क्यों द्विज बनाए रखना चाहते हैं अम्बेडकर को मसीहा

ByUpendra Prasad

क्यों द्विज बनाए रखना चाहते हैं अम्बेडकर को मसीहा

मदनलाल आजाद

अम्बेडकर के कारण ही आज द्विज सत्ता में हैं। यदि अम्बेडकर के स्थान पर बाबू जगजीवनराम या सरदार बूटासिंह प्रथम कानून मंत्री या संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चीफ होते तो वह अम्बेडकर की तरह कांग्रेस के हाथों बिकते नहीं अपितु संत शिरोमणि रविदास महाराज के बेगमपुरा के स्वप्न को साकार करते।।

 

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बाबूजी और बूटासिंह जब भी जहां भी रहे वहां सर्वोत्तम और साहसिक कार्य किया दलित हितों की संरक्षा के लिए और अम्बेडकर को कांग्रेस ने जहां भी बैठाया वहां अम्बेडकर ने वही किया जो कांग्रेस ने चाहा।। अम्बेडकर ने दलित हितों को लेकर कभी द्विजों से बगावत नहीं की और सरदार बूटासिंह एवं बाबू जगजीवन राम ने कभी समझौता नहीं किया दलित हितों से।। बाबू जी भी और सरदार जी भी दोनों बागी हो गए दलित विषयों की अनदेखी पर सत्ता से किन्तु अम्बेडकर कभी यह साहस नहीं जुटा पाए।।
अम्बेडकर संविधान में दलित अत्यचार निवारण पर एक आर्टिकल तक नहीं लिख सके।। आरक्षण का प्रावधान भी संविधान में इसलिए जोड़ा गया क्योंकि यह पूना पैक्ट की एक शर्त थी और गांधी जिंदा थे अन्यथा अम्बेडकर के भरोसे समाज रहता तो यह टूटा फूटा आरक्षण भी न होता।। अम्बेडकर के चेले चेली आदिवासी ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज को भी अपने साथ जोड़कर स्वयं को बहुजन समाज कहते हैं जबकि सत्य यह है कि अम्बेडकर आदिवासियों को आरक्षण तो क्या वोट का अधिकार ही नहीं देना चाहते थे, अम्बेडकर के मतानुसार ट्राइबल्स और जरायमपेशा घोषित जातियों को वोट का अधिकार देने से लोकतंत्र गड़बड़ा जाता।। मुसलमानों की सम्पूर्ण अदला बदली पाकिस्तान के साथ कर लेने का सुझाव अम्बेडकर ने ही नेहरू को दिया था और संविधान में गैर हिन्दू दलितों को आरक्षण न देने का प्रावधान भी अम्बेडकर ने ही किया था धारा 341-342 में।।

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वर्तमान संविधान यदि किसी द्विज ने लिखा होता तो इसका सर्वाधिक विरोध आज दलित कर रहे होते।। प्रथक निर्वाचन अधिकार निरस्त करने की साजिश यदि किसी द्विज ने रची होती तो पूना पैक्ट को कबका जला दिया होता दलितों ने ही।
कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से वह सब काम अम्बेडकर से करा लिए दलितों के खिलाफ जो कोई द्विज भी न कर पाता।।
आज आरक्षण के नाम पर दलितों के हाथ में कुछ भी नहीं है। अम्बेडकर इस आरक्षण को भी मात्र 10 साल तक रखने का ही प्रावधान कर गया थे, यह तो बाबू जगजीवनराम और सरदार बूटासिंह का ही साहस था जो उन्होंने 1960 में आरक्षण को समाप्त नहीं होने दिया।।बाबू जगजीवन और सरदार बूटासिंह वाल्मीकि के निष्क्रिय होते ही आज यह स्थिति है कि दलितों के लिए 90 फीसदी अवसर कम कर दिए गए हैं।। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 2018 में केंद्रीय नौंकरियों में केवल 6 हजार दलित भर्ती हुए हैं।। 6 हजार नौंकरियों के लिए 6 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का चंदा तो दलित परिसंघ डकार जाते हैं दलितों से वसूलकर।। सरकार से हजारों करोड़ का डोनेशन लेकर निगल जाते हैं वह अलग है।।

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