महाभारत में कर्ण को विद्या न सिखाने का स्पष्टीकरण

ByUpendra Prasad

महाभारत में कर्ण को विद्या न सिखाने का स्पष्टीकरण

 

कार्तिक अय्यर

कई लोग प्रश्न करते हैं कि महाभारत में कर्ण को सूतपुत्र अर्थात् तथाकथित ‘दलित,SC,ST,OBC,’ मानकर द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या नहीं सिखाई।
ऐसे आक्षेप लगाने वालों ने न तो महाभारत ग्रंथ की सूरत देखी होती है;न ही टी.वी सीरियल के महाभारत आदि पौराणिक कार्यक्रम ढंग से देखे होते हैं। क्योंकि टी.वी सीरियल की महाभारत तक में यह स्पष्ट दिखाया गया है,कि द्रोणाचार्य ने कर्ण को सूतपुत्र मानकर केवल ब्रह्मास्त्र विद्या नहीं सिखाई थी। बाकी साधारण धनुर्विद्या का ज्ञान द्रोणाचार्य ने कर्ण का बराबर (यथायोग्य) दिया था। (हाँ,यह सत्य है कि ‘स्टारप्लस’ की २०१४ वाली कथा में सर्वथा ही कर्ण को द्रोण द्वारा विद्या से वंचित करना दिखाया गया है।)

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इसके बाद जो कथा प्रचलित है, वह यह है कि कर्ण ने तत्पश्तात् भगवान् परशुराम से ब्रह्मास्त्रविद्या यह कहकर प्राप्त की,कि वह एक ‘ब्राह्मण है।’ बाद में एक कीड़े द्वारा रक्त निकलने और कर्ण के भेद खुलने व बाद में ‘जब सबसे अधिक विद्या की आवश्यकता होगी,तब तुम अपनी विद्या भूल जाओगे।’ इत्यादि बातें महाभारत व उसके ऊपर बने टी.वी कार्यक्रमों में हम देखते हैं। ये शाप-वरदान आदि की कथायें कितनी सत्य है,इस पर विचार करना इस लेख का विषय नहीं है। साथ ही,यह याद रहे कि गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में कर्ण ने भी विद्याभ्यास किया था, ‘ब्रह्मास्त्र’ विद्या को छोड़कर।यही नहीं, एकलव्य का भी अंगूठा लेने के पश्चात् उसे *बिना अंगूठे के बाण चलाने की विद्या सिखाना भी महाभारत में लिखा है,जोकि इसलिये नहीं बताया जाता-ताकि एकलव्य के नाम पर आर्य-संस्कृति पर जातिवाद व शिक्षामें भेदभाव का आरोप लगाया जा सके।

अस्तु। हम यहाँ पर महाभारत से कुछ ऐसे प्रमाण प्रस्तुत करते हैं,जिससे यह प्रमाणित होगा कि कर्ण जैसे तथाकथित सूतपुत्र तक महाभारत काल में वेदादिशास्त्रों को पढ़ते थे।

(१)- कर्ण का वेदमंत्रों का पाठ करना-

हम गीताप्रेस से छपी ‘संक्षिप्त महाभारत’ भाग-१ से उद्धृत करते हैं-

‘ऐसा सोचकर कुंती गंगातट पर कर्ण के पास गयी।वहाँ पहुँचकर कुंती ने अपने सत्यनिष्ठ पुत्र के वेदपाठकी ध्वनि सुनी।वह पूर्वाभिमुख होकर भुजाएँ ऊपर उठाये मंत्र पाठ कर रहा था।तपस्विनी कुंती जप समाप्त होने की प्रतीक्षा में उसके पीछे खड़ी रही।’

( संक्षिप्त महाभारत, उद्योगपर्व,पृष्ठ ६५३, अनुच्छेद २, बाँयी ओर से- गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित भाग-१)

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लीजिये, यहाँ पर स्पष्ट है कि कर्ण उस समय वेदमंत्रों का पाठ कर रहा था।अब पाठकों! ज़रा सोचिये, यह कार्य कर्ण रोज ही करता होगा या नहीं? क्या ये वेदविद्या वो गर्भ से लेकर पैदा हुआ था? कदापि नहीं।यह विद्या उसने गुरुकुल में प्राप्त की थी। और प्रमाणों का अवलोकन करें-

(२)- कर्णका सनातनशास्त्रों का ज्ञान होना-

राज्य का प्रलोभन देते समय योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा था-

(क)-
‘कर्ण! तुमने वेदवेत्ता ब्राह्मणों की बड़ी सेवा की है और उनसे परमार्थतत्त्व संबंधी प्रश्न किये हैं।’

( संक्षिप्त महाभारत, उद्योगपर्व पृष्ठ ६५०व ६५१)

साथ ही,

(ख)-
‘त्वमेव कर्ण जानासि वेदवादान् सनातनान्।
त्वमेव धर्मशास्त्रेषु सूक्ष्मेषु परिनिष्ठितः।।’
( महाभारत उद्योगपर्व १३८ श्लोक ७)

‘हे कर्ण!तुम सनातन वैदिक मन्तव्यों से परिचित हो और सूक्ष्म धर्मशास्त्रों में तुम्हारी पैठ है।’

(ग)- कर्ण की अपने मुख से साक्षी-

धर्माविद्धर्मशास्त्राणां श्रवणे सततं रतः।।
( महाभारत उद्योगपर्व १३९ श्लोक ७)

‘हे कृष्ण! मेरे जैसा व्यक्ति जो सदा धर्मशास्त्रों का अध्ययन करता है और धर्म जानता है…।’

( ‘श्रुति-सौरभ’, पं.शिवकुमार शास्त्री, पृष्ठ २८ व ३० से उद्धृत)

वक्तव्य-

यहाँ इन तीनों प्रमाणों से स्पष्ट है कि अंगराज कर्ण ने अपने समय में वेदज्ञ ब्राह्मणों की सेवा भी की,उनसे प्रश्नोत्तर भी किये। साथ ही,उसके पास वैदिक शास्त्रों का ज्ञान भी था। कर्ण ने अपने मुख तक से कहा कि वो धर्मशास्त्रों का स्वाध्याय व पालन भी करता है। ऊपर हम कर्ण के वेदमंत्रों के पाठ का प्रमाण तो देख ही आये हैं।

निष्कर्ष- इस पूरे लेख से ये स्पष्ट है कि कर्ण के साथ उसके सूतपुत्र होने पर खासा भेदभाव न किया गया।दरअसल द्रोणाचार्य राजनैतिक संधि के तहत उसे ब्रह्मास्त्र नहीं दे सके,पर सामान्य धनुर्विद्या उसे सिखाई गई। भगवान् परशुराम से उसने छलपूर्वक विद्या पाई। हम कर्ण द्वारा वेदपाठ करने,धर्मशास्त्रों का नित्य स्वाध्याय करना आदि भी स्थापित कर चुके हैं।इससे साफ सिद्ध होती है कि कर्ण जैसे तथाकथित सूतपुत्र माने जाने वाले व्यक्ति तक को महाभारत काल में वेदादिशास्त्रों व युद्धविद्या का अधिकार दिया जाता था।
एकलव्य के विषय में जो हमने चर्चा की है,इसे हम फिर किसी लेख में रखेंगे। फिलहाल इस लेख का उद्देश्य पूर्ण हुआ।

।।ओ३म् शम्।।

।।सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय।।
।। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की जय।।
।।योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण चंद्र की जय।।
।। ब्रह्मा ले लेकर महर्षि दयानंद तक की आर्ष-परंपरा की जय ।।
।। संसार के सभी महापुरुषों व वैदिक विद्वानों की जय।।

।।लौटो वेदों की ओर।।

संदर्भ ग्रंथों की सूची-

१- संक्षिप्त महाभारत- गीताप्रेस, गोरखपुर
२- श्रुति सौरभ- पं शिवकुमार शास्त्री- विजय कुमार गोविंदराम हासानंद

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