज महामारी बन चुका है, अगली महामारी कैंसर है, इसका कारण है कि मुनाफे की हवस ने हमारे खाने में जहर मिला दिया है,पानी-हवा दूषित किये जा चुके हैं।बीजों में जानवरों का DNA डाला जा रहा। इस तरह लोगों को मारने में पूंजीवाद बदनाम भी नहीं होगा,और मरने से पहले मरने वाला अपना सब कुछ अपने दुश्मन को दे कर जाएगा। इसकी बानगी का अनुमान आप हॉस्पिटल्स की बढ़ती संख्या और हॉस्पिटल्स मे बढ़ती मरीजों की सँख्या से लगा सकते हैं।

Chat conversation end
Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

सीबीआई संकट का अमित शाह कनेक्शनः अफसर एके शर्मा के कारण बढ़ा अस्थाना- वर्मा विवाद?

संतोष सिंह

 

सीबीआई में मचे घमासान की बिसात काफी पहले बिछ चुकी थी। बस, सही समय का इंतजार किया जा रहा था। लेकिन, आलोक वर्मा छह महीने में इतने मजबूत हो जाएंगे ये किसी ने नहीं सोचा था।
ये पूरी स्टोरी वर्मा और अस्थाना के साथ काम करने वाले एक ऐसे सूत्र से सामने आई है जो दोनों की कार्यशैली पर 20 वर्षों से नजर रख रहे हैं ।
शुरुआत केन्द्रीय कैबिनेट सचिव से करते हैं- नाम प्रदीप कुमार सिन्हा। बिहार से हैं और अस्थाना भी नेहरहाट से पढ़े हैं। बिहार कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी के बेटे से अपनी बेटी की शादी की है । आलोक वर्मा और प्रदीप कुमार सिन्हा में पुराना रिश्ता रहा है। प्रदीप कुमार सिन्हा पर मोदी को बहुत भरोसा है। दो बार सेवा विस्तार भी मिल चुंका है। राकेश अस्थाना को निदेशक बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद कहा ये जा रहा कि आलोक वर्मा का नाम प्रदीक कुमार सिन्हा ने सुझाया था। दोनों के बीच वर्षों पुराना रिश्ता रहा है। वैसे भी आलोक वर्मा की कभी कड़क छवि नहीं रही। इनकी पहचान सहज, सुलभ औऱ सत्ता के वफादार के रुप में होती थी। सरकार को भी ऐसे ही अधिकारी की जरुरत थी। सरकार वर्मा को निदेशक तो बना दी, लेकिन भरोसा राकेश अस्थाना पर कहीं ज्यादा था। इस वजह से दोनों के बीच खटास बढती ही चली गई। वर्मा कई बार अस्थाना की शिकायत लेकर पीएमओ गये, लेकिन कभी अस्थाना की शिकायत सुनी नहीं गयी।
इसी बीच गुजरात कैडर के ही सीनियर आईपीएस अधिकारी एकेशर्मा जो अमित शाह के काफी करीबी माने जाते हैं, इस खेल में इनकी एंट्री होती है क्योंकि राकेश अस्थाना का मोदी के सीधे किचेन तक प्रवेश था। इस वजह से अस्थाना कई मौके पर अमित शाह के आदेश को नजरअंदाज कर देते थे। इस वजह से अमित शाह भी अस्थाना के साथ उतना सहज महसूस नहीं करते थे। लेकिन, मोदी के चहेते होने के कारण कुछ कर भी नहीं सकते थे ।
वही एके शर्मा औऱ राजेश अस्थाना के बीच गुजरात से ही 36 का रिश्ता था। कई बार दोनों एक दूसरे को सार्वजनिक रुप से अपमानित कर चुके थे । जैसे ही मौका मिला एकेशर्मा आलोक वर्मा के साथ जुड़ गये और धीरे- धीरे राकेश अस्थाना के खिलाफ गोलबंदी शुरु हो गयी। फिर भी आलोक वर्मा किसी तरह से अपना कार्यकाल पूरा करके निकल जाना चाह रहे थे, लेकिन इसी बीच राकेश अस्थाना ने एक फर्जी बयान के सहारे आलोक वर्मा पर सीधा हमला बोल दिया। आलोक वर्मा इसकी शिकायत पीएमओ तक किए, लेेकिन किसी ने कोई नोटिस तक नहीं लिया ।

Image result for ak sharma cbi

मामला भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ था। ऐसे में आलोक वर्मा को समझ में आ गया कि पलटवार नहीं किये तो फिर रिटायरमेंट के बाद भी मुश्किलें बढ सकती है।.. और फिर शुरु हुआ अॉपरेशन अस्थाना। जिस दौरान अस्थाना और उनके साथ जुड़े सीबीआई के एक दर्जन से अधिक अधिकारी और एक रॉ के अधिकारी जो अस्थाना का बैचमेट हैं उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के पर्याप्त सबूत मिल गये ।
सीबीआई के दफ्तर में रहते हुए भी अस्थाना को इसकी भनक तक नहीं लगी कि उनके खिलाफ इतना बड़ा अॉपरेशन चल रहा है। इतने गुप्त तरीके से ये सब चल रहा था कि जब तक पता चलता तब तक अनुसंधान लगभग पूरी कर ली गयी थी। जैसे ही इसकी भनक लगी, अचानक एक खबर लुटियन जोन में काफी तेजी से फैलायी गयी कि आलोक वर्मा राफेल वाले में जाते-जाते जांच का आदेश कर देंगे। इसी बीच अस्थाना के खिलाफ कारवाई की सूचना पीएमओ पहुंची। खबर फैलाने वाले की बात में दम दिखने लगा। फिर क्या था, अस्थाना ने एक बार फिर साहब के लिए अपनी नौकरी तक दांव पर लगाने की बात कह बड़ा दांव खेल दिया, क्योंकि वर्मा औऱ शर्मा को हटना इतना आसान नहीं था।.. औऱ इन दोनों के हटे बगैर अस्थाना की खैर नहीं थी। फिर क्या था- वर्मा औऱ शर्मा के जितने भी करीबी अधिकारी थे उनको रातोंरात हटा दिया गया। देखिए आगे आगे होता है क्या। लेकिन, वर्मा भी कम पहुंचे हुए खिलाड़ी नहीं हैं। नौकरी का अधिकांश समय दिल्ली में गुजरा है औऱ नेटवर्क बनाने वालों में इनकी गिनती रही है ।
(ये पूरी स्टोरी वर्मा और अस्थाना के साथ काम कर चुके एक सीनियर अधिकारी के हवाले से लिखी गयी है जो मुझे अक्सर हाइप्रोफाईल मामलों की जानकारी देते रहते हैं और इनकी जानकारी काफी सटीक रहती है ।

From the Facebook Wall of Santosh Singh, the Editor of Kashish News Channel

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलाएगा !

ध्रुव गुप्त

शहीद अशफाकुल्लाह खां भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी सेनानी और ‘हसरत’ उपनाम से उर्दू के अज़ीम शायर थे। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक ने अपनी किशोरावस्था में अपने ही शहर के क्रांतिकारी शायर राम प्रसाद बिस्मिल से प्रभावित होकर अपना जीवन वतन की आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया था। वे क्रांतिकारियों के उस जत्थे के सदस्य बने जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त, राजेंद्र लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बख्सी, ठाकुर रोशन सिंह, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुंदी लाल शामिल थे। चौरी चौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने के फ़ैसले से इस जत्थे को बेहद पीड़ा हुई थी। 8 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर में रामप्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में इस क्रांतिकारी जत्थे की एक अहम बैठक हुई जिसमें अपने अभियान हेतु हथियार खरीदने के लिए ट्रेन से सरकारी ख़ज़ाने को लूटने की योजना बनी। उनका मानना था कि यह वह धन अंग्रेजों का नहीं था, अंग्रेजों ने उसे भारतीयों से ही हड़पा था। 9 अगस्त, 1925 को अशफाकउल्ला खान और पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आठ क्रांतिकारियों के दल ने सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन से अंग्रेजों का खजाना लूट लिया। अंग्रेजों को हिला देने वाले काकोरी षड्यंत्र के नाम से प्रसिद्द इस कांड में गिरफ्तारी के बाद जेल में अशफ़ाक़ को यातनाएं देकर उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिशें हुईं। अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे यह तक कहा कि हिन्दुस्तान आज़ाद हो भी गया तो उस पर मुस्लिमों का नहीं, हिन्दुओं का राज होगा और मुस्लिमों को कुछ भी नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफ़ाक़ ने कहा था – ‘तुम लोग हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डालकर आज़ादी की लड़ाई को अब नहीं दबा सकते। अब हिन्दुस्तान आज़ाद होकर रहेगा। अपने दोस्तों के ख़िलाफ़ मैं सरकारी गवाह कभी नहीं बनूंगा।’

अंततः संक्षिप्त ट्रायल के बाद अशफ़ाक, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा और बाकी लोगों को चार साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा सुनाई गई। अशफ़ाक को 19 दिसंबर, 1927 की सुबह फैज़ाबाद जेल में फांसी दी गई। फांसी के पहले अशफाक ने वजू कर कुरआन की कुछ आयतें पढ़ी, कुरआन को आंखों से लगाया और ख़ुद जाकर फांसी के मंच पर खड़े हो गए। वहां मौज़ूद जेल के अधिकारियों से यह कहने के बाद कि ‘मेरे हाथ इन्सानी खून से नहीं रंगे हैं। खुदा के यहां मेरा इन्साफ़ होगा।’, उन्होंने अपने हाथों फांसी का फंदा अपने गले में डाला और झूल गए। यौमे पैदाईश (22 अक्टूबर) पर शहीद अशफ़ाक़ को कृतज्ञ राष्ट्र की श्रद्धांजलि, उनकी लिखी एक नज़्म के साथ !

जाऊंगा ख़ाली हाथ मगर,
यह दर्द साथ ही जाएगा
जाने किस दिन हिंदोस्तान
आज़ाद वतन कहलाएगा

बिस्मिल हिन्दू हैं, कहते हैं
फिर आऊंगा, फिर आऊंगा
फिर आकर ऐ भारत माता
तुझको आज़ाद कराऊंगा

जी करता है मैं भी कह दूं
पर मज़हब से बंध जाता हूं
मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की
बात नहीं कर पाता हूं

हां ख़ुदा अगर मिल गया कहीं
अपनी झोली फैला दूंगा
और जन्नत के बदले उससे
एक पुनर्जन्म ही मांगूंगा !

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

बदजात का मतलब छोटी या नीची जाति वाला नहीं होता

 

ख्वाजा अम्मान मंसूरी

 

लल्लन टॉप ने सर सय्यद के बारे में एक ग़लत फहमी फैलायी कि सर सय्यद ने ऊंच नीच को बढ़ावा दिया और छोटी बिरादरी को तालीम से महरूम रखने की वकालत की. गोया सर सय्यद से पहले हिंदुस्तान में कोई ऊंच नीच नहीं थी और सारी बिरादरियां आला तालीम याफ्ता थीं.

सर सय्यद ने अपनी किताब ग़ालिबन असबाब बग़ावत ए हिन्द में “बद ज़ात जुलाहे” लिखा है. बस इसी को ये लोग ले उड़े और सर सय्यद की बाक़ी खिदमात को यक्सर फरामोश कर दिया.

अब…..

बद ज़ात का मतलब वो नहीं है जो ये उर्दू से ना वाकिफ़ लोग आपको बता रहे हैं. ज़ात का अरबी का लफ्ज़ है जिसका मतलब होता है हस्ती, शख्सियत वजूद . जैसे बोलते हैं अल्लाह की ज़ात. तो यहां अल्लाह की बिरादरी मुराद नहीं होता बल्कि अल्लाह का वजूद मुराद होता. या कहते हैं कि मेरी ज़ात से कोई तकलीफ़ पहुंची. तो यहां भी मेरी ज़ात से मुराद मतलब भी मेरी वजूद होता है. तो बद ज़ात जुलाहे का मतलब बुरे जुलाहे. जैसे हम बद तमीज़, बद नसीब वगैरा बोलते हैं. लेकिन बद ज़ात का ताल्लुक़ किसी की बिरादरी कास्ट खानदान से हरगिज़ नहीं है. जिये किसी के लिए भी बोला जा सकता है. जाति बिरादरी के मानी हिंदी का लफ्ज़ है जिसे लोग बदल कर ज़ात बोलने लगे हैं.

ये यक़ीनन कोई साज़िश है जिसके ज़रिए एहले ईमान में तफरीक़ फैलायी जा रही है जिसका मक़सद बहुत कुछ हो सकता है.

सर सय्यद बाबा ए क़ौम हैं और हमेशा रहेंगे. हमारी तमाम तरक़क़ी की रहें उन्होने ही खोलीं हैं. हम उनके बगैर अपनी ज़ेहनी और अखलाक़ी तरक़क़ी का तसव्वुर नहीं कर सकते. उत्तर भारत में आज जो लोग तालीम हासिल कर रहे हैं ये सब रौशनी सर सय्यद की फैलायी हुई है. किसी ना किसी तौर सब उनके इदारे यानी AMU के उस्तादों के शागिर्दों के शागिर्द हैं.

इस तरह इज़्ज़त के साथ उनका नाम बाक़ी रहेगा उनका काम बाक़ी रहेगा.

#live_long_sir_sayyad

Khwaja Amn Junaid ✍️👌

From a Facebook Post of ख्वाजा अम्मान मंसूरी

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

सूरज मंडल भारतीय जनता पार्टी में

ओबीसी संवाद

Image result for suraj mandal jharkhand

Image result for suraj mandal jharkhand

झारखंड के कद्दावर नेता सूरज मंडल ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली है। अपने झारखंड विकास दल का भाजपा में विलय करवाकर अपने समर्थकों समेत वे भाजपा में शामिल हो गए। झारखंड प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ की उपस्थिति में वह पार्टी में शामिल हुए।
भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया और उन क्षेत्रों में काम करने की इच्छा जताई, जिन क्षेत्रों मंे पार्टी का काम बहुत कम हुआ। प्रदेश अध्यक्ष श्री गिलुआ ने कहा कि उनके आने से पार्टी और भी मजबूत होगी।

 

गौरतलब हो कि सूरज मंडल झारखंड राज्य के गठन के लिए हुए आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे लंबे समय तक शीबू सोरेन के नेतृत्व वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के उपाध्यक्ष थे और आंदोलन के दिनों में पार्टी के मुख्य रणनीतिकार भी वही थे। जब बिहार सरकार ने झारखंड स्वायत्त प्रशासनिक परिषद का गठन किया था, तो उन्हें उस परिषद का उपाध्यक्ष बनाया गया था।
झारखंड के गठन के बाद उनका अध्यक्ष शीबू सोरने से मतभेद हो गया और उनकी राजनैतिक दिशा बदलने लगी। उन्होंने झारखंड विकास दल का गठन किया और और चुनावों में इस दल से उम्मीदवार भी खड़ा करवाए। इस बीच मजदूर आंदोलनों से भी वे जुड़े रहे। लेकिन भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी के हाथ में आने के बाद इस पार्टी के प्रति उनका रवैया बदलने लगा और वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रशंसकों में एक हो गए थे।

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

क्या सर सैयद अहमद जातिवादी और पिछड़ा विरोधी थे? मामला पहुंचा पुलिस के पास

ओबीसी संवाद

मुस्लिम समुदाय के अंदर भी जातिवाद को लेकर अंतर्विरोध सामने आ रहे हैं और इसकी आंच सर सैयद अहमद तक पहुंच चुकी है, जिनका इंतकाल हुए 100 साल से भी ज्यादा हो गया है। गौरतलब है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद को भारतीय मुसलमानों का सबसे बड़ा मसीहा माना जाता है और पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी उनको काफी इज्जत के साथ याद किया जाता है।

पुलिस थाने में कुछ लोगों के खिलाफ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष फैजुल हसन ने एक मुकदमा दायर किया है, जिसमें मुस्लिम समुदाय के ही कुछ लोगों पर सर सैयद अहमद की छवि बिगाड़ने और उनके अपमान करने का आरोप लगाया है। फैजुल हसन 2016-17 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे।


दरअसल आॅल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज से जुड़े लोग सर सैयद अहमद को जातिवादी बता रहे हैं और उन्हें मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी के दुश्मन के रूप में पेश कर रहे हैं। मुस्लिम ओबीसी अपने को अपनी भाषा में पसमांदा कहते हैं और मुस्लिम समुदाय के अंदर अशराफ (सवर्ण) वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। वे सर सैयद अहमद पर शोध कर उन्हे अपने वर्तमान हाल के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं। उन पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने पसमांदा मुसलमानों के प्रति अच्छा रवैया नहीं अपना रखा था।
चूंकि मुसलमानो की बहुसंख्यक आबादी पसमांदा समाज की ही है। इसलिए इस समाज की उपेक्षा करने के कारण वे सर सैयद अहमद को मुस्लिम विरोधी कहने की हद तक चले जाते हैं। यह विवाद सोशल मीडिया पर भी चल रहा है। और सर सैयद अहमद के समर्थक इसका विरोध भी कर रहे हैं। आरोप लगाने वालों की मंशा पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
लेकिन अब यह सोशल मीडिया से उतर कर अखबारों तक पहुंचा और उसके बाद पुलिस थाने तक पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश से प्रकाशित होने वाले एक अखबार के खिलाफ भी मुकदमा किया गया है। उस पर आरोप लगा है कि सर सैयद अहमद पर आरोप लगाने वाल स्टोरी तैयार करने के पहले उसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का पक्ष नहीं लिया।

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

आदिकिसान मंच ही आखिरी उम्मीद?

बृजेश मौर्य पंचम

सामुदायिक जीवन को सबसे ज्यादा नुकसान तकनीकी ने पहुचाया है। कुम्भार का कुल्हड़ खत्म, मिट्टी के खिलौने खत्म, महुआ की पत्तियों से पत्तल बंद, लोहार खिड़की दरवाजे बनाने तक सीमित आगे से वो भी खत्म, बढ़ई गांव छोड़ चट्टी-चौराहों पर चले गए, जंगल खत्म, बढ़ई खत्म, नाई के प्रोफेशन खत्म, पार्लर सैलून के खोखा (गुमटी) तक फिर भी गुंजाइश थी, जल्दी ही महंगे पार्लर्स की फ्रेंचाईजीज़ मार्केट पर कब्जा करेगी। तेली कबके तेल के कारोबार बहुत कम कर दिए, डिब्बाबंद मल्टीनेशनल ब्रांड का बाज़ार में जल्दी ही खत्म हो जाएंगे। बुनकर उजड़ चुके है, मांस उद्योग पर एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों का कब्जा… कहानी बहुत लंबी है

ग्रामीण जीवन की दो बड़ी धुरिया पशुपालन और कृषि ढहने के कगार पर है, जिस दिन ढही उस दिन गांव खत्म और समुदाय भी।

ये सब यूं ही नही हो गया, सरकारी संरक्षण और नीतियों की वजह से ये सब हुआ, विकाश और तकनीकी जरिया बने और आवारा पूँजी की बदचलनी का शिकार सारा समाज बन रहा है।

एक बार बाज़ार पूंजीपतियों के हाथ चला जाय फिर उदारीकरण के नाम पर यही सरकारें उनके लिए अपने पिटारे खोल देगी।

सवाल ये है नौकर नौकरी के मोतियाबिंद से अंधी हो चुकी नई पीढ़ी इस खेल को समझकर प्रतिकार कर सकेगी या इस प्रचारतंत्र में बहते चले जाएंगे।

आदिकिसान आखिरी प्रयास है, अगर ये असफल हुआ तो फिर न तो मौका मिलेगा ना ही दस्तूर बचेगी। फिर गाते रहना अपने वंश कुल गोत्र जाति की वीर गाथाएं और जिम में तैयार डोले-शोले का ऐय्याशी के बाज़ार में नुमाइश लगाना।

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

कुशवाहा मंचों की ओर से रामगुलाम चौक से कारगिल चौक तक कैंडल मार्च

मौर्यवंशी शशिकांत मेहता

बिहार में लगातार बढ़ रहे आपराधिक घटनाएँ जिसमें सबसे ज्यादा कुशवाहा समाज को ऊपर हमले के खिलाफ पटना के सभी कुशवाहा मंचों की ओर से रामगुलाम चौक से कारगिल चौक तक कैंडल मार्च निकाल कर अपनी सरकार के खिलाफ आक्रोश व मारे गए सभी लोगों को श्रद्धांजलि सभा के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की गई !

Image may contain: 6 people, people standing and outdoor

इसमें लगभग सभी राजनीतिक दलों के समाज के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया सिर्फ सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं को इससे दूर रहने की पार्टी हाईकमान से सख्त निर्देश था ! अब सत्ताधारी दल के बारे में निर्णय करने का अधिकार समाज पर छोड़िए कि वह अपनों के द्वारा सहयोग न करने पर भविष्य में क्या फैसला लेती हैं !!

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

एससी/एसटी आरक्षण के फैसले पर चुप क्यों है बीजेपी?

ओबीसी संवाद

एससी/एसटी के प्रमोशन में आरक्षण के मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है, लेकिन सत्तारूढ़ बीजेपी ने उस फैसले पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. उसके पास प्रवक्ताओं की एक बड़ी टीम है और टीम के सदस्य किसी भी मसले पर बोलने में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं. लेकिन प्रमोशन में आरक्षण के मसले पर वे चुप हैं.
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त खबर के अनुसार पार्टी नेतृत्व की ओर से उन्हें इस मसले पर चुप रहने को कहा गया है. जिस दिन यह फैसला आया था, तो उसके एक वरिष्ठ प्रवक्ता ने यह कहते हुए इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने से मना आकर दिया था कि जबतक वे इस फैसले को पूरी तरह देख और समझ नहीं लेते, तबतक उन्हें इस पर कुछ नहीं बोलेंगे.
लेकिन फैसले के पांच दिन हो गए हैं और इस बीच फैसले के सारे बिंदु सामने आ गए हैं और फैसले को खुद भी पढ़ने के लिए पांच दिनों का यह अंतराल पर्याप्त है, फिर भी किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही है. चारों ओर इस मसले पर सन्नाटा है.
प्रमोशन में आरक्षण को एससी/ एसटी समुदाय के लोगों का अधिकार मानने से कोर्ट ने मना कर दिया था, लेकिन इसके साथ यह भी कहा था कि यदि सरकारें चाहें तो, आरक्षण दे सकती हैं. इसके साथ ही नागराज मामले के आदेश को दी गयी चुनौती को बड़े पीठ में भेजने से मना कर दिया था.
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रमोशन में आरक्षण को लेकर भ्रम की स्थिति बानी हुई है. सच कहा जाय, तो क्रीमी लेयर सम्बंधित आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर भ्रम की चादर और भी चढ़ा दी है. अहम् सवाल यह है कि क्या क्रीमी लेयर से सम्बंधित फैसले को बीजेपी सही मानता है या नहीं, लेकिन उसने इस बड़े मसले पर भी चुप्पी साध ली है.
बीजेपी द्वारा चुप्पी साधने का नतीजा यह हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर अपनी अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया का इजहार कर मायावती और रामदास अठावले जैसे नेताओं ने भी चुप्पी साध ली है.

Please follow and like us:
Facebook
Facebook
Instagram
YouTube
YouTube
LinkedIn
Pinterest
Pinterest
Google+
Google+
http://www.voiceofobc.com/category/recent-news">
RSS