दलितों से विवेकपूर्ण दूरी बनाना क्यों है जरूरी

ByUpendra Prasad

दलितों से विवेकपूर्ण दूरी बनाना क्यों है जरूरी

शिशिर यादव

दलित चिंतक कंवल भारती ने अपने एक लेख में गोपियों को दलित सम्बोधित किया, मैंने उनसे पूछा ये गोपियाँ किस जाति की थी, उन्होंने उत्तर दिया “अहीर” | तो मैंने प्रश्न किया फिर इन गोपियों को अहीर क्यूँ नहीं लिखा तो स्पष्ट जवाब न देकर ब्लाक कर भाग गये | अहीर गोपियों को अहीर क्यों नहीं लिखा गया? सीधा जवाब है लेखक दलित है और वह अहीरों की सामाजिक स्थिति व् छवि को कैसे सम्मान दे सकता है? अहीर को दलित लिखने के पीछे अहीरों की सामाजिक स्थिति व् छवि को मिट्टी में मिलाने की नीच सोच के चलते ही इस दलित लेखक ने गोपियों को दलित लिखा |

एक दलित चिंतक ने एक पोस्ट में अहीरों को शुद्र बताया | मैंने महाभारत जैसे महाकाव्य का हवाला दिया तो दलित चिंतक ने कहा ये ब्राह्मणों की गप्प है | नीचता देखिये मनुस्मृति और रामायण में अहीरों के लिए लिखा शुद्र इतिहास है और महाभारत में अहीरों के लिए लिखा गया ब्राह्मणों की गप्प है | दोगलेपन और नीचता में माहिर दलितों की इस दलील से उनकी सोंच को समझना जरूरी है |

एक दलित ने कहा कि उत्तर भारत के राजस्थान के अहीर, जाट, गुज्जरों में देवदासी प्रथा थी | मैंने पता किया तो पता चला कि ऐतिहासिक मंदिर ही राजस्थान में नहीं हैं तो देवदासी प्रथा ही सम्भव नहीं है |

अहीर, जाट, गुर्जरों से दलित किस हद तक इर्ष्या, जलन, नफरत रखते हैं इस बात से समझा जा सकता है |

बीत चुकी इसी जन्माष्टमी के अवसर पर अनेक अहीर कुल के लोग अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे थे | एक दलित ने पोस्ट लिखी और उसमे कृष्ण को ब्राह्मणों की कल्पना और षड्यंत्र बताया | और यह भी लिखा कि ऐसा ब्राह्मणों ने अहीरों को मानसिक गुलाम बनाने के लिए किया | मैंने पूछा कि जब दलित अहीरों को शूद्र कहेंगे तब तुम कहोगे कि यह सब ब्राह्मणों का षड्यंत्र है | तब उसने निर्लज्जता से जवाब दिया कि शुद्र तो ब्राह्मणों ने लिखा है | मतलब  जब  अहीर कृष्ण को अपना वंशज बतायेंगे तब दलित कहेंगे कि यह ब्राह्मणों का षड्यंत्र है लेकिन दलित अहीरों को शूद्र कहेंगे और दलितों के हिसाब से यह कोई ब्राह्मणों का षड्यंत्र नहीं है और न ही मानसिक गुलाम बनाने की चाल है |

एक बार एक दलित ने चल रही चर्चा में कहा मराठा कौन थे? मैंने कहा महाराष्ट्र की एक मजबूत जमात | तो उसने कहा कि ब्राह्मणों ने पैर के अंगूठे से राजतिलक किया था | किसान पृष्ठभूमि के मराठों ने संघर्ष, प्रतिकूलताओं के पश्चात राज्य स्थापित किया था और वे इस स्थिति में आ गये थे कि मुगलों के उत्तराधिकारी भी बन सकते थे | इस साहस भरी यात्रा में अनेक सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक पहलू हैं लेकिन नीच मानसिकता से ग्रसित दलितों को ब्राह्मणों द्वारा पैर के अंगूठे से राज्याभिषेक करना ही इतिहास लगता है | बहुत सम्भव है कि पैर के अंगूठे से राज्याभिषेक की कहानी ब्राह्मणों का अपने सामाजिक वर्चस्व को ऊँचा दिखाने के क्रम में षड्यंत्र हो | कुछ भी हो परन्तु दलितों की नीयत और मकसद समझना बहुत जरुरी है |

अनेक वाकये आये दिन देखने को मिलते हैं | इतने वाकये यह बताने के लिए काफी हैं कि दलितों का मकसद नीच और नीयत निकृष्ट है | अतीत को अपनी दृष्टि से देखना और उसे इतिहास का दर्जा दिलाना जरूरी है | यह पुरुखों का हम पर कर्ज है | पुरुखों के संघर्ष, हौसला, जीवटता हमे स्वभिमानी बनने की प्रेरणा देंगे | समाज सभिमानी बनेगा, मनोबल कायम रहेगा और इस आधार पर नया इतिहास निर्मित करने का पथ प्रशस्त होगा | राजनीति के लिए समाज के हितों, स्वाभिमान, सम्मान से समझौता नहीं करना चाहिए | राजनीति अपनी जगह होनी चाहिए और समाज हित अपनी जगह | राजनीती के लिए समाज हित से समझौता करने वाले कलंक हैं समाज के |

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