बैलट पेपर के युग में जाने की मांग करने वाले लोकतंत्र के दुश्मन हैं

ByUpendra Prasad

बैलट पेपर के युग में जाने की मांग करने वाले लोकतंत्र के दुश्मन हैं

उपेन्द्र प्रसाद

ईवीएम पर एक बार फिर सवाल उठाए जा रहे हैं। कोलकाता में ममता बनर्जी द्वारा आयोजित रैली में विपक्ष के अनेक नेताओं ने ईवीएम के खिलाफ आग उगली और देश को एक बार फिर बैलट पेपर के युग में ले जाने की मांग की। उस रैली के चंद दिनों बाद ही लंडन में एक प्रेस कान्फ्रेंस में किसी सैयद शुजा ने दावा कर दिया कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है और उन्हें हैक कर न केवल 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे बदले गए, बल्कि दिल्ली विधानसभा के 2015 में हुए चुनाव के नतीजे भी बदले गए। उसने दावा किया कि 2014 में उसने 12 लोगों की टीम के साथ यह काम खुद किया था। उसकी टीम के 11 लोग मार डाले गए और वह अपनी जान बचाकर खुद अमेरिका में रह रहा है।

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शुजा प्रेस कान्फ्रेंस में खुद मौजूद नहीं था, बल्कि उसने विडियो काॅन्फ्रेंसिंग करके अपनी उपस्थिति वहां दर्ज की थी। उसने अपना चेहरा भी ढका हुआ था। उसने बाद में दावा किया कि उसके मां-बाप की हत्या भी उसके घर मंे आग लगाकर कर दी गई थी। उसने भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की मौत को भी ईवीएम की हैंकिंग से जुड़ी हत्या बता दी। उसने हैकिंग में अनिल अंबानी के रिलायंस कम्युनिकेशंस को भी शामिल होना बता दिया।

शुजा ने एक से बढ़कर एक दावे किए हैं। हैकिंग के अलावा जो अन्य दावे हैं, उसकी सच्चाई के बारे में आसानी से पता लगाया जा सकता है। यदि उसके घर में आग लगाकर उसके मां-बाप को मारा गया, तो आस पड़ोस के लोगों को भी पता होगा। यदि उसकी टीम के 11 सदस्यों को एक गेस्ट हाउस में मार दिया गया, तो उसके बारे में भी हैदराबाद के किसी पुलिस स्टेशन में भी मामला दर्ज होगा। यदि शुजा उन 11 लोगों के नाम व पते की जानकारी दे दे, तो उनके परिवार के लोगों से मिलकर भी यह पता लगाया जा सकता है कि वास्तव में उनकी मोत हुई भी थी या नहीं।

फिलहाल भारत के निर्वाचन आयोग ने भारत की पुलिस की पहुंच से बाहर अज्ञात शुजा पर एफआईआर दर्ज कराया है और यह दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी है कि इन सारे मामलों की जांच करे, हालांकि उसके लिए यह काम बेहद कठिन होगा, क्योकि आरोप लगाने वाला भारत में है ही नहीं और इस समय उसके चेहरे पर भी नकाब चढ़ा हुआ है। वह अपने आपको हैदराबाद का मूल बाशिंदा बता रहा है। हैदराबाद तेलंगाना में है और वहां टीआरएस की सरकार है। उम्मीद है कि हैदराबाद और दिल्ली की पुलिस मिलकर इस मामले की तह में जाएंगे और पता लगाएंगे कि उन दावों में कितनी सच्चाई है।

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दावों की जांच अपनी जगह है, लेकिन इन दावों ने एक बार फिर कुछ राजनैतिक पार्टियों को पुराने बैलट पेपर के युग में जाने की मांग करने का मौका दे दिया है। उन्हें ईवीएम पर हमला करने का एक और मौका मिल गया है। इसके साथ इस पर बहस और तेज हो गई है कि ईवीएम से मतदान ठीक रहेगा या फिर मतदान पत्र के युग में हमें पीछे चला जाना चाहिए।

सबसे आश्चर्य की बात है कि ईवीएम बनाम मतपत्र की चर्चा से वीवीपीएट को गायब कर दिया जाता है। यह सच है कि ईवीएम से मतदान में पारदर्शिता नहीं थी और मत देने वाला बटन दबाने के बाद यह तय नहीं कर पाता था कि उसने जिसे वोट दिया है, उसे पड़ा भी है या नहीं। ऐसे अनेक मामले आए, जब बटन क के पक्ष में दबाया जाता था, तो वोट ख के पक्ष में पड़ जाता था। इसकी आशंका बलवती थी कि मशीन से छेड़छाड़ करके ऐसा करना संभव है कि सारे बटन दबाने पर वोट किसी एक को ही पड़े।

लेकिन इन आशंकाओं को दूर करने के लिए वीवीपएटी मशीन भी ईवीएम के साथ अब जोड़ दी जाती है। ईवीएम का बटन दबाने पर वीवीपीएटी मशीन से एक पर्ची निकलती है, जिस पर वह चुनाव चिन्ह दिखाई पड़ता है, जिस पर बटन दबाया गया था। 30 सेकंड तक वह पर्ची मतदाता की नजरों के सामने रहती है और फिर मशीन से जुड़े एक डब्बे में गिर जाती है। मतदाता यह सुनिश्चित कर सकता है कि जिस चुनाव चिन्ह पर उसने बटन दबाया था, उसी चुनाव चिन्ह वाली पर्ची निकली या नहीं। यदि किसी दूसरे चुनाव चिन्ह की पर्ची निकलती है, तो उसकी शिकायत कर मतदान को रूकवाया भी जा सकता है।

और यदि यह मान भी लें कि पर्ची तो सही निकलती है, लेकिन ईवीएम में वोट किसी और को पड़ जाता है, तो इस आशंका का निस्तारण पर्चियों की गिनती करके किया जा सकता है। सच कहा जाय, तो इस व्यवस्था मे मतदाता के वोट दो जगह दर्ज होते हैं। वोट मशीन में दर्ज होता है और पर्ची पर भी अंकित हो जाता है और वह पर्ची एक डब्बे में बंद हो जाती है। मतगणना के लिए मशीन और पर्ची दोनों उपलब्ध होते हैं। पिछले मध्यप्रदेश चुनाव में देखा गया कि कुछ ईवीएम गिनती के समय खराब पाए गए। वे नतीजे ही नहीं दे रहे थे, तो फिर उस मतदान केन्द्र की डब्बे में बंद पर्ची की गिनती की गई और उसके आधार पर नतीजे घोषित किए गए।

ईवीएम मशीन से वोटों की गिनती तेजी से होती है, इसलिए निर्वाचन आयोग की यह पहली पसंद है, लेकिन किसी आशंका को निरस्त करने के लिए वीवीपएटी मशीनों से निकली पर्ची की गिनती भी की जा सकती है। इस समय निर्वाचन आयोग मशीन द्वारा हुई गिनती के बाद लाॅटरी के तरीके से किसी बूथ की पर्चियों की गिनती करती है। उस बूथ पर पड़े मतों की तुलना मशीन से गिने गए मतों से करके यह सुनिश्चित कर दिया जाता है कि सबकुछ ठीक है।

जाहिर है कि वीवीपीएटी से ईवीएम मशीनों के जुड़ जाने के बाद ईवीएम छेड़कर नतीजों को प्रभावित करने की संभावना लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई है। इसलिए वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना अनुचित है। हां, ज्यादा बूथों की पर्चियों की गिनती करने की मांग की जा सकती है और इस मांग को निर्वाचन आयोग मान ले, तो बेहतर होगा।

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