Category Archive Opinion & Analysis

ByUpendra Prasad

महाभारत में कर्ण को विद्या न सिखाने का स्पष्टीकरण

 

कार्तिक अय्यर

कई लोग प्रश्न करते हैं कि महाभारत में कर्ण को सूतपुत्र अर्थात् तथाकथित ‘दलित,SC,ST,OBC,’ मानकर द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या नहीं सिखाई।
ऐसे आक्षेप लगाने वालों ने न तो महाभारत ग्रंथ की सूरत देखी होती है;न ही टी.वी सीरियल के महाभारत आदि पौराणिक कार्यक्रम ढंग से देखे होते हैं। क्योंकि टी.वी सीरियल की महाभारत तक में यह स्पष्ट दिखाया गया है,कि द्रोणाचार्य ने कर्ण को सूतपुत्र मानकर केवल ब्रह्मास्त्र विद्या नहीं सिखाई थी। बाकी साधारण धनुर्विद्या का ज्ञान द्रोणाचार्य ने कर्ण का बराबर (यथायोग्य) दिया था। (हाँ,यह सत्य है कि ‘स्टारप्लस’ की २०१४ वाली कथा में सर्वथा ही कर्ण को द्रोण द्वारा विद्या से वंचित करना दिखाया गया है।)

Image result for mahabharat karna

इसके बाद जो कथा प्रचलित है, वह यह है कि कर्ण ने तत्पश्तात् भगवान् परशुराम से ब्रह्मास्त्रविद्या यह कहकर प्राप्त की,कि वह एक ‘ब्राह्मण है।’ बाद में एक कीड़े द्वारा रक्त निकलने और कर्ण के भेद खुलने व बाद में ‘जब सबसे अधिक विद्या की आवश्यकता होगी,तब तुम अपनी विद्या भूल जाओगे।’ इत्यादि बातें महाभारत व उसके ऊपर बने टी.वी कार्यक्रमों में हम देखते हैं। ये शाप-वरदान आदि की कथायें कितनी सत्य है,इस पर विचार करना इस लेख का विषय नहीं है। साथ ही,यह याद रहे कि गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में कर्ण ने भी विद्याभ्यास किया था, ‘ब्रह्मास्त्र’ विद्या को छोड़कर।यही नहीं, एकलव्य का भी अंगूठा लेने के पश्चात् उसे *बिना अंगूठे के बाण चलाने की विद्या सिखाना भी महाभारत में लिखा है,जोकि इसलिये नहीं बताया जाता-ताकि एकलव्य के नाम पर आर्य-संस्कृति पर जातिवाद व शिक्षामें भेदभाव का आरोप लगाया जा सके।

अस्तु। हम यहाँ पर महाभारत से कुछ ऐसे प्रमाण प्रस्तुत करते हैं,जिससे यह प्रमाणित होगा कि कर्ण जैसे तथाकथित सूतपुत्र तक महाभारत काल में वेदादिशास्त्रों को पढ़ते थे।

(१)- कर्ण का वेदमंत्रों का पाठ करना-

हम गीताप्रेस से छपी ‘संक्षिप्त महाभारत’ भाग-१ से उद्धृत करते हैं-

‘ऐसा सोचकर कुंती गंगातट पर कर्ण के पास गयी।वहाँ पहुँचकर कुंती ने अपने सत्यनिष्ठ पुत्र के वेदपाठकी ध्वनि सुनी।वह पूर्वाभिमुख होकर भुजाएँ ऊपर उठाये मंत्र पाठ कर रहा था।तपस्विनी कुंती जप समाप्त होने की प्रतीक्षा में उसके पीछे खड़ी रही।’

( संक्षिप्त महाभारत, उद्योगपर्व,पृष्ठ ६५३, अनुच्छेद २, बाँयी ओर से- गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित भाग-१)

Image result for mahabharat karna

लीजिये, यहाँ पर स्पष्ट है कि कर्ण उस समय वेदमंत्रों का पाठ कर रहा था।अब पाठकों! ज़रा सोचिये, यह कार्य कर्ण रोज ही करता होगा या नहीं? क्या ये वेदविद्या वो गर्भ से लेकर पैदा हुआ था? कदापि नहीं।यह विद्या उसने गुरुकुल में प्राप्त की थी। और प्रमाणों का अवलोकन करें-

(२)- कर्णका सनातनशास्त्रों का ज्ञान होना-

राज्य का प्रलोभन देते समय योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा था-

(क)-
‘कर्ण! तुमने वेदवेत्ता ब्राह्मणों की बड़ी सेवा की है और उनसे परमार्थतत्त्व संबंधी प्रश्न किये हैं।’

( संक्षिप्त महाभारत, उद्योगपर्व पृष्ठ ६५०व ६५१)

साथ ही,

(ख)-
‘त्वमेव कर्ण जानासि वेदवादान् सनातनान्।
त्वमेव धर्मशास्त्रेषु सूक्ष्मेषु परिनिष्ठितः।।’
( महाभारत उद्योगपर्व १३८ श्लोक ७)

‘हे कर्ण!तुम सनातन वैदिक मन्तव्यों से परिचित हो और सूक्ष्म धर्मशास्त्रों में तुम्हारी पैठ है।’

(ग)- कर्ण की अपने मुख से साक्षी-

धर्माविद्धर्मशास्त्राणां श्रवणे सततं रतः।।
( महाभारत उद्योगपर्व १३९ श्लोक ७)

‘हे कृष्ण! मेरे जैसा व्यक्ति जो सदा धर्मशास्त्रों का अध्ययन करता है और धर्म जानता है…।’

( ‘श्रुति-सौरभ’, पं.शिवकुमार शास्त्री, पृष्ठ २८ व ३० से उद्धृत)

वक्तव्य-

यहाँ इन तीनों प्रमाणों से स्पष्ट है कि अंगराज कर्ण ने अपने समय में वेदज्ञ ब्राह्मणों की सेवा भी की,उनसे प्रश्नोत्तर भी किये। साथ ही,उसके पास वैदिक शास्त्रों का ज्ञान भी था। कर्ण ने अपने मुख तक से कहा कि वो धर्मशास्त्रों का स्वाध्याय व पालन भी करता है। ऊपर हम कर्ण के वेदमंत्रों के पाठ का प्रमाण तो देख ही आये हैं।

निष्कर्ष- इस पूरे लेख से ये स्पष्ट है कि कर्ण के साथ उसके सूतपुत्र होने पर खासा भेदभाव न किया गया।दरअसल द्रोणाचार्य राजनैतिक संधि के तहत उसे ब्रह्मास्त्र नहीं दे सके,पर सामान्य धनुर्विद्या उसे सिखाई गई। भगवान् परशुराम से उसने छलपूर्वक विद्या पाई। हम कर्ण द्वारा वेदपाठ करने,धर्मशास्त्रों का नित्य स्वाध्याय करना आदि भी स्थापित कर चुके हैं।इससे साफ सिद्ध होती है कि कर्ण जैसे तथाकथित सूतपुत्र माने जाने वाले व्यक्ति तक को महाभारत काल में वेदादिशास्त्रों व युद्धविद्या का अधिकार दिया जाता था।
एकलव्य के विषय में जो हमने चर्चा की है,इसे हम फिर किसी लेख में रखेंगे। फिलहाल इस लेख का उद्देश्य पूर्ण हुआ।

।।ओ३म् शम्।।

।।सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय।।
।। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की जय।।
।।योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण चंद्र की जय।।
।। ब्रह्मा ले लेकर महर्षि दयानंद तक की आर्ष-परंपरा की जय ।।
।। संसार के सभी महापुरुषों व वैदिक विद्वानों की जय।।

।।लौटो वेदों की ओर।।

संदर्भ ग्रंथों की सूची-

१- संक्षिप्त महाभारत- गीताप्रेस, गोरखपुर
२- श्रुति सौरभ- पं शिवकुमार शास्त्री- विजय कुमार गोविंदराम हासानंद

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

बैलट पेपर के युग में जाने की मांग करने वाले लोकतंत्र के दुश्मन हैं

उपेन्द्र प्रसाद

ईवीएम पर एक बार फिर सवाल उठाए जा रहे हैं। कोलकाता में ममता बनर्जी द्वारा आयोजित रैली में विपक्ष के अनेक नेताओं ने ईवीएम के खिलाफ आग उगली और देश को एक बार फिर बैलट पेपर के युग में ले जाने की मांग की। उस रैली के चंद दिनों बाद ही लंडन में एक प्रेस कान्फ्रेंस में किसी सैयद शुजा ने दावा कर दिया कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है और उन्हें हैक कर न केवल 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे बदले गए, बल्कि दिल्ली विधानसभा के 2015 में हुए चुनाव के नतीजे भी बदले गए। उसने दावा किया कि 2014 में उसने 12 लोगों की टीम के साथ यह काम खुद किया था। उसकी टीम के 11 लोग मार डाले गए और वह अपनी जान बचाकर खुद अमेरिका में रह रहा है।

Image result for evm

शुजा प्रेस कान्फ्रेंस में खुद मौजूद नहीं था, बल्कि उसने विडियो काॅन्फ्रेंसिंग करके अपनी उपस्थिति वहां दर्ज की थी। उसने अपना चेहरा भी ढका हुआ था। उसने बाद में दावा किया कि उसके मां-बाप की हत्या भी उसके घर मंे आग लगाकर कर दी गई थी। उसने भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की मौत को भी ईवीएम की हैंकिंग से जुड़ी हत्या बता दी। उसने हैकिंग में अनिल अंबानी के रिलायंस कम्युनिकेशंस को भी शामिल होना बता दिया।

शुजा ने एक से बढ़कर एक दावे किए हैं। हैकिंग के अलावा जो अन्य दावे हैं, उसकी सच्चाई के बारे में आसानी से पता लगाया जा सकता है। यदि उसके घर में आग लगाकर उसके मां-बाप को मारा गया, तो आस पड़ोस के लोगों को भी पता होगा। यदि उसकी टीम के 11 सदस्यों को एक गेस्ट हाउस में मार दिया गया, तो उसके बारे में भी हैदराबाद के किसी पुलिस स्टेशन में भी मामला दर्ज होगा। यदि शुजा उन 11 लोगों के नाम व पते की जानकारी दे दे, तो उनके परिवार के लोगों से मिलकर भी यह पता लगाया जा सकता है कि वास्तव में उनकी मोत हुई भी थी या नहीं।

फिलहाल भारत के निर्वाचन आयोग ने भारत की पुलिस की पहुंच से बाहर अज्ञात शुजा पर एफआईआर दर्ज कराया है और यह दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी है कि इन सारे मामलों की जांच करे, हालांकि उसके लिए यह काम बेहद कठिन होगा, क्योकि आरोप लगाने वाला भारत में है ही नहीं और इस समय उसके चेहरे पर भी नकाब चढ़ा हुआ है। वह अपने आपको हैदराबाद का मूल बाशिंदा बता रहा है। हैदराबाद तेलंगाना में है और वहां टीआरएस की सरकार है। उम्मीद है कि हैदराबाद और दिल्ली की पुलिस मिलकर इस मामले की तह में जाएंगे और पता लगाएंगे कि उन दावों में कितनी सच्चाई है।

Image result for ballot paper

दावों की जांच अपनी जगह है, लेकिन इन दावों ने एक बार फिर कुछ राजनैतिक पार्टियों को पुराने बैलट पेपर के युग में जाने की मांग करने का मौका दे दिया है। उन्हें ईवीएम पर हमला करने का एक और मौका मिल गया है। इसके साथ इस पर बहस और तेज हो गई है कि ईवीएम से मतदान ठीक रहेगा या फिर मतदान पत्र के युग में हमें पीछे चला जाना चाहिए।

सबसे आश्चर्य की बात है कि ईवीएम बनाम मतपत्र की चर्चा से वीवीपीएट को गायब कर दिया जाता है। यह सच है कि ईवीएम से मतदान में पारदर्शिता नहीं थी और मत देने वाला बटन दबाने के बाद यह तय नहीं कर पाता था कि उसने जिसे वोट दिया है, उसे पड़ा भी है या नहीं। ऐसे अनेक मामले आए, जब बटन क के पक्ष में दबाया जाता था, तो वोट ख के पक्ष में पड़ जाता था। इसकी आशंका बलवती थी कि मशीन से छेड़छाड़ करके ऐसा करना संभव है कि सारे बटन दबाने पर वोट किसी एक को ही पड़े।

लेकिन इन आशंकाओं को दूर करने के लिए वीवीपएटी मशीन भी ईवीएम के साथ अब जोड़ दी जाती है। ईवीएम का बटन दबाने पर वीवीपीएटी मशीन से एक पर्ची निकलती है, जिस पर वह चुनाव चिन्ह दिखाई पड़ता है, जिस पर बटन दबाया गया था। 30 सेकंड तक वह पर्ची मतदाता की नजरों के सामने रहती है और फिर मशीन से जुड़े एक डब्बे में गिर जाती है। मतदाता यह सुनिश्चित कर सकता है कि जिस चुनाव चिन्ह पर उसने बटन दबाया था, उसी चुनाव चिन्ह वाली पर्ची निकली या नहीं। यदि किसी दूसरे चुनाव चिन्ह की पर्ची निकलती है, तो उसकी शिकायत कर मतदान को रूकवाया भी जा सकता है।

और यदि यह मान भी लें कि पर्ची तो सही निकलती है, लेकिन ईवीएम में वोट किसी और को पड़ जाता है, तो इस आशंका का निस्तारण पर्चियों की गिनती करके किया जा सकता है। सच कहा जाय, तो इस व्यवस्था मे मतदाता के वोट दो जगह दर्ज होते हैं। वोट मशीन में दर्ज होता है और पर्ची पर भी अंकित हो जाता है और वह पर्ची एक डब्बे में बंद हो जाती है। मतगणना के लिए मशीन और पर्ची दोनों उपलब्ध होते हैं। पिछले मध्यप्रदेश चुनाव में देखा गया कि कुछ ईवीएम गिनती के समय खराब पाए गए। वे नतीजे ही नहीं दे रहे थे, तो फिर उस मतदान केन्द्र की डब्बे में बंद पर्ची की गिनती की गई और उसके आधार पर नतीजे घोषित किए गए।

ईवीएम मशीन से वोटों की गिनती तेजी से होती है, इसलिए निर्वाचन आयोग की यह पहली पसंद है, लेकिन किसी आशंका को निरस्त करने के लिए वीवीपएटी मशीनों से निकली पर्ची की गिनती भी की जा सकती है। इस समय निर्वाचन आयोग मशीन द्वारा हुई गिनती के बाद लाॅटरी के तरीके से किसी बूथ की पर्चियों की गिनती करती है। उस बूथ पर पड़े मतों की तुलना मशीन से गिने गए मतों से करके यह सुनिश्चित कर दिया जाता है कि सबकुछ ठीक है।

जाहिर है कि वीवीपीएटी से ईवीएम मशीनों के जुड़ जाने के बाद ईवीएम छेड़कर नतीजों को प्रभावित करने की संभावना लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई है। इसलिए वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना अनुचित है। हां, ज्यादा बूथों की पर्चियों की गिनती करने की मांग की जा सकती है और इस मांग को निर्वाचन आयोग मान ले, तो बेहतर होगा।

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

क्यों द्विज बनाए रखना चाहते हैं अम्बेडकर को मसीहा

मदनलाल आजाद

अम्बेडकर के कारण ही आज द्विज सत्ता में हैं। यदि अम्बेडकर के स्थान पर बाबू जगजीवनराम या सरदार बूटासिंह प्रथम कानून मंत्री या संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चीफ होते तो वह अम्बेडकर की तरह कांग्रेस के हाथों बिकते नहीं अपितु संत शिरोमणि रविदास महाराज के बेगमपुरा के स्वप्न को साकार करते।।

 

Image result for jagjivan ram

बाबूजी और बूटासिंह जब भी जहां भी रहे वहां सर्वोत्तम और साहसिक कार्य किया दलित हितों की संरक्षा के लिए और अम्बेडकर को कांग्रेस ने जहां भी बैठाया वहां अम्बेडकर ने वही किया जो कांग्रेस ने चाहा।। अम्बेडकर ने दलित हितों को लेकर कभी द्विजों से बगावत नहीं की और सरदार बूटासिंह एवं बाबू जगजीवन राम ने कभी समझौता नहीं किया दलित हितों से।। बाबू जी भी और सरदार जी भी दोनों बागी हो गए दलित विषयों की अनदेखी पर सत्ता से किन्तु अम्बेडकर कभी यह साहस नहीं जुटा पाए।।
अम्बेडकर संविधान में दलित अत्यचार निवारण पर एक आर्टिकल तक नहीं लिख सके।। आरक्षण का प्रावधान भी संविधान में इसलिए जोड़ा गया क्योंकि यह पूना पैक्ट की एक शर्त थी और गांधी जिंदा थे अन्यथा अम्बेडकर के भरोसे समाज रहता तो यह टूटा फूटा आरक्षण भी न होता।। अम्बेडकर के चेले चेली आदिवासी ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज को भी अपने साथ जोड़कर स्वयं को बहुजन समाज कहते हैं जबकि सत्य यह है कि अम्बेडकर आदिवासियों को आरक्षण तो क्या वोट का अधिकार ही नहीं देना चाहते थे, अम्बेडकर के मतानुसार ट्राइबल्स और जरायमपेशा घोषित जातियों को वोट का अधिकार देने से लोकतंत्र गड़बड़ा जाता।। मुसलमानों की सम्पूर्ण अदला बदली पाकिस्तान के साथ कर लेने का सुझाव अम्बेडकर ने ही नेहरू को दिया था और संविधान में गैर हिन्दू दलितों को आरक्षण न देने का प्रावधान भी अम्बेडकर ने ही किया था धारा 341-342 में।।

Image result for buta singh

वर्तमान संविधान यदि किसी द्विज ने लिखा होता तो इसका सर्वाधिक विरोध आज दलित कर रहे होते।। प्रथक निर्वाचन अधिकार निरस्त करने की साजिश यदि किसी द्विज ने रची होती तो पूना पैक्ट को कबका जला दिया होता दलितों ने ही।
कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से वह सब काम अम्बेडकर से करा लिए दलितों के खिलाफ जो कोई द्विज भी न कर पाता।।
आज आरक्षण के नाम पर दलितों के हाथ में कुछ भी नहीं है। अम्बेडकर इस आरक्षण को भी मात्र 10 साल तक रखने का ही प्रावधान कर गया थे, यह तो बाबू जगजीवनराम और सरदार बूटासिंह का ही साहस था जो उन्होंने 1960 में आरक्षण को समाप्त नहीं होने दिया।।बाबू जगजीवन और सरदार बूटासिंह वाल्मीकि के निष्क्रिय होते ही आज यह स्थिति है कि दलितों के लिए 90 फीसदी अवसर कम कर दिए गए हैं।। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 2018 में केंद्रीय नौंकरियों में केवल 6 हजार दलित भर्ती हुए हैं।। 6 हजार नौंकरियों के लिए 6 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का चंदा तो दलित परिसंघ डकार जाते हैं दलितों से वसूलकर।। सरकार से हजारों करोड़ का डोनेशन लेकर निगल जाते हैं वह अलग है।।

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

दलितों से विवेकपूर्ण दूरी बनाना क्यों है जरूरी

शिशिर यादव

दलित चिंतक कंवल भारती ने अपने एक लेख में गोपियों को दलित सम्बोधित किया, मैंने उनसे पूछा ये गोपियाँ किस जाति की थी, उन्होंने उत्तर दिया “अहीर” | तो मैंने प्रश्न किया फिर इन गोपियों को अहीर क्यूँ नहीं लिखा तो स्पष्ट जवाब न देकर ब्लाक कर भाग गये | अहीर गोपियों को अहीर क्यों नहीं लिखा गया? सीधा जवाब है लेखक दलित है और वह अहीरों की सामाजिक स्थिति व् छवि को कैसे सम्मान दे सकता है? अहीर को दलित लिखने के पीछे अहीरों की सामाजिक स्थिति व् छवि को मिट्टी में मिलाने की नीच सोच के चलते ही इस दलित लेखक ने गोपियों को दलित लिखा |

एक दलित चिंतक ने एक पोस्ट में अहीरों को शुद्र बताया | मैंने महाभारत जैसे महाकाव्य का हवाला दिया तो दलित चिंतक ने कहा ये ब्राह्मणों की गप्प है | नीचता देखिये मनुस्मृति और रामायण में अहीरों के लिए लिखा शुद्र इतिहास है और महाभारत में अहीरों के लिए लिखा गया ब्राह्मणों की गप्प है | दोगलेपन और नीचता में माहिर दलितों की इस दलील से उनकी सोंच को समझना जरूरी है |

एक दलित ने कहा कि उत्तर भारत के राजस्थान के अहीर, जाट, गुज्जरों में देवदासी प्रथा थी | मैंने पता किया तो पता चला कि ऐतिहासिक मंदिर ही राजस्थान में नहीं हैं तो देवदासी प्रथा ही सम्भव नहीं है |

अहीर, जाट, गुर्जरों से दलित किस हद तक इर्ष्या, जलन, नफरत रखते हैं इस बात से समझा जा सकता है |

बीत चुकी इसी जन्माष्टमी के अवसर पर अनेक अहीर कुल के लोग अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे थे | एक दलित ने पोस्ट लिखी और उसमे कृष्ण को ब्राह्मणों की कल्पना और षड्यंत्र बताया | और यह भी लिखा कि ऐसा ब्राह्मणों ने अहीरों को मानसिक गुलाम बनाने के लिए किया | मैंने पूछा कि जब दलित अहीरों को शूद्र कहेंगे तब तुम कहोगे कि यह सब ब्राह्मणों का षड्यंत्र है | तब उसने निर्लज्जता से जवाब दिया कि शुद्र तो ब्राह्मणों ने लिखा है | मतलब  जब  अहीर कृष्ण को अपना वंशज बतायेंगे तब दलित कहेंगे कि यह ब्राह्मणों का षड्यंत्र है लेकिन दलित अहीरों को शूद्र कहेंगे और दलितों के हिसाब से यह कोई ब्राह्मणों का षड्यंत्र नहीं है और न ही मानसिक गुलाम बनाने की चाल है |

एक बार एक दलित ने चल रही चर्चा में कहा मराठा कौन थे? मैंने कहा महाराष्ट्र की एक मजबूत जमात | तो उसने कहा कि ब्राह्मणों ने पैर के अंगूठे से राजतिलक किया था | किसान पृष्ठभूमि के मराठों ने संघर्ष, प्रतिकूलताओं के पश्चात राज्य स्थापित किया था और वे इस स्थिति में आ गये थे कि मुगलों के उत्तराधिकारी भी बन सकते थे | इस साहस भरी यात्रा में अनेक सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक पहलू हैं लेकिन नीच मानसिकता से ग्रसित दलितों को ब्राह्मणों द्वारा पैर के अंगूठे से राज्याभिषेक करना ही इतिहास लगता है | बहुत सम्भव है कि पैर के अंगूठे से राज्याभिषेक की कहानी ब्राह्मणों का अपने सामाजिक वर्चस्व को ऊँचा दिखाने के क्रम में षड्यंत्र हो | कुछ भी हो परन्तु दलितों की नीयत और मकसद समझना बहुत जरुरी है |

अनेक वाकये आये दिन देखने को मिलते हैं | इतने वाकये यह बताने के लिए काफी हैं कि दलितों का मकसद नीच और नीयत निकृष्ट है | अतीत को अपनी दृष्टि से देखना और उसे इतिहास का दर्जा दिलाना जरूरी है | यह पुरुखों का हम पर कर्ज है | पुरुखों के संघर्ष, हौसला, जीवटता हमे स्वभिमानी बनने की प्रेरणा देंगे | समाज सभिमानी बनेगा, मनोबल कायम रहेगा और इस आधार पर नया इतिहास निर्मित करने का पथ प्रशस्त होगा | राजनीति के लिए समाज के हितों, स्वाभिमान, सम्मान से समझौता नहीं करना चाहिए | राजनीति अपनी जगह होनी चाहिए और समाज हित अपनी जगह | राजनीती के लिए समाज हित से समझौता करने वाले कलंक हैं समाज के |

Quick Reply
Quick Reply
Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

अनारक्षितों को 10 फीसदी आरक्षण: बहुजन राजनीति का अंत?

 

उपेन्द्र प्रसाद

मोदी सरकार द्वारा अनारक्षित समुदायों की कम आय वाले लोगांे को आरक्षण देकर सामाजिक बदलाव को एक नई दिशा दे दी है। जाति आधारित भारतीय समाज पर इसका जबर्दस्त असर पड़ेगा और यह बदलाव सकारात्मक ही होगा। 1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों के लागू किए जाने के बाद भी समाज पर जबर्दस्त असर पड़ा था और उस असर को आजतक महसूस किया जा सकता है।

वीपी सिंह ने किन परिस्थितियों मंे मंडल आयोग की सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने वाली सिफारिश के अमल की घोषणा की थी, यह अब ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसने पूरे समाज को आलोड़ित कर दिया था। उसका सबसे बड़ा असर यह पड़ा कि पहले से आरक्षण पा रहे अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग और मंडल आयोग के तहत आने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग एक मंच पर आ गए थे।

Image result for 10 percent quota

चूंकि आरक्षण का खूब विरोध हो रहा था और यह विरोध काफी हिंसक और कहीं कहीं आत्मघाती भी था, इसलिए आरक्षण पाने वाले समुदायों के बीच परस्पर अपनापन का बोध हुआ। और इसी बोध से एक नई राजनीति निकली, जिसे बहुजन राजनीति कहा जाता है। इस राजनीति में बहुत संभावनाएं थीं, लेकिन इसका नेतृत्व जातिवादी नेताओं के हाथ में था। उनके जातिवाद का पहला असर तो यह हुआ कि खुद विश्वनाथ प्रताप सिंह उस बहुजनवादी स्कीम से बाहर हो गए, क्योंकि वे आरक्षित तबके से नहीं थे। जातिवादी ओबीसी और दलित नेताओं ने न तो उनका नेतृत्व स्वीकार किया और न ही वह सम्मान दिया, जो उन्हें एक नई राजनीति शुरू करने के लिए मिलना चाहिए था।

पहली गद्दारी मुलायम सिंह यादव ने की। मुलायम की सरकार बिना भाजपा या कांग्रेस के समर्थन के उत्तर प्रदेश में बनी रह सकती थी, लेकिन वीपी सिंह के जनता दल से अलग होकर न केवल मुलायम ने वीपी सिंह को कमजोर किया, बल्कि खुद कांग्रेस के समर्थन पर वह आश्रित हो गए। वीपी सिंह से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले मुलायम की अपनी राजनीति समाप्त होती दिखाई दी, तो उन्होंने 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांशीराम और मायावती की बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन कर लिया।

Image result for 10 percent quota

मुलायम यादव की इस नाजायज राजनीति से कांशीराम और मायावती जैसे नेता पैदा हुए। ये दोनों पहले से ही बहुजन समाज पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन इन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। उत्तर प्रदेश के 1989 और 1991 के विधानसभा चुनावों में बसपा को 11 -12 सीटें मिली थीं। एक बार मायावती सांसद भी बनी थीं, लेकिन 1991 में अपना चुनाव हार गई थीं।

कांशीराम ने 1980 के दशक में ही यह महसूस कर लिया था कि यदि दलित और ओबीसी का मोर्चा बन जाय, तो यह मोर्चा सत्ता में आ सकता है। लेकिन उस समय समस्या यह थी कि देश के स्तर पर दलितों को तो आरक्षण मिला हुआ था, लेकिन ओबीसी के आरक्षण के लिए बने मंडल आयोग की फाइल केन्द्र सरकार ने दबा रखी थी। उसके लिए कर्पूरी ठाकुर, चैधरी ब्रह्म प्रकाश, चन्द्रजीत यादव, महेन्द्र कुमार सैनी, रामअवधेश सिंह और मधु लिमये जैसे नेता लगातार आंदोलन कर रहे थे। अपनी सीमित शक्ति के साथ कांशीराम भी जब तब मंडल आयोग लागू करो कि नारेबाजी करवा देते थे।

कांशीराम की बहुजन राजनीति के लिए ओबीसी को आरक्षण मिलना जरूरी था। जनता दल का चुनावी घोषणा पत्र मधुलिमये जैसे विद्वान नेता लिखा करते थे और उन्होंने 1989 चुनाव के पहले जनता दल के घोषणा पत्र में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का वायदा डाल रखा था। उस वायदे का दबाव वीपी सिंह सरकार पर था। वीपी सरकार द्वारा बुलाए गए संसद के पहले ही संयुक्त सत्र में जिसे राष्ट्रपति संबोधित करते हैं, लोकदल केे राज्यसभा सांसद रामअवधेश सिंह और बसपा की लोकसभा सांसद मायावती में हंगामा खड़ा कर दिया। उन दोनों ने मंडल आयोग लागू करो के नारे लगाए और जनता दल के कर्पूरी ठाकुर और मुलायम के समर्थकों ने भी उनका साथ दिया।

Image result for 10 percent quota

बहरहाल, मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की घोषणा हुई और इसके साथ ही दलित और ओबीसी का एक साझा मंच बहुजन नाम से तैयार हो गया। राजनीति पर इसका असर पड़ना लाजिमी था, लेकिन बिकाऊ नेतृत्व के कारण इससे कथित बहुजनों का नुकसान ही हो गया। बहुजन आंदोलन के नेता नैतिक रूप से कमजोर थे। वे लोभी थे और उनमें प्रतिबद्घता भी नहीं थी। बहुजन का नारा लगाकर सत्ता में आना और सत्ता की लूटपाट करना ही उनका उद्देश्य था। सत्ता की लूट में वे एक दूसरे से लड़ते और झगड़ते भी रहे और इस तरह कभी मिलते और कभी टूटते भी रहे।

मुलायम के वीपी द्वेष से पैदा हुए कांशीराम और मायावती ने सबसे पहले बहुजन आंदोलन से गद्दारी की। वे मुलायम के समर्थन से अपनी पार्टी के 67 विधायक जिताने में सफल हुए थे और उनके बूते उन्होंने भाजपा से समर्थन लेकर मुलायम का साथ ही छोड़ दिया। इस तरह उनकी बहुजन राजनीति उनके लालच का शिकार हो गई और उसके बाद समाज में जो कुछ होता रहा, वह तो बहुत ही शोचनीय है। विदेशी शक्तियां भारतीय जातिव्यवस्था में पैदा हो रहे विक्षोभ का लाभ उठाने लगी। बिकाऊ बहुजन बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तैयार हो गया और सत्ता के लिए हुई कथित बहुजन एकता को साम्प्रदायिकता की ओर मोड़ दिया गया। सांपद्रायिकता का वह स्वर हिन्दू धर्म और पहचान का विरोधी था। समाज में एक नई बीमारी पैदा हो गई और इस बीमारी की प्रतिक्रिया ने हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा को सत्ता में लाने का काम कर दिया।

अब सवर्णों को भी आरक्षण मिल गया है। इसके कारण देश की 100 फीसदी जातियां आरक्षण के दायरे में आ गई हैं। दलित और ओबीसी जातियों के आरक्षण के दायरे में आने से वे एक मच पर आ गई थीं और अनारक्षित तबका उनके विरोधी के रूप में उनके अस्तित्व को पहचान दे रहा था। अब जब सारी जातियां आरक्षण के दायरे में आ गई हैं, तो फिर आरक्षण पाने वाली ओबीसी और दलित जातियों के लिए एक काॅमन पहचान की जरूरत ही नहीं रही, क्योंकि यह पहचान आरक्षण विरोधी जातियों के कारण ही थीं। लिहाजा अब बहुजन विमर्श का अंत हो रहा है।

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

आरक्षण का चुनावी दांव दुधारी तलवार

 

 

शिवानी झा

चुनावी भंवर में फंसी केंद्र की मोदी सरकार को ठीक चार साल नौ महीने बाद यानी चुनाव के तीन महीने पहले याद आया कि देश के सवर्ण गरीब हैं और उन्हें भी आरक्षण की जरूरत है। खैर, हाल के दौर में हर चुनाव महाभारत के युद्ध की तरह लड़ा जा रहा है और ‘अश्वत्थामा हतो…’ के नैतिक पतन की हद तक। लिहाज़ा इसे भी उसी भाव से देखना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने एमआर बालाजी बनाम स्टेट ऑफ मैसूर मामले में 28 सितम्बर 1962 में फैसला दिया था कि किसी भी स्थिति में रिजर्वेशन 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इस फैसले का आधार कोर्ट ने ‘मेरिट’ को कुंठित न होने देना बताया था। तब से आज तक लगभग हर फैसले में यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने इंद्रा साहनी केस में भी इसे बहाल रखा। अनुच्छेद 15 और 16 सरकार को शक्ति प्रदान करता है कि वह सामाजिक और शैक्षिक (न कि आर्थिक) रूप से पिछड़े ‘वर्ग’ (न कि जाति) को आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करे। लिहाज़ा सुप्रीम कोर्ट के सामने जब यह मामला फिर जाएगा तो वह संविधान के इस तराजू पर इसे तौलेगा। हालांकि, कई बार अदालत के फैसलों में भी ‘मलाईदार परत’ (क्रीमी लेयर) की बात कहकर यह भाव व्यक्त किया गया है कि गरीब हर वर्ग से हो सकता है।
सरकार ने दस आधार बनाकर गरीब सवर्णों को चिह्नित करने का भी आज के फैसले में एलान किया है। इन आधारों के तराजू पर सवर्ण गरीबों की पहचान की जाएगी उनमें एक बड़ा वर्ग सवर्ण किसानों का होगा, क्योंकि आज भारत में 87 प्रतिशत किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है और इन किसानों में अधिकांश सवर्ण किसान हैं। चूंकि तीन राज्यों के चुनाव नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि देश का किसान मोदी सरकार से नाराज है लिहाजा सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में उन्हें आरक्षण देकर नाराजगी दूर करने की कोशिश की गई है लेकिन, मोदी सरकार शायद यह भूल गई कि जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में शिकायत पर गैर-दलितों की तत्काल गिरफ्तारी के खिलाफ फैसला दिया था तो दलित संगठनों ने सफल भारत बंद किया और सोशल मीडिया पर सन्देश यह दिया कि ‘सवर्णों की मोदी सरकार’ आरक्षण खत्म करने जा रही है। दस दिन बाद केंद्र सरकार की नींद खुली और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि इस फैसले के खिलाफ अपील करेंगे और कानून भी लाएंगे। कानून बना भी लेकिन, तब तक नुकसान हो चुका था।
अब मुलायम सिंह यादव-लालू यादव और अन्य जाति-आधारित क्षेत्रीय दल यही मुद्‌दा उठाएंगे और एक बार फिर पिछड़ी जातियों और दलितों का इस मुद्‌दे पर एक साथ आना संभव हो सकता है। भाजपा शायद यह भी भूल गई कि देश में मात्र 20 प्रतिशत सवर्ण मत से चुनाव वैतरणी पार करना बेहद मुश्किल होगा और मत-प्रतिशत को सीटों पर जीत में बदलने के लिए आज भी भारत में या तो दलित या कुछ बैकवर्ड या मुसलमान वोटों की जरूरत रहती है। 2014 में नरेन्द्र मोदी के नाम पर पिछड़े मत ही ज्यादा मिले थे, जिससे भाजपा का 1998 से लगातार गिरता वोट प्रतिशत जो 2009 के 18.6 प्रतिशत पहुंच गया था, के मुकाबले 31.3 प्रतिशत पहुंच गया। लिहाज़ा यह फैसला प्रारंभिक तौर पर देखने में भले ही ‘मास्टर स्ट्रोक’ लग रहा हो, यह दुधारी तलवार है और तलवार चलाने वाले को भी आहत कर सकती है।
अब देखना होगा कि जब यह संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश होता है तो बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी हीं नहीं एनडीए के अपने घटक दल जैसे- नीतीश कुमार का जनता दल (यू) और शिवसेना कैसे अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, क्योंकि ये सभी दल पिछड़ी जातियों के वोट पर ज़िंदा हैं।
भारत में आरक्षण सबसे पहले 1902 में कोल्हापुर के महाराजा ने शुरू किया था, जिसे 1921 को मई माह में मैसूर के महाराजा ने आगे बढ़ाया। तब यह प्रयास किसी भी राजनीतिक उद्‌देश्य के लिए न होकर दबे-कुचले तबकों को समाज की मुख्यधारा में लेन के लिए किया गया। मद्रास प्रेसीडेंसी (आंध्र, तमिलनाडु, उत्तर केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्से) में ब्राह्मण एकाधिकार के खिलाफ सत्ता में आई जस्टिस पार्टी ने इस उसी साल सितम्बर में शुरू किया जिसे बॉम्बे प्रेसीडेंसी ने दस साल बाद लागू किया। जब अंग्रेज द्वितीय विश्व युद्ध में फंसे थे तो बाबा साहेब आंबेडकर को अपनी तरफ करके गांधी के प्रभाव को कम करने के लिए पहली बार देश में दलितों के लिए आरक्षण देना शुरू किया। पूरी दुनिया में खासकर पश्चिमी मुल्कों में यह विवाद आज भी है कि क्या ‘सामाजिक बराबरी के लिए प्रतिभा को कुंठित या बाधित किया जा सकता है’। ‘मेरिटेरियन बनाम कम्पेंसेटरी’ का विवाद भारत के सुप्रीम कोर्ट में भी आता रहा लेकिन, दक्षिण भारत के तमाम राज्य जो पूरे देश में अनुकरणीय शासन और विकास कर रहे हैं इस बात की तसदीक है कि ‘परीक्षा में प्रतिभा’ का प्रशासन से कोई सीधा रिश्ता नहीं होता। लिहाज़ा सुप्रीम कोर्ट में जब यह मामला जाएगा तो उसे कई पहलू देखने होंगे।

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

क्या सुप्रीम कोर्ट में टिक पाएगा आर्थिक आधार पर मिला आरक्षण

उपेन्द्र प्रसाद

मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर अनारक्षित तबकों को दिए जा रहे आरक्षण को लेकर एक सवाल यह खड़ा किया जा रहा है कि यह सुप्रीम कोर्ट में टिक ही नहीं पाएगा, क्योंकि पहले भी इस तरह के निर्णय कोर्ट द्वारा खारिज कर दिए गए हैं। अनेक राज्यों ने समय समय पर आंदोलनों के दबाव में आर्थिक आधार पर आरक्षण के फैसले किए और हमेशा सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालयों ने उन्हें खारिज कर दिया। अनेक बार अनारक्षित जातियों को ओबीसी श्रेणी का कहकर भी आरक्षण देने की कोशिश की गई, लेकिन वे सारी कोशिशें भी नाकाम रहीं।
राज्य सरकार की क्या बात, खुद केन्द्र सरकार ने भी 1991 में आर्थिक आधार पर तथाकथित सवर्णो को 10 फीसदी आरक्षण दिए थे। उस समय मंडल का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की पीठ ने की थी। पीठ ने सर्वसम्मति से आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण को खारिज कर दिया। इसका कारण बताते हुए यह कहा गया कि संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था ही नहीं है। उसमें स्पष्ट लिखा गया है कि नागरिकों के पिछड़े वर्ग को ही आरक्षण दिया जाएगा और पिछड़ेपन का आधार सामाजिक और शैक्षिक बताया गया है, आर्थिक नहीं। इसलिए आर्थिक आधार पर दिया गया आरक्षण असंवैधानिक माना गया।

Image result for quota upper caste

इसके अतिरिक्त खुद सप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दे रखी है कि आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके कारण ही ओबीसी को मात्र 27 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है, जबकि मंडल आयोग के अनुसार पिछड़ों की आबादी 52 फीसदी है और सिफारिश भी 52 फीसदी आरक्षण देने की की गई थी। हां, यह कहा गया था कि 50 फीसदी सीमा को ध्यान में रखते हुए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण फिलहाल दे दिया जाए और बाद में 50 फीसदी की सीमा को हटाकर उनका आरक्षण 52 फीसदी की दिया जाय।
लेकिन किसी सरकार ने 50 फीसदी की सीमा को हटाने के लिए संविधान में संशोधन नहीं किया और न ही आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए किसी प्रकार की संवैधानिक व्यवस्था की। इसका असर यह हुआ कि भिन्न निन्न आंदोलनों के दबाव मे सरकार ने जब जब आंदोलनकारी समूहों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की, कोर्ट में वह व्यवस्था खारिज हो गई।
क्या मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर दिए जा रहे 10 फीसदी आरक्षण का भी वही हश्र होगा? यह सवाल उठना लाजिमी है। तो इस सवाल का जवाब यही हो सकता है कि यदि संविधान में किसी तरह के बदलाव किए बिना यह फैसला किसी कानून के द्वारा अमल में लाने की कोशिश की जाती है, तो वह कोशिश विफल हो जाएगी। उस निर्णय को अदालत में चुनौती मिलने के बाद अदालत पहले वाले फैसले को दुहराते हुए उसे खारिज कर देगी। लेकिन यदि सरकार ने पहले से ही सावधानी बरती तो संभवतः सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाएगा।

केन्द्र सरकार की सावधानी यही हो सकती है कि वह संविधान की धारा 15 और 16 में बदलाव कर समाज के अनारक्षित तबकों के गरीब लोगों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था कर दे। यानी आर्थिक आधार पर आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था हो जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस आधार पर इसे खारिज नहीं कर पाएगा कि सरकार का वह निर्णय असंवैधानिक है।

Image result for quota upper caste

दूसरी अड़चन 50 फीसदी की सीमा है। यह सीमा संविधान ने तय नहीं की है। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई सीमा है और इसे संविधान की धारा 15 और 16 की व्याख्या करके ही तय किया गया है। कोर्ट का कहना है कि इन दोनों धाराओ मे जाति, धर्म, वर्ग, ल्रिग इत्यादि के आधार पर किसी तरह भेदभाव न किए जाने की व्यवस्था है और अपवाद के रूप में पिछड़े वर्गाें के लिए इस समतावादी व्यवस्था के उल्ल्ंाघन का प्रावधान है। मतलब नियम यह है कि भेदभाव नहीं होगा और अपभाद है कि नागरिकों के पिछड़े वर्गो के लिए भेदभाव किया जा सकता है। कोर्ट का कहना है कि यदि 50 फीसदी से अधिक का आरक्षण होता है, तो अपवाद ही नियम बन जाएगा और नियम है जो अपवाद हो जाएगा। इसलिए अपवाद को अपवाद बना रहने के लिए आरक्षण केा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं किया जा सकता।
फिलहाल संविधान की यह व्यवस्था भी संविधान का हिस्सा बन गई है और इसे खारिज करने के लिए संविधान में संशोधन कर स्पष्ट किया जा सकता है कि यह सीमा 60 फीसदी की जाती है या 50 फीसदी से ऊपर जो आरक्षण दिया जा रहा है वह संविधान के उस नियम का हिस्सा है, जो समान अवसर का अधिकार देता है और भेदभाव के खिलाफ है, क्योंकि इस तरह के आरक्षण में धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र, रेस इत्यादि के आधार पर भेदभाव नहीं किया गया है, बल्कि भेदभाव आर्थिक आधार पर किया गया है।
यह तो निश्चित है कि सुप्रीम कोर्ट मे इस निर्णय को चुनौती दी जाएगी और उसमे कहा जाएगा कि 50 फीसदी की सीमा का उल्लंधन संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट मे इसके पक्ष और खिलाफ मे तर्क दिए जाएंगे। फैसला तो अंततः सुप्रीम कोर्ट ही करेगी, लेकिन मंडल मुकदमे मे ओबीसी आरक्षण की पैरवी करने वाले वकील रामजेठमलानी ने अपने एक भाषण में एक बार कहा था कि आरक्षण की 50 फीसदी सीमा के टूटने से संविधान का मूल ढांचा टूटना साबित नहीं हो पाएगा, क्योंकि मूल ढांचा क्या है, इसका निर्घारण जज अपने मत के अनुसार नहीं कर पाएंगे और उन्हे संविधान में ही देखना होगा कि क्या 50 फीसदी की सीमा मूल ढांचे का हिस्सा है या नहीं। चूंकि ऐसा कहीं सविधान मे ंनहीं लिखा हुआ है, इसलिए कोर्ट कुछ भी नहीं कर पाएगा।(संवाद)

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला कोई नया नहीं है

प्रद्युम्न यादव

आज से पहले नरसिम्हाराव की सरकार ने 25 सितंबर , 1991 को सवर्णों को 10% आरक्षण दिया था. ठीक वैसे ही जैसे आज दिए जाने की बात हो रही है. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण को अवैध घोषित कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की पीठ ने “इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार” केस के फैसले में इस आरक्षण को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि आरक्षण का आधार आय व संपत्ति को नहीं माना जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) में आरक्षण समूह को है , व्यक्ति को नहीं. आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है.

इसी तरह वर्ष 2017 में गुजरात सरकार द्वारा छह लाख वार्षिक आय वालों तक के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को न्यायालय ने खारिज कर दिया था.

राजस्थान सरकार ने 2015 में कथित ऊंची जाति के गरीबों के लिए 14 प्रतिशत और पिछड़ों में अति निर्धन के लिए पांच फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी. उसे भी निरस्त कर दिया गया था.

Image result for quota upper caste

हरियाणा सरकार का ऐसा फैसला भी न्यायालय में नहीं टिक सका.

असल में बीजेपी को पता है कि ये फैसला न्यायालय में नहीं टिकने वाला. अतीत में इस तरह के कई उदाहरण मौजूद हैं. बावजूद इसके बीजेपी ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला लिया है.

इसके पीछे दो मुख्य कारण नज़र आ रहे हैं.

पहला , बीजेपी का सवर्ण वोट बैंक अब खिसकने लगा है और उसे भय है कि 2019 तक यह पूर्णतः उसके पक्ष में नहीं रहने वाला.

दूसरा , एससी /एसटी ऐक्ट के बाद सवर्णों के बीच हुए डैमेज कंट्रोल को कम करने के लिए.

चुनाव नजदीक है तो इस बात की पूरी संभावना है कि नोटा या अन्य दलों की तरफ़ भागने वाला औसत बुद्धि सवर्ण वोटबैंक इससे पुनः बीजेपी की तरफ लौटेगा.

बाकी वो गाना तो सुना ही होगा …दो पल रुका ख्वाबों का कारवां…बस वही बात है. जिस तरह आननफानन में ये आरक्षण लागू हो रहा है , उसी तरह जल्द ही खारिज भी हो जाएगा.

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

हनुमान जी की जाति को लेकर नेताओं के बेतुके बयान

 

कार्तिक अय्यर

भगवान हनुमान की जाति और धर्म को लेकर शुरु हुई बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रही हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि अब भगवान हनुमान के साथ ही रामायण के अन्य पात्रों की जाति भी बतायी जाने लगी है। दरअसल भाजपा नेता और उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर से सांसद हरिओम पांडे ने दावा किया है कि भगवान हनुमान ‘ब्राह्मण’ थे, वहीं वानर साम्राज्य के राजा सुग्रीव ‘कुर्मी’ जाति से थे। सुग्रीव के भाई बाली को भाजपा नेता ने ‘यादव’ बताया। भाजपा नेता ने ये भी दावा किया कि सीता को रावण से बचाने की कोशिश करने वाला पक्षी जटायु एक ‘मुस्लिम’ था। साथ ही भगवान राम को समुद्र में राम सेतु बनाने में मदद करने वाले नल और नील ‘विश्वकर्मा’ समुदाय के थे।

उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ,जो स्वयं जाट हैं, ने गुरुवार को विधान परिषद में प्रश्नकाल कहा कि ‘दूसरों के फटे में जो टांग अड़ाता है, वही जाट हो सकता है। हनुमान मेरी जाति के थे।’

-“दूसरों के फटे में टाँग अड़ाने वाला”- कहकर महावीर हनुमान जी का अपमान किया गया।इस तरह चुटकियाँ सनातनी महापुरुषों पर लेना भारत में  आम बात है।मगर हिंदुत्व की बात करने वाली भाजपा ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे दिया है।

हां,यह बात उल्लेखनीय है इस्लाम व ईसाइयत के महापुरुषों पर कोई चूँ भी कर दे तो आफत आ जाती है और भारत को असहिष्णु कहने वाली गैंग अपना सर उठाने लगती है।कभी रोहित सरदाना जी ने एक फिल्म के संदर्भ (सेक्** दुर्गा)में हजरत मोहम्मद की पत्नी आयशा और हजरत ईसा मसीह की मां मरियम के संदर्भ में टिप्पणी की थी।उनका आशय इनका अपमान करना न था, परंतु फिर भी देश में काफी हंगामा मचा था।लेकिन सनातन धर्म की हालत इतनी गई-बीती है इसके अनुयायी खुद अपने महापुरुषों के नाम पर चुटकुले, मैसेजेस आदि बनाते हैं और खुद चटखारे ले-लेकर सनातन धर्म की अर्थी उठाते हैं।

अलवर के मालाखेड़ा गांव में एक सभा को संबोधित करते हुए योगी आदित्यनाथ ने हनुमानजी को वनवासी, दलित और वंचित बताया था। दरअसल उनका तात्पर्य हनुमान जी को वानर कहना था यानी जो मनुष्य वन में रहकर वन्य उत्पन्न होने वाले फल कंदमूल आदि का सेवन करके जीता है।
इस लेख में कुछ प्रमाण देकर हम हनुमान जी जटायु नल नील आदि के जाति के विषय में कुछ लिखेंगे तथा इन राजनेताओं के बयानों की भी समीक्षा करेंगे।

(क)- श्री हनुमान, सुग्रीव, बाली, नल-नील, जटायु की जाति-

सर्वप्रथम यह जान लेना चाहिए की श्री हनुमान , सुग्रीव, बाली, नल-नील वानरजाति के थे। वानर अर्थात् वन में विचरण करने वाले तथा वन के कंदमूल आदि का सेवन करने वाले लोग। यह सभी मानव ही थे। बस, इन में विशेषता यह थी कि वनों में रहा करते थे इसलिए इन की जाति मानव-जाति थी और मानव के अंतर्गत यह लोग वानर थे। रही बात इन्हें जाट, कुर्मी, मुस्लिम, विश्वकर्मा आदि कहने की, तो यह अनुपयुक्त है ।क्योंकि जाट, कुर्मी, मुस्लिम आदि संज्ञायें बहुत नवीन हैं। जबकि रामायण पुरानी घटना है।आधुनिक शोधकर्ता भी कम से कम ६००० साल पुराना तो रामायण को घटित हुआ मानते हैं। अतः इनका जाट आदि होना कदापि सिद्ध नहीं हो सकता। हनुमान जी को -“फटे में टांग अड़ा ने वाला” कह कर तो उनका अपमान तक कर दिया गया।

अब इन इतिहास पुरुषों के वंशों बारे में विवेचन करते हैं

१- हनुमान जी-

मारुतस्य औरसः श्रीमान् हनुमान् नाम वानरः ।
वज्र संहननोपेतो वैनतेय समः जवे ॥

हनुमान् नाम वाले ऐश्वर्यशाली वानर वायु देव के औरस पुत्र थे। साथ में उन्हें वज्र के समान शरीर वाला वह गरुड़ के समान वह वाला भी कहा है।
( वाल्मीकीय रामायण बालकांड सर्ग १७ श्लोक १६)

२- सुग्रीव और बाली-

वानरेन्द्रम् महेन्द्र आभम् इन्द्रः वालिनम् आत्मजम्।
सुग्रीवम् जनयामास तपनः तपताम् वरः ॥

देवराज इंद्र ने वानर राज वाली को पुत्र रूप में उत्पन्न किया तथा श्रेष्ठ भगवान सूर्य ने सुग्रीव को जन्म दिया।

( वा.रा. बा.कां. सर्ग १७ श्लोक १०)

३- नल और नील-

विश्वकर्मा तु अजनयन् नलम् नाम महा कपिम् ॥
पावकस्य सुतः श्रीमान् नीलः अग्नि सदृश प्रभः ।

विश्वकर्मा ने नल नामक महान वानर को जन्म दिया।
अग्नि के समान तेजस्वी श्रीमान अनिल साक्षात् अग्नि देव का ही पुत्र था।।

( वा.रा. बा.कां सर्ग १७ श्लोक १२,१३)

ऋक्षीषु च तथा जाता वानराः किंनरीषु च ।
देवा महर्षि गन्धर्वाः तार्क्ष्य यक्षा यशस्विनः ॥२१॥
नागाः किम्पुरुषाः च एव सिद्ध विद्याधर उरगाः ।
बहवो जनयामासुः हृष्टाः तत्र सहस्रशः ॥२२॥
चारणाः च सुतान् वीरान् ससृजुः वन चारिणः ।
वानरान् सु महाकायान् सर्वान् वै वन चारिणः ॥२३॥
अप्सरस्सु च मुख्यासु तदा विद्यधरीषु च ।
नाग कन्यासु च तदा गन्धर्वीणाम् तनूषु च ।
काम रूप बलोपेता यथा काम विचारिणः ॥२४।।

“कुछ वानर ऋक्ष जाति की माताओं से तथा कुछ किन्नरियों से उत्पन्न हुए।देवता,महर्षि गंधर्व,गरुड़ यशस्वी यक्ष, सिद्ध विद्याधर नाग जाति के बहुसंख्यक व्यक्तियों ने अत्यंत हर्ष से भर कर सहस्रों यानी अनेकों पुत्र उत्पन्न किए। देवताओं का गुण गाने वाले वनवासी चरणों ने बहुत से वीर विशालकाय वानर पुत्र उत्पन्न किए वे सब जंगली फल-मूल खाने वाले थे। मुख्य मुख्य अप्सराओं,विद्याधरियों, नाग कन्याओं तथा गंधर्व पत्नियों के गर्भ से भी इच्छा अनुसार रूप और बल से युक्त तथा स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचरण करने में समर्थ वानर पुत्र उत्पन्न हुए।।

( वा.रा. बालकांड सर्ग १७)
यहां पर स्पष्ट है कि वानर लोग देवता,ऋषि- मुनि गंधर्व यक्ष नाग आदि (जो मनुष्यों के ही भेद हैं)से जन्मे हुए मनुष्य ही थे। उनको वानर इसलिए कहते थे क्योंकि जंगल में उत्पन्न फल-मूलादि खाने वाले होते थे तथा जंगलों में ही बसा करते थे। स्पष्ट रूप से श्लोक २३ में यह बात कही गई है वे-

“वानरान् सु महाकायान् सर्वान् वै वन चारिणः”(श्लोक २३)
देवताओं का गुण गाने वाले वनवासी चरणों ने बहुत से वीर विशालकाय वानर पुत्र उत्पन्न किए वे सब जंगली फल-मूल खाने वाले थे।

यहां साफ है कि हनुमान जी को जाट,सुग्रीव को कुर्मी नल- नील को विश्वकर्मा समाज का व्यक्ति कहना स्पष्ट रूप से गलत है। क्योंकि इनके पिताओं का नाम भी यहां पर है।यह सब देवता यानी ‘दिव्य गुण युक्त मानव’ ही थे। हनुमान जी के पिता वायुदेव जाट नहीं थे!सुग्रीव के पिता देवराज इंद्र क्षत्रिय ही कहलाएंगे क्योंकि वह स्वर्ग अर्थात् त्रिविष्टप के राजा थे; उन्हें कुर्मी कहना मूर्खता है। हां,नल के पिता तो विश्वकर्मा लिखे हुए हैं ,मगर नील के पिता अग्नि देव हैं।यहां पर किसी मुसलमान की चर्चा तो है ही नहीं क्योंकि इस्लाम तो १४०० वर्ष पूर्व आया हुआ मत है जबकि वाल्मीकि रामायण तो बहुत प्राचीन है।

४- जटायु- अब महाराज जटायु की बात करते हैं।जटायु को चोंच वाले पक्षी के रूप में दिखाया जाता है परंतु उनके लिए रामायण में ‘आर्य’ और ‘द्विज’ शब्द आए हुए हैं यह मानव के लिए ही हो सकते हैं।

अब जटायु को मुस्लिम कहा जा रहा है।जरा देखते हैं कि उनका वंश क्या था –

जटायु अपना परिचय देते हुए कहते हैं-

“कश्यप पत्नी ताम्रा की पुत्री जो शुकी थी।उसकी पौत्री विनता थी तथा कद्रू सुरसा की बहन कहीं गई है। इनमें से कद्रू ने नागों को उत्पन्न किया तथा विनता के दो पुत्र हुए- गरुड़ और अरुण।
विनता के पुत्र अरुण से मैं तथा मेरे बड़े भाई सम्पाति उत्पन्न हुए।आप मेरा नाम जटायु समझे। मैं श्येनी का पुत्र हूं।ताम्रा के वंश में मेरा जन्म हुआ।”
( अरण्यकांड सर्ग १४ श्लोक ३१,३२,३३)

अब जटायु के वंश परिचय के बाद कुछ भी कहना शेष नहीं बचता महर्षि कश्यप के वंश में उत्पन्न होने से जटायु को कोई मूर्ख ही मुस्लिम कह सकता है।

– अब नेताओं की सुनिये!-

बयान क्रमांक-१

बुक्कल नवाब ने एएनआई से बातचीत में कहा था कि “हमारा मानना है कि हनुमान जी मुसलमान थे…इसलिए मुसलमानों के अंदर जो नाम रखा जाता है रहमान, रमजान, फरमान, जीशान, कुर्बान…..जितने भी नाम रखे जाते हैं, वो करीब करीब उन्हीं पर रखे जाते हैं।” विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे को लेकर भाजपा पर धार्मिक ध्रुवीकरण करने का आरोप लगा रही हैं।

उत्तर- केवल मान शब्द जुड़े होने से हनुमान जी को मुसलमान कहना ठाक नहीं, क्योंकि मानव शब्द संस्कृत में भी आता है जैसे कि शक्तिमान कांति मान ड्यूटी मान यह सब संस्कृत के शब्द हैं मान और वन उपसर्ग संस्कृत और हिंदी में पाए जाते हैं और फिर रामायण की रचना इस्लाम के बहुत पूर्व हो चुकी है फिर उसमें मुसलमानों का वर्णन कहां से आएगा ऐसे हास्यास्पद बयानों से राजनेताओं को बचना चाहिए

बयान क्रमांक-२

भाजपा सांसद साक्षी महाराज का भगवान हनुमान की जाति और धर्म को लेकर चल रही बहस पर कहना है कि ‘भगवान किसी एक जाति के नहीं हैं, वो सभी के हैं और यही भगवान की महानता है।’

उत्तर-

साक्षी महाराज का कथन कुछ हद तक उचित प्रतीत होता है। भगवान किसी एक जाति के नहीं होते ,वह तो ठीक है परंतु महावीर हनुमान जी वानर राज सुग्रीव के मंत्री होने से ब्राह्मण कहलाए जाने योग्य हैं।वैसे मंत्री पद में रहने वाले ब्राह्मण कुछ-कुछ क्षत्रियों के कर्म भी करते हैं,लेकिन केवल आवश्यकता पड़ने पर ही।जिस प्रकार से परशुराम जी ब्राह्मण ही थे परंतु केवल आपात्काल में उन्होंने दुष्ट क्षत्रियों को नष्ट करने के लिए शस्त्र उठाएं और ब्राह्मण ही रहे।जाति की बात करें तो हनुमानजी की जाति तो मानव ही थे और वर्ण की बात करें तो वे ब्राह्मण थे।

 

Please follow and like us:
ByUpendra Prasad

पेरियार ने क्यों जलाया था संविधान

चन्द्रभानु यादव

26 नवंबर (1957) बहुजन इतिहास में

इस दिन 1957 में पेरियार के अनुयायियों और तमिलनाडु के लोगों ने भारतीय संविधान के प्रावधानों को जला दिया जो कि जाति की रक्षा करते हैं ।

3 नवंबर 1957 को तंजावुर (तमिलनाडु) में ने कड़गम के एक विशेष सम्मेलन में पेरियार ने पूछा कि क्या जाति एक स्वतंत्र देश में मौजूद हो सकती है? इसके बाद उसने पूछा, क्या ऐसा देश जहां जाति व्यवस्था मौजूद है, एक स्वतंत्र देश कहा जा सकता है?

आजतक कोई, या बुद्धिजीवी पंडितों का जवाब नहीं दे सकता था ।

इसके अलावा, पेरियार ने संकल्प पारित किया कि भारतीय संविधान में जो उपबंध हैं, उन्हें हटा दिया जाना चाहिए; 15 दिन की समय सीमा दी, असफल रहा, जो संविधान के हिस्से को 26 नवंबर (1957) को जलाया जाएगा. ). उन्होंने 26 नवंबर के उसी दिन को चुना जब भारतीय संविधान 1949. में अपनाया गया था ।

26 नवंबर 1957 को लगभग 10000 लोगों ने भारतीय संविधान को जला दिया । तीन हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया । 6 महीने से 3 साल तक कठोर imprisionment, वे में । सभी प्रकार के लोग, गरीब, दैनिक मजदूरी), जमींदार, महिलाओं, बच्चों ने संघर्ष में भाग लिया ।

उनमें से कोई भी अपने घर में कुछ हताहत और घटनाओं के बावजूद जमानत के लिए लागू होता है. वे किसी भी वकील को संलग्न नहीं किया. उन्होंने एक सरल बयान दिया, जो पेरियार द्वारा लिखवाई गई थी । इन सभी ने अदालत को बताया कि भारतीय संविधान में उपबंध जाति की रक्षा करते हैं; उनमें से अधिकांश शूद्रों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया था. तो उन लोगों ने (दुनिया में) जो कुछ रोज़ी दी थी उसे जला दिया तो उन लोगों ने (दुनिया में) जो भी सजा, न्यायाधीशों को थोपने की इच्छा है, वे खुशी से स्वीकार करेंगे ।

भारत के इतिहास में यह एकमात्र संघर्ष था सरकार के खिलाफ जहां लगभग 3000 लोग कठोर imprisionment पर गए और उनमें से कोई भी जमानत पर नहीं आया । Prision में लगभग 5 लोगों की मौत; prision के अंदर अमानवीय उपचार के कारण उनकी रिहाई के बाद 13 लोगों की मौत हो गई ।

जातिवाद के खिलाफ उन योद्धाओं को सलाम करते हुए, हम नवंबर 26 के इस दिन को अपने आप को शपथ लें

Please follow and like us:
Facebook
Facebook
Instagram
YouTube
YouTube
LinkedIn
Pinterest
Pinterest
Google+
Google+
http://www.voiceofobc.com/category/opinion-analysis">
RSS