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उपेन्द्र प्रसाद – संस्थापक संपादक

Voice of OBC

भारत बदलाव के दौर से गुजर रहा है. वैसे बदलाव एक सतत प्रक्रिया है और यह लगातार होता रहता है, लेकिन वर्तमान दौर में एक साथ अनेक मोर्चों पर बदलाव हो रहे हैं और बहुत तेजी से हो रहे हैं. सामाजिक मोर्चे पर भी जबरदस्त बदलाव आ रहा है. जाति समाज की सबसे बड़ी हकीकत है और राजनैतिक, आर्थिक और टेक्नोलॉजिकल कारणों से जाति व्यवस्था भी जबरदस्त बदलाव की गिरफ्त में है. बदलाव तो हो रहा है, लेकिन इसकी प्रकृति अस्पष्ट है. कभी लगता है जाति कमजोर हो रही है, तो दूसरे क्षण ही लगता है कि जाति व्यवस्था मजबूत हो रही है. सामाजिक- राजनैतिक विमर्श पर वैचारिक अतिवादी हावी होते जा रहे हैं और निहित स्वार्थी लोग अपने अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने में लगे हैं, जिसके कारण समाज में नफरत का साम्राज्य स्थापित होता दिख रहा है.

भारतीय समाज इस समय अनारक्षित, ओबीसी, एससी और एसटी के चार वर्गों में विभाजित है. जाति व्यवस्था में ओबीसी का स्थान मध्य में रहा है. इसकी जनसँख्या देश की कुल जनसँख्या की आधी से भी ज्यादा है. सामाजिक बहुसंख्यक और जाति व्यवस्था के मध्य में होने के कारण सामाजिक समन्वय लाने में इसकी भूमिका केंद्रीय होनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से यह सामाजिक बहुसंख्यक अपनी भूमिका निभाने में विफल हो रहा है और इसके कारण हो रहा सामाजिक बदलाव समन्वय की ओर न बढ़कर लगातार टकराव की ओर बढ़ रहा है.

वॉयस ऑफ़ ओबीसी इस बेतरतीब सामाजिक बदलाव में हस्तक्षेप का एक प्रयास है और इसका उद्देश्य सामाजिक टकराव के बीच सामाजिक समन्वय की राह की तलाश है ताकि भारत एक सशक्त और सुगठित समाज का रूप प्राप्त कर सके.

संस्थापक संपादक

उपेन्द्र प्रसाद इस पोर्टल के संस्थापक संपादक हैं. वे २८ वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं. २७ साल की उम्र में ये उस समय के सबसे बड़े राष्ट्रीय अख़बार नवभारत टाइम्स के सहायक संपादक १९९० में बन गए थे. १९९४ में ये नवभारत टाइम्स के ही पटना संस्करण के स्थानीय संपादक बने. २००१ तक नवभारत टाइम्स में अपनी सेवा देने के बाद ये स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं. १९९० में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा मंडल लागू करने की घोषणा के बाद समाज में पैदा हुई गतिशीलता के ये नजदीक गवाह रहे हैं, बल्कि उसमें वे अपने लेखन के द्वारा वैचारिक हस्तक्षेप भी करते रहे हैं.

जैसे जैसे हमारा पोर्टल विकसित होगा सामाजिक समन्वय को बढ़ावा देने वाले अन्य विचारकों  को भी हम अपने साथ जोड़ते जाएंगे.

हमारा उद्देश्य

हमारा उद्देश्य एक सामाजिक समूह के रूप में ओबीसी की समस्याओं को उठाना है ही, लेकिन यह सिर्फ इतने तक ही सीमित नहीं है. हमारी नजर पूरे समाज पर है और उस विमर्श को बढ़ावा देना है, जो समाज को जोड़ता है और समाज को तोड़ने वाली शक्तियों को अंततः चुनौती देता है.

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